अपने ही जाल में फंसते नितीश
August 11, 2019 • राकेश रमण
इन दिनों हर किसी के मन में यही सवाल कौंध रहा है कि क्या बिहार की राजनीति एक बार फिर बड़ी करवट लेने के लिये तैयार हो रही है। यह सवाल इसलिये उठ रहा है क्योंकि सूबे की सियासत को संचालित कर रहे भाजपा और जदयू के गठबंधन में अब मिठास कम और खटास अधिक दिखाई पड़ रहा है। खास तौर से सैद्धांतिक और वैचारिक मसलों को लेकर पैदा हुई दूरी अब टकराव की ओर बढ़ती दिख रही है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार के बीच निजी स्तर पर कभी स्नेह और विश्वास का संबंध रहा ही नहीं है। यह बात भी किसी से छिपी हुई नहीं है कि भाजपा में मोदी के बढ़ते वर्चस्व से नाराज होकर ही नितीश कुमार ने लालू यादव के साथ मिलकर महागठबंधन की नींव रखी लेकिन बाद में राजद के साथ तालमेल नहीं बैठ पाने के नतीजे में उन्हें दोबारा भाजपा का सहयोग लेने के लिये मजबूर होना पड़ा। हालांकि भाजपा ने उनकी पिछली गलतियों को भुला कर आगे बढ़ने की राह पकड़ने में देर नहीं की लेकिन नितीश की महत्वाकांक्षाओं ने अब एक बार फिर ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें भाजपा के आम कार्यकर्ताओं के लिये भी जदयू के साथ सहज होकर काम करना मुश्किल हो चला है। अव्वल तो नितीश के समक्ष भाजपा को इतना झुकना ही नहीं चाहिये था कि 2014 में 22 सीटें जीतने के बाद 2019 में जदयू को सम्मानजनक तादाद में सीटें देने के लिये वह सिर्फ 15 सीटों पर ही लड़ी और अपनी जीती हुई सात सीटें उसने छोड़ दीं। भाजपा के इस कदम से जदयू की महत्वाकांक्षाओं को पंख लग गये और इसी का नतीजा रहा कि जब अपने दम पर 303 सीटें जीतकर भाजपा ने सत्ता में वापसी की और सहयोगियों को प्रतीकात्मक तौर पर सत्ता में भागीदारी करने का मौका देना चाहा तो बाकी सभी सहयोगी इसके लिये सहमत हो गए लेकिन नितीश को यह गवारा नहीं हुआ। कहने को तो उन्होंने राजी-खुशी सरकार में साझेदारी करने से इनकार किया लेकिन उनके मन में इसकी फांस कितने गहरे तक धंस गई कि उसके जहर को वे ज्यादा दिनों तक पचा नहीं पाए और उन्होंने बिहार में मंत्रिमंडल का विस्तार करके आनुपातिक तौर पर भाजपा की भागीदारी बढ़ाने से परहेज बरत लिया। उन्हें उम्मीद थी कि इससे चिढ़ कर भाजपा की ओर से कुछ तीखी प्रतिक्रिया अवश्य सामने आएगी लेकिन भाजपा ने बेहद सहज भाव से इसकी अनदेखी कर दी तो अंदरखाने नितीश का तिलमिलाना स्वाभाविक ही था। उसके बाद उन्होंने भाजपा को चिढ़ाने के लिये और जमीनी स्तर पर जदयू के कार्यकर्ताओं को कूटनीतिक संदेश देने के लिये सार्वजनिक तौर पर यह बयान दे दिया कि चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर यानी पीके को जदयू में शामिल करने की सिफारिश भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने की थी और उनके अनुरोध पर ही पीके पार्टी में बड़ा ओहदा भी दिया गया है। इस बयान को भी भाजपा ने ज्यादा गंभीरता से लेने की पहल नहीं की और ऐसा दर्शा दिया मानो ऐसे खुलासे से उसको कोई मतलब ही नहीं है। वह गुगली भी बेकार हो जाने के बाद नितीश ने सैद्धांतिक व