आज पिया होरी खेलन आए
March 19, 2019 • डॉ मोनिका ओझा खत्री

फागुन आते ही पूरे देश पर होली का खुमार चढ़ने लगता है। रंग और उल्लास के इस मौसम में गीत और संगीत की रौनक देखते ही बनती है। होली के रंग और संगीत के सात सुर मिल कर जीवन में मधुरता घोल देते हैं। रंगों से खेलते समय मन में खुशी, प्यार और उमंग छा जाता हैं। तन मन स्वतः नृत्य करने को मचल उठता है। लय और ताल के साथ पैर को रोकना मुश्किल हो जाता है। रंग अपना असर बताते हैं सुर और ताल अपनी धुन में सब को डुबोये चले जाते हैं।

हिंदी फिल्मों के गीत भी होली के रंग से अछूते नहीं रहे हैं। होली के सतरंगी रंगों के साथ सात सुरों का अनोखा संगम देखने को मिलता है! रंगों से खेलते समय मन में खुशी, प्यार और उमंग छा जाते हैं और अपने आप तन मन नृत्य करने को मचल उठता है। लय और ताल के साथ पैर को रोकना मुश्किल हो जाता है। रंग अपना असर बताते हैं, सुर और ताल अपनी धुन में सब को डुबोये चले जाते हैं! बॉलीवुड के गानों के बिना होली का रंग बेरंग है। अगर रंग, भांग की मस्ती और मीठी छेड़छाड़ के साथ ही बॉलिवुड के रंगीन गानों को भी जोड़ा जाए तो होली का मजा दोगुना हो सकता है।
शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है। ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है। कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं - चलो गुंइयाँ आज खेलें होरी कन्हैया घर। इसी प्रकार संगीत के एक और अंग ध्रुपद में भी होली के सुंदर वर्णन मिलते हैं। ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोक के बोल देखिए-
खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी,
कंचन पिचकारी करण, केसर रंग बोरी आज।
भीगत तन देखत जन, अति लाजन मन ही मन,
ऐसी धूम बृंदाबन, मची है नंदलाल भवन।
धमार संगीत का एक अत्यंत प्राचीन अंग है। गायन और वादन दोनों में इसका प्रयोग होता है। यह ध्रुपद से काफी मिलता जुलता है पर एक विशेष अंतर यह है कि इसमें वसंत, होली और राधा कृष्ण के मधुर गीतों की अधिकता है। इसे चैदह मात्रा की धमार ही नाम की ताल के साथ विशेष रूप से गाया जाता है इसमें निबद्ध एक प्रसिद्ध होली के बोल हैं - आज पिया होरी खेलन आए । भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं। बसंत, बहार, हिंडोल और काफी ऐसे ही राग हैं। बसंत राग पर आधारित -
फगवा ब्रज देखन को चलो रे,
फगवे में मिलेंगे, कुँवर कां
जहाँ बात चलत बोले कागवा।
बहार राग पर आधारित ष्छम छम नाचत आई बहारश्श्
और काफी में -
आज खेलो शाम संग होरी
पिचकारी रंग भरी सोहत री। प्रसिद्ध बंदिशें हैं।
होली पर गाने बजाने का अपने आप वातावरण बन जाता है और जन जन पर इसका रंग छाने लगता है। इस अवसर पर एक विशेष लोकगीत गाया जाता है जिसे होली कहते हैं। अलग-अलग स्थानों पर होली के विभिन्न वर्णन सुनने को मिलते है जिसमें उस स्थान का इतिहास और धार्मिक महत्व छुपा रहता है। जहाँ ब्रज धाम में राधा और कृष्ण के होली खेलने के वर्णन मिलते हैं वहीं अवध में राम और सीता के। जैसे गुजरात में नवरात्र, महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी, पंजाब में बैसाखी, दक्षिण भारत में पोंगल, बंगाल में दुर्गा पूजा, को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है और महत्व दिया जाता है, ऐसे ही राजस्थान में होली का बहुत महत्व है और इन त्योहार में संगीत का एक अलग ही स्थान रहा है। संगीत बिना इन सब त्योहारों की कल्पना भी करना मुश्किल-सा लगता है।