अनियंत्रित आबादी की चुनौती
July 9, 2019 • राकेश रमण

भारत में किस बेलगाम तरीके से जनसंख्या का विस्फोट हुआ है इसकी तस्दीक वे आंकड़े कर रहे हैं जिनके मुताबिक भारत की अत्यंत तेजी से बढ़ रही जनसंख्या इस कदर विकराल रुप धारण कर चुकी है कि देश के सीमित संसाधनों के बलबूते पर इसके असहनीय होते बोझ को संभाल पाना दिनों दिन नामुमकिन की हद तक मुश्किल होता जा रहा है। आजादी के पहले 1941 की जनगणना के मुताबिक अखंड भारत यानी हिन्दुस्तानए पाकिस्तान और बांग्लादेश की कुल की आबादी लगभग 31 करोड़ 86 लाख थीए जो आजादी के बाद देश के विभाजन के बावजूद 1948 में साढ़े चार करोड़ बढ़ कर 36ण्10 करोड़ हो गई। इसके बाद हर दशक में औसतन 20 फीसदी की वृद्धि के साथ 2011 में देश की जनसंख्या साढ़े तीन गुना बढ़कर 121 करोड़ हो गई। हालांकि हर एक दशक के अंतराल में कराई जानेवाली देश की जनगणना के वास्तविक आंकड़े तो 2021 में सामने आएंगे लेकिन संयुक्त राष्ट्र द्वारा कराए गए अध्ययन की रिपोर्ट बताती है कि भारत की मौजूदा आबादी में 2050 तक 27ण्30 करोड़ लोग अधिक बढ़ जाएंगे जबकि द वल्र्ड पॉपुलेशन प्रॉसपेक्ट्स रिपोर्ट के मुताबिक इस सदी के आखिर तक जनसंख्या को नियंत्रित करने की नीतियों के कारण चीन की आबादी 110 करोड़ से भी कम हो जाएगी। यानी भारत का ग्राफ आगे भी आगे बढ़ता रहेगा जबकि चीन की आबादी में गिरावट का जो सिलसिला आरंभ हुआ है वह भविष्य में भी जारी रहनेवाला है। औपचारिक तौर पर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बनने के लिये भले ही भारत को अभी कुछ सालों के इंतजार की दरकार हो लेकिन हकीकत यह है कि उपलब्ध जमीन पर निवास करने वाली आबादी के आंकड़ों के नजरिये से देखें तो भारत उस सर्वोच्च शिखर को पहले ही हासिल कर चुका है। दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाले देशों की सूची को देखें तो 147 करोड़ जनसंख्या के साथ भले ही चीन सबसे आगे हो लेकिन 137 करोड़ की आबादी वाला भारत दूसरे नंबर से छलांग लगाकर पहले नंबर पर पहुंचने का सफर शीघ्र की तय करने जा रहा है। सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बनने की होड़ में भारत और चीन को टक्कर देने की स्थिति में कोई भी देश दूर.दूर तक दिखाई नहीं पड़ रहा है क्योंकि तीसरा सर्वाधिक आबादी वाल देश अमेरिका है जहां की कुल जनसंख्या महज 32ण्90 करोड़ ही है जबकि 27ण्10 करोड़ की आबादी वाला इंडोनेशिया इन तीनों के नीचे आता है। यानी अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच तीसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश बनने की होड़ तो हो सकती है लेकिन पहले या दूसरे नंबर तक पहुंच पाना इन दोनों मुल्कों के लिये आगामी कई दशकों तक ही नहीं बल्कि कई सदियों तक नामुमकिन की हद तक मुश्किल ही बना रहेगा। सर्वाधिक आबादी वाले देश के तौर पर दुनिया की 18 फीसदी आबादी के साथ भारत और 19 फीसदी आबादी के साथ चीन ही अगले कई दशकों तक पहले और दूसरे स्थान पर काबिज रहने वाले हैं। इसमें भी चीन को भारत की ओर से अब सिर्फ चुनौती ही नहीं मिल रही है बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा कराये गये विस्तृत अध्ययन के बाद बीते दिनों जारी की गई द वल्र्ड पॉपुलेशन प्रॉसपेक्ट्स. 2019 रिपोर्ट के अनुसार