अमेरिकी दादागीरी के निशाने पर ईरान
June 22, 2019 • राकेश रमण

अमेरिका और ईरान का तनाव अब अपने चरम की ओर बढ़ता दिख रहा है। जहां एक ओर बीते दिनों ईरान ने अमेरिका के जासूसी ड्रोन को मार गिराया वहीं अमेरिका ने ईरान पर हमले की अंतिम चेतावनी जारी कर दी हैं। हालांकि राष्ट्रपति डाॅनल्ड ट्रंप ने तो ईरान के तीन ठिकानों पर हमले के आदेश भी जारी कर दिया था लेकिन इस पर अमल से पूर्व जब उन्हें पता चला कि इसमें कम से कम डेढ़ सौ लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ेगी तो अंतिम समय में उन्होंने इस आदेश पर अमल करने से अपनी सेना को रोक दिया। हालांकि उनकी यह कथित मानवीय सोच कब तक कायम रहेगी इसके बारे में कुछ भी कुछ भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन समूचा विश्व अमेरिका की मंशा को भांप चुका है और इसी का नतीजा है कि अब ईरान के हवाई क्षेत्र से अंतराष्ट्रीय उड़ाने नहीं गुजर रही हैं। दूसरी ओर अमेरिका ने ईरान के इर्द-गिर्द समुद्री क्षेत्र में अपनी सैन्य तैनाती बढ़ाने की कवायदें काफी तेज कर दी हैं। बहाना बनाया जा रहा है बीते सप्ताह ओमान की खाड़ी में तेल के दो टैंकरों पर हुए हमलों को। इसकी प्रतिक्रिया में अमरीकी रक्षा विभाग ने घोषणा की है कि यह अरब की खाड़ी में सुरक्षा की जिम्मेदारी सम्हालने के लिए 1000 सैनिकों की अतिरिक्त टुकड़ियाँ भेज रहा है। आज भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने खुले शब्दों में ईरान को अपनी बेहतरीन तकनीक सबसे सशक्त सेना की धमकी देते हुए यह बताने में कोई संकोच नहीं किया है कि अगर उन्हें अपनी मानवीय सोच से आगे बढ़कर कदम उठाना पड़ा तो यह किस कदर विध्वंसात्मक हो सकता है। बल्कि पूर्ववर्ती ओबामा प्रशासन द्वारा ईरान की आर्थिक मदद को गलत कदम ठहराते हुए जिस तरह से ट्रंप ने अपने द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण ईरान के बेहद कमजोर हो जाने को संतोषजनक करार दिया है उससे यह साफ है कि आज भले ही उन्होंने ईरान पर हमले का आदेश वापस लेने को अपनी मानवतावादी व संवेदनशील सोच को आगे रखने की कोशिश की हो लेकिन उनकी सोच में ईरान के प्रति कोई संवेदना नहीं है। उन्होंने ईरान के कथित परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने की आड़ लेकर जिस तरह से उसके खिलाफ घेराबंदी करने की कोशिश की है उससे एक बार फिर इराक के खिलाफ की गई अमेरिकी कार्रवाई की याद ताजा हो गई है जिसके तहत अमेरिका ने इराक पर रासायनिक हथियार जमा करने का इल्जाम लगाकर उस पर चढ़ाई कर दी और एक खुशहाल देश को पूरी तरह बर्बाद कर दिया और एक बेहतरीन प्रशासक सद्दाम हुसैन को मौत के घाट उतार दिया गया। एक बार फिर अमेरिका ने ईरान पर वही दांव आजमाने की पहल की है और उसे तबाहो-बर्बाद करने के लिये वह तड़प रहा है। हालांकि इराक युद्ध के समय ना तो रूस स्थिति में था कि वह अमेरिकी दादागीरी का प्रतिरोध कर सके और ना ही चीन की ऐसी हैसियत थी कि वह उसमें उलझने की जहमत उठाता। यहां तक कि भारत भी इराक के साथ तमाम सहानुभूतियों