वैचारिक मसलों पर भाजपा को चिढ़ाने व खिझाने की राह पकड़ ली और उन तमाम मसलों पर भाजपा का नीतिगत विरोध आरंभ कर दिया जो भाजपा के लिये कूटनीतिक व भावनात्मक तौर पर काफी मायने रखते हैं। मसलन असम में एनआरसी के मुद्दे पर भाजपा के रूख से नितीश लगातार असहमति जताते आ रहे हैं जबकि उससे बिहार का कोई लेना-देना ही नहीं है। वह पूरी कवायद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और उसकी ही देखरेख में अवैध तरीके से असम में रह रहे बांग्लादेशी व रोहिंग्या घुसपैठियों की पहचान करने के लिये चल रही है जिसका पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अगर विरोध कर रही हैं तो उसे सार्थक राजनीति इसलिये कहा जा सकता है क्योंकि ममता के तृणमूल कांग्रेस की असम में भी पकड़ है और यह मुद्दा पश्चिम बंगाल के काफी बड़े सरहदी इलाके में भावनात्मक तौर पर असर रखता है। लेकिन बिहार में इसका विरोध किया जाना तो बेतुका ही है। वह भी इस उम्मीद में कि एक ओर भाजपा को चिढ़ाया जाए और दूसरी ओर इससे बिहार के धुर भाजपा विरोधी मतदाताओं की संवेदना को सहलाकर अपने लिये उनके मन में एक साॅफ्ट कार्नर बनाया जा सके। लेकिन जब इस पर भी भाजपा ने नितीश के खिलाफ कुछ नहीं कहा तो उन्होंने तीन तलाक के खिलाफ लाए गए विधेयक का विरोध आरंभ कर दिया। भाजपा ने उसकी भी अनदेखी कर दी तो अब कश्मीर में धारा 370 और 35ए को निरस्त किये जाने के मसले पर नितीश ने नया बखेड़ा शुरू कर दिया है। जाहिर है कि यह मसला निपटने के बाद वे फिर कोई मुद्दा निकाल लाएंगे ताकि भाजपा के खिलाफ जहर उगल सकें और उसे गलत साबित कर सकें। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर नितीशबाबू चाह क्या रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि वे यह सब खुराफात इसलिये कर रहे हों ताकि भाजपा खुद ही  चिढ़कर या तैश में आकर उनकी सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की पहल कर दे। वैसे भी इतना तो वे समझ ही चुके हैं कि भाजपा के रणनीतिकारों के साथ उनकी जितनी दूरी बन गई है उसके बाद अब वे इस गठबंधन में अपना वर्चस्व बरकरार रखने में लंबे समय तक कामयाब नहीं रह सकते हैं। ऐसे में उन्हें अपना ठौर-ठिकाना भी तलाशना होगा और अपनी छवि को पलटूराम के तौर पर नयी पहचान में ढ़लने से भी बचाना होगा। अगर उन्होंने ठीक वैसे ही भाजपा से अलग होकर राजद के साथ सरकार बनाने की पहल की जैसा कि वे पिछली बार राजद से अलग होकर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने की कर चुके हैं तो उनकी छवि की विश्वसनीयता के धुर्रे बिखर जाएंगे। वैसे भी छवि के अलावा उनके पास कुछ और जमा-पूंजी भी नहीं है। ना मजबूत संगठन है और ना ही कोई बड़ा जातीय वोटबैंक। ले दे कर एक छवि है जिसके सहारे वे राजद को भी दोबारा ललचा रहे हैं और भाजपा के सब्र की भी परीक्षा ले रहे हैं। लेकिन उनकी ओर से फेंके जा रहे तमाम खुराफाती बाउंसरों को भाजपा जिस सहजता से खेल व झेल रही है उससे इतना तो साफ है कि इस बार पेट में भी दांत होने की उनकी मारक कूटनीति का वह कड़ा इम्तहान लेनेवाली है।