जिस तेज गति से भारत में आबादी बढ़ रही है उसे देखते हुए सर्वाधिक जनसंख्या के मामले में भारत वर्ष 2027 में चीन से आगे निकल जाएगा। जनसंख्या की यह असमान और अनियंत्रित वृद्धि भारत के विकास के मार्ग में बहुत बड़ा अवरोधक है। लगातार कोशिशों के बावजूद मानव विकास सूचकांक में भारत अभी भी श्रीलंका और मालदीव जैसे छोटे देशों से भी निचले स्तर पर 131 वें स्थान पर है। शिक्षा सूचकांक में भारत 145 देशों में 92 वें स्थान पर नेपालए युगांडा और माले जैसे छोटे देशों से भी नीचे है और यही हालत आबादी की खुशहाली के मामले में है जिसके आंकड़ों में हमारा छोटा सा पड़ोसी देश भूटान भी हमले कहीं अधिक ऊपर के पायदान पर है। जनसंख्या की यह बेलगाम व बेतहाशा वृद्धि दर न सिर्फ देश के विकास की राह में बाधक बन रही है बल्कि भ्रष्टाचारए बेरोजगारीए आर्थिक विषमताए अशिक्षाए कुपोषण जैसी गंभीर समस्याओं की जड़ में भी यह मसला ही है। कहने को भले ही तीन ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था के तौर पर मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल का बजट प्रस्तुत किया हो और देश को पांच ट्रिलियन डाॅलर की अर्थव्यवस्था बनाने का सपना दिखाया जा रहा होए लेकिन इस भारी.भरकम धनराशि को आबादी के आंकड़ों से विभाजित करें तो आसानी से यह पता चल जाता है कि देश के विकास में जनसंख्या का भारी.भरकम बोझ किस कदर अवरोधक के तौर पर अड़ा हुआ है। लेकिन आबादी में तेज गति से वृद्धि की वजहों की तलाश के लिये कराये गये संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट से यह भी खुलासा हुआ है कि भारतए इंडोनेशियाए पाकिस्तानए मेक्सिकोए फिलीपींस और मिस्र सरीखे दुनिया के जिन देशों में आबादी की वृद्धि दर सबसे तेज है वहां की महिलाएं पूरे जीवन में औसतन चार बच्चे पैदा करती हैं। इस लिहाज से सुरेश चव्हाणके के नेतृत्व में संचालित राष्ट्र निर्माण संगठन द्वारा जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग के साथ आगे बढ़ाये जा रहे हम दो हमारे दो तो सबके दो के नारे की गंभीरता को समझते हुए योगी आदित्यनाथ व कमलनाथ सरीखे नौ मुख्यमंत्रियोंए सभी महिला सांसदों सहित 282 सांसदोंए हजारों विधायकोंए लाखों पंचायत व स्थानीय निकाय के प्रतिनिधियों और तकरीबन साढ़े छह करोड़ से भी अधिक लोगों ने औपचारिक तौर पर दस्तखत करके आबादी पर नियंत्रण के लिये कठोर कानून बनाने की जो बात कही है उसके लिये निश्चित ही मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। खास तौर से इस तथ्य को जानने के बाद कि बकौल चव्हाणके एक ओर बहुसंख्यक हिंदू समाज परिवार कल्याण को अपना कर कम बच्चे पैदा कर सरकार की नीतियों का अनुसरण कर रहा हैए तो दूसरी ओर अल्पसंख्यक समाज में अनियंत्रित जन्मदर आदर्श जनसांख्यिकीय अनुपात के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर रहा है। ऐसे में जनसंख्या नियंत्रण का कठोर कानून बनाने पर किस वर्ग की भावनाएं आहत होंगी और किसके हितों पर प्रहार होगा यह बात किसी से छिपी नहीं है। लिहाजा जरूरत है आबादी के भारी भरकम बोझ के नुकसान को लेकर लोगों को जागरूक करने की और हम दो हमारे दो तो सबके दो के विचारों को कठोरता से लागू करने के लिये आवश्यक राजनीतिक इच्छाशक्ति के प्रदर्शन की।