के बावजूद उफ तक कर पाने की स्थिति में नहीं था। लेकिन आज विश्व मानचित्र पर ना तो अमेरिका उतना सशक्त है और ना ही बाकी देश इतने कमजोर कि वे कुछ कहने या करने की स्थिति में ही ना हो। यही वजह है कि अमेरिका भी जल्दबाजी में कोई कदम उठाने से हिचक रहा है और फूंक-फूंक कर और संभल-संभल कर कदम आगे बढ़ा रहा है। हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच दिनोंदिन बढ़ते तमाम तनावों और तनातनी के बीच रूस, चीन, फ्रांस, यूके तथा जर्मनी जैसी अन्य वैश्विक शक्तियां तनावों के कम होने की आशा कर रहीं हैं, लेकिन ये ताकतें अब तक किसी प्रकार की महत्वपूर्ण पहल करने में असफल रहीं हैं। जापानी प्रधानमंत्री, शिंजो आबे की गत महीने की ईरान यात्रा को ईरान के वाकयुद्ध को कम करने और इसे समझाने तथा शांति और स्थिरता बनाए रखने में “एक रचनात्मक भूमिका” निभाने की एक पहल के रूप में देखा जा रहा है लेकिन इसका भी कोई बड़ा प्रभाव या असर नहीं हुआ है। दूसरी ओर ईरान विद्रोही तेवर अपना चुका है। यह सैन्य कार्रवाइयों की आशंकाओं के सामने झुकने से इंकार कर चुका है तथा यह दृढ़तापूर्वक कहता है कि किसी प्रकार की सैन्य कार्रवाई के विरुद्ध खुद की रक्षा करने की योग्यता तथा अधिकार इसे है। ईरान को ख्ुाला सहयोग चीन से भी मिल रहा है और रूस से भी जो अमेरिकी हरकतों से असहमति जताते हुए इसकी कड़ी आलोचना कर चुके हैं। इससे यह पता चलता है कि ईरान पूरी तरह से अलग-थलग नहीं है तथा किसी प्रकार की गंभीर घटना एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष का रूप ले सकती है। लिहाजा अव्वल तो अमेरिका को ईरान के खिलाफ दिखाई जा रही दादागीरी पर पुनर्विचार करने की जरूरत है और दूसरे उसे यह समझने की आवश्यकता है कि किसी भी सभ्य समाज में युद्ध कोई विकल्प नहीं हो सकता। ऐसा कोई मसला नहीं है जिसे बातचीत से सुलझाया ना जा सकता हो। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर कोरिया है जिसे सिर्फ आर्थिक प्रतिबंधों के दम पर दाने-दाने के लिये इस कदर मोहताज कर दिया गया है कि वहां दक्षिण कोरिया को दया दिखाते हुए पचास हजार टन चावल की मानवीय सहायता उपलब्ध कराने के लिये आगे आना पड़ा है। आज स्थिति यह है कि उत्तर कोरिया घुटनों पर आ चुका है और वह विश्व समुदाय की मुख्य धारा के साथ जुड़ने के लिये कभी चीन के समक्ष गुहार लगाता है तो कभी रूस के समक्ष। यहां तक कि अमेरिका की तमाम शर्तों को मानने के लिये भी वह तैयार होता दिख रहा है और उसी के नतीजे में बीते दिनों चीनी राष्ट्रपति ने पहली बार उत्तर कोरिया की यात्रा भी की है। एसे ही विकल्पों पर ईरान के खिलाफ भी विचार किया जा सकता है और उसे विश्वबिरादरी के अनुकूल राह पर आगे बढ़ने के लिये विवश किया जा सकता है। लेकिन इसके लिये संयुक्त राष्ट्र के मंच का इस्तेमाल किया जाना अधिक तर्कसंगत होगा। विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति होने का यह मतलाब नहीं हो सकता कि वह जिस देश या संगठन को जब चाहे खुली छूट दे और जब चाहे उसके गले पर शिकंजा कस दे।