आतंक पर आक्रामक प्रहार
July 15, 2019 • राकेश रमण
भारत को समूचा विश्व साॅफ्ट नेशन के तौर पर जानता है। एक ऐसा देश जो अपनी सरहदों का उल्लंघन करने के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकता। भले ही उस पर कितना ही प्रहार क्यों ना किया जाए और उसे कितनी ही तकलीफों का सामना क्यों ना करना पड़े। वास्तव में समूची दुनिया अगर ऐसा सोचती रही है तो इसमें कुछ गलत भी नहीं है। अगर श्रीलंका में जारी गृहयुद्ध को समाप्त करने और लिट्टे का संहार करने के लिये शांति सेना भेजने की की घटना और उससे पहले बांग्लादेश की आजादी में सक्रिय व निर्णायक भूमिका निभाए जाने की घटना को अपवाद के तौर पर स्वीकार कर लिया जाए तो भारत ने हमेशा ही अपनी सरहदों के भीतर रह कर ही अपनी आत्मरक्षा सुनिश्चित की है। यहां तक कि बांग्लादेश के निर्माण और श्रीलंका में शांतिसेना भेजने की पहल के पीछे भी भारत की आक्रामक नीति कतई नहीं थी बल्कि जहां एक ओर पाकिस्तान ने भारत पर युद्ध थोपने की गलती करके अपने पैर पर खुद ही कुल्हाड़ी मारा था वहीं लिट्टे ने भी श्रीलंका सरकार के लिये सिरदर्दी पैदा करने में कामयाबी हासिल करने के बाद भारत को भी आंखें दिखाने और भारत के काफी बड़े दक्षिणी हिस्से में अशांति पैदा करके भारत को विभाजित करने की दुष्टता भरी नीति पर कदम बढ़ाने की गलती की थी। लिहाजा इन दोनों घटनाओं को भी भारत द्वारा आत्मरक्षा में उठाए गए कदम के नजरिये से देखा जाना ही उचित होगा और इसी वजह से विश्व बिरादरी ने भी इन दोनों मामलों में भारत के पक्ष को उचित व जायज ही माना था। लेकिन साॅफ्ट नेशन के तौर पर वैश्विक शांति को अक्षुण्ण रखने का प्रयास करने की जितनी बड़ी कीमत भारत को चुकानी पड़ी है उसके आंकड़ों को समेट कर अगर एक जगह प्रस्तुत किया जाये तो किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कांप जाएगी। यह साॅफ्ट नेशन होने की ही तो कीमत चुकाई जा रही है कि जम्मू कश्मीर का भारत में बिना शर्त विलय को समझौता हो जाने के बाद भी अज तक भारत ने सूबे का वह हिस्सा अपने कब्जे में लेने और पाकिस्तान का अवैध कब्जा खत्म कराने के लिये सैन्य विकल्प आजमाने की पहले करने के बारे में विचार करना भी गवारा नहीं किया है। वर्ना अगर सैन्य ताकत के दम पर जम्मू कश्मीर को खाली कराने की नीति को अमले में लाने पर विचार भी किया गया होता तो तीन औपचारिक युद्धों में पाक को घुटने पर लाकर धूल चटाने के बाद जब शांति का समझौता करते हुए युद्ध विराम पर सहमति जताई गई तब उसे कश्मीर से अपना अवैध कब्जा समाप्त करने के लिये विवश किया जा सकता था और तीनों ही युद्ध में करारी हार के बाद उसके पास भारत की हर शर्त को स्वीकार करने से इनकार करने की हिम्मत ही नहीं हो सकती थी। लेकिन सैन्य टकराव में बढ़त का लाभ उठाकर अपने हितों को सुनिश्चित करने के विकल्प पर भारत ने कभी विचार करने की जहमत भी नहीं उठाई। दूसरी ओर हमारा मुकाबला ऐसे कायर देश से होता रहा जो तीन औपचारिक लड़ाइयों में करारी हार के बाद भी अपनी गलती सुधारने के बारे में कभी सोचा भी नहीं बल्कि उसकी नीति हमेशा ही भारत को अधिकतम नुकसान पहुंचाने पर ही केन्द्रित रही। इसके लिये उसने आतंकवाद को बकायदा नीति के तौर पर अमल में लाने से भी गुरेज नहीं किया और सरहद के ठीक उस पार उसने आतंकियों की बड़ी फौज खड़ी कर दी जिसने बार बार भारत में घुसकर अपनी नापाक वारदातों को अंजाम देने का सिलसिला लगातार जारी रखा। लेकिन भारत ने इसके बाद भी अपनी नीति नहीं बदली और उस दिशा में कदम नहीं बढ़ाया कि देश के बाहर से भारत को नुकसान पहुंचाने का षड़यंत्र रचने वालों पर लगाम लगाई जा सके। इसी का नतीजा रहा कि भारत में आतंकी वारदातों को अंजाम देकर पड़ोसी मुल्क में पनाह लेने वालों की कतार लगातार लंबी होती रही और भारत की खुफिया एजेंसी राॅ केवल उनकी जानकारियां जुटाने से अलावा और कुछ नहीं कर पाई। वास्तव में राॅ का जैसा कि नाम ही रिसर्च एंड एनलायसिस विंग है उसी तर्ज पर वह काम भी करती है। विदेशी जमीन से जानकारियां जुटाने और उसकी तफ्तीश करने का काम तो राॅ बखूबी करता रहा है लेकिन उसे अपनी जानकारियों के आधार पर कोई कार्रवाई करने का अधिकार ही नहीं रहा है। जबकि दुनिया के तमाम देशों के पास ऐसी एजेंसियां है जो विदेशी जमीन पर हो रहे षड़यंत्र को समाप्त करने के लिये किसी भी सीमा से गुजरने में नहीं हिचकती हैं। इसी कमी को दूर करने के लिये अब भारत ने भी अपनी एनआईए को ऐसे अधिकार दिये हैं कि वह विदेश की जमीन पर रह कर भारत विरोधी गतिविधियां संचालित करने या भारत में गड़बड़ी करके विदेश भाग जाने वालों पर सरहद पार जाकर भी कार्रवाई कर सकती है। हालांकि इसके लिये अंतराष्ट्रीय संबंधों व नीतियों को ध्यान में रखना तो अनिवार्य ही रहेगा लेकिन आज लोकसभा में सिर्फ छह विरोधी वोटों के मुकाबले बाकी पूरे सदन के समर्थन से पारित किये गये एनआईए संशोधन विधेयक के लागू होने के बाद अब राॅ को एक ऐसा दाहिना हाथ मिल जाएगा जो उसके द्वारा जुटाई गई जानकारियों के आधार पर खुले तौर पर कार्रवाई भी कर सकेगी। इसके अलावा एनआइए की विशेष अदालतों में परोक्ष तौर पर हस्तक्षेप करके न्याय प्रक्रिