अखिलेश-मुलायम के लिए भस्मासुर हैं आजम खान
April 15, 2019 • विष्णुगुप्त
(विष्णुगुप्त)
आजम खान की आपत्तिजक, अश्लील और लोमहर्षक बयानबाजी ने राजनीतिक उफान उत्पन्न कर दिया है,  महिला के प्रति असम्मान और जहरीला सोच रखने की बात फैली है। यही कारण है कि महिला आयोग ने न केवल संज्ञान लिया है बल्कि आजम खान को नोटिस भी दिया है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि सुषमा स्वराज ने मुलायम सिंह यादव पर भीष्म की तरह चुप्पी साधने के आरोप जडते हुए आजम खान पर कार्रवाई करने की मांग कर चुकी है। ऐसी बयानबाजी की न्यायिक परीक्षण भी हो सकता है। पर राजनीतिक सच्चाई यह है कि अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव में इतनी शक्ति, इतनी नैतिकता नहीं है कि ये आजम खान पर कोई कार्रवाई करेंगे। आजम खान की आपत्तिजनक बयानबाजी का चुनावी राजनीतिक कसौटी पर परीक्षण जरूरी है।
 
                     जया प्रदा के खिलाफ आजम खान की आपत्तिजनक और अश्लील, लोमहर्षक बयानबाजी को समझने के लिए आजम खान की राजनीतिक शख्सियत को जानना-समझना जरूरी है। आजम खान की शख्सियत अराजक है, जिन्हें कानून के दायरे की परवाह ही नहीं हैं, ये समझते हैं कि उन्हें कानून के दायरे में रखने वाले लोग उनकी वोट की शक्ति से खूद दब कर राजनीतिक तौर पर हाशिये पर खडे हो जायेंगे। सही भी यही है कि आजम खान को काननू के दायरे में रखने से राजनीतिक पार्टियां अपने लिए नुकसानकुन मानती हैं, यही कारण है कि आजम खान को तरजीह देने वाली राजनीतिक पार्टियां खामोश ही रहती हैं, यह अलग बात है कि राजनीतिक पार्टियां खूद का नुकसान करती हैं, समाजवादी पार्टी की सत्ता भी आजम खान की सांप्रदायिक खेल के कारण जा चुकी है। याद कीजिये मुजफ्फरनगर दंगे को और मुजफ्फरनगर दंगे में आजम खान की भूमिका को। आजम खान ने अपराधियों को सरेआम थाने से भगवाया था, पुलिस-प्रशासन के हाथ बांध डाले थे, दुष्परिणाम  क्या हुआ, दुष्परिणाम यह हुआ कि मुजफ्फरनगर दंगों की आग में महीनों तक झुलसता रहा और समाजवादी पार्टी के खिलाफ बहुंसंख्यक समाज की भावनाएं आहत होती रही हैं, कमजोर और हाशिये पर खडी भारतीय जनता पार्टी को शक्ति मिली, समाजवादी पार्टी सत्ता से बाहर हुई, पहले केन्द्र में और बाद में उत्तर प्रदेश में भाजपा सत्तासीन हो गयी।
                              निसंदेह तौर पर भाजपा की शक्ति बढाने और भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने में आजम खान का योगदान महत्वपूर्ण है। अपनी प्रारंभिक राजनीति के समय से ही आजम खान पर आपत्तिजनक व्यवहार और बयानबाजी हावी रही है। खासकर रामजन्म भूमि आंदोलन के समय में आजम खान की आपत्तिजनक बयानबाजी और संस्कृति के खिलाफ अभियान काफी उफान भरती थी। उस काल में आजम खान ने भारत माता को डायन तक कह डाला था। भारत माता को डायन कहने पर देश भर में बडी प्रतिक्रिया हुई थी। आजम खान की बडी आलोचना हुई थी। पर आजम खान और मुलायम सिंह यादव पर कोई प्रभाव नहीं पडा था। आखिर क्यों? उस काल में देश के अंदर में तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की राजनीति हावी रहती थी, अति उदारता में संस्कृति को लांक्षित करने की राजनीतिक सक्रियता खूब चलती थी। मुलायम सिंह यादव खुद राम मंदिर आंदोलन पर गोलियां चलवायी थी, मुलायम सिंह यादव खुद मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति में कांग्रेस की दुकानदारी लुटने के अभियान में थे। इस कारण आजम खान द्वारा भारत माता को डायन कहने जैसी बयानबाजी से बहुसंख्यक वर्ग की भावनाएं आहत होने का डर नहीं था। उस काल मेें भाजपा और संध हाशिये पर खडे थे, सबसे बडी बात यह है कि देश का बहुसंख्यक वर्ग जागरूक नहीं था, देश के बहुसंख्यक वर्ग पर स्वाभिमान हावी नहीं था। पर यह भी सही है कि देश के बहुसंख्यक वर्ग को आजम खान की भारत माता को डायन कहने जैसी बयानबाजी ने सोचने-समझने और मुस्लिम तुष्टीकरण के खतरे के प्रति जागरूकता कर डाली थी। इसी जागरूकता का प्रमाण तब मिला जब उत्तर प्रदेश में पहली बार कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी थी। आजम खान की बयानबाजी सिर्फ इतनी भर नहीं है, आजम खान ने भारतीय सेना के खिलाफ भी आपत्तिजनक बयानबाजी कर चुके हैं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ ये तो हमेशा तेजाबी , नकरात्मक और आपत्तिजनक बयानबाजी करते ही रहते है।
                      आजम खान की आपत्तिजनक बयानबाजी के विमर्श में दो महत्वपूर्ण विन्दु हैं, जिस पर गौर करना चाहिए, क्योंकि दोनों विन्दु काफी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। पहला विन्दु अखिलेश यादव द्वारा नोटिस न लेना था। जिस मंच से आजम खान ने जय प्रदा के खिलाफ आपत्तिजनक बयानबाजी की थी, सरेआम जय प्रदा की छवि पर कीचड उछाली थी वह मंच चुनावी मंच था। सबसे बडी बात यह थी कि उस चुनावी मंच पर अखिलेश यादव उपस्थित थे। अखिलेश यादव की उपस्थिति में ऐसी नकारात्मक और आपत्तिजनक बयानबाजी हुई है। अखिलेश यादव मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान रह चुके हैं और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष भी हैं, इसलिए अखिलेश यादव से उम्मीद बनती थी कि वे मंच से ऐसी आपत्तिजनक बयानबाजी करने पर खुद नोटिस लेते और आजम खान को महिला का सम्मान करने की सीख देते। अगर अखिलेश यादव ऐसा करते तो फिर उनकी छवि काफी चमकती और उनकी प्रशंसा भी होती। पर अखिलेश यादव चुपचाप आपत्तिजनक बयानबाजी सुनते-देखते रहे। राजनीतिक हलकों में ऐसी चर्चा है कि जब बाप यानी मुलायम सिंह यादव को औकात आजम खान की आपत्तिजनक बयानबाजी रोकने की नहीं थी तो फिर अखिलेश यादव की औकात कहा थी? यहां औकात की बात नहीं है, यहां नैतिकता की बात थी, राजनीतिक शुचिता की बात थी, एक महिला के सम्मान की बात थी। चुनाव जीतने के नैतिक तरीके हैं, जिस पर चलकर विरोधियो को हराया जा सकता है। पर जिस पार्टी ने और जिन नेताओं ने आजम खान के सामने हमेशा नतमस्तक रहे हैं, आपत्तिजनक और नकारात्मक बयानबाजी को अपनी राजनीतिक शक्ति और मुस्लिम तुष्टीकरण का प्रतीक मान कर लाभार्थी होने का ख्याल पाल कर रखते हों, उनसे नैतिकता की उम्मीद कैसे हो सकती है, उनसे महिला सम्मान की बात की उम्मीद कैसे हो सकती है?
                       दूसरा विन्दु जय प्रदा की समाजवादी पृष्ठभूमि है। जय प्रदा समाजवादी पार्टी में रह चुकी है। समाजवादी पार्टी से जय प्रदा संसद तक पहुंच चुकी है। एक समय में जय प्रदा मुलायम सिंह यादव के लिए महत्वपूर्ण थी, समाजवादी पार्टी के लिए वंदनीय थी, उच्च कोटि की राजनीतिज्ञ थी।  तथ्य यही है कि जय प्रदा ने समाजवादी पार्टी से ही राजनीति की शुरूआत की थी। अमर सिंह के कारण वह समाजवादी पार्टी से अलग हुई। आजम खान या फिर अखिलेश यादव तक को अब जय प्रदा बुरी लग रही है, अब जय प्रदा इनके लिए संघी हो गयी। ऐसी सोच कहां तक सही है, क्या ऐसी सोच को नकरात्मक नहीं कहा जाना चाहिए? जय प्रदा कही से भी संधी पृष्ठभूमि की नहीं है। भाजपा की राजनीति में सिर्फ जय प्रदा ही नहीं बल्कि अनेकानेक नेता ऐसे हैं जो संघ पृष्ठभूमि की नहीं है, फिर भी ऐसे लोग भाजपा की राजनीति में चरम पर पहुचे हैं, भाजपा की राजनीति में चमक रहे हैं। सुषमा स्वराज इसका उदाहरण हैं। सुषमा स्वराज खुद समाजवादी पृष्ठभूमि से आकर भाजपा की राजनीति में चरम पर बैठी हुई है। सुषमा स्वराज कभी राज नारायण और जार्ज फर्नाडीस के साथ राजनीति की थी। सुषमा स्वराज के भाजपा में जाने पर जब जार्ज फर्नाडीस ने कभी कोई विरोध की बयानबाजी नहीं की थी तो फिर आजम खान जैसों को यह बयानबाजी क्यों करनी चाहिए और अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव को चुप्पी क्यों साधनी चाहिए थी? यह व्यक्ति की आजादी है कि वह कौन सी राजनीतिक पार्टी में रहता है और कौन सी राजनीतिक पार्टी में नहीं रहता है।
                     आपत्तिजनक बयानबाजी ने जिस तरह से विरोध की भावनाएं भडकायी है उससे साफ होता है कि न केवल आजम खान के लिए ही नहीं बल्कि अखिलेश यादव के लिए भी कोई शुभ राजनीतिक संदेश नहीं है। इस बयानबाजी के नकारात्मक असर न केवल रामपुर तक सीमित है, बल्कि इसका असर पूरे उत्तर प्रदेश और पूरे देश भर में फैल चुका है। खासकर समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश में इस नकारात्मक बयानबाजी का दुष्परिणाम झेलने के लिए विवश होना पड सकता है। आजम खान की जहरीले, आपत्तिजनक बयानबाजी की कसौटी पर बहुंसख्यक मतों की एकता भी बन सकती है। आजम खान के बयानबाजी के माध्यम से मुस्लिम वोट लेने के चक्कर में हिन्दू वोट से हाथ धोना पड सकता है। ऐसे में समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के लिए ऐसी बयानबाजी घाटे का राजनीतिक दुष्परिणाम हो सकता है। चुनाव आयोग और संहिताओ को सक्रिय रखने वाले संस्थानों को आजम खान जैसे आपत्तिजनक बयानबाजी करने वाले नेताओं पर संहिताओं की वीरता सुनिश्चित होनी चाहिए और महिलाओं के सम्मान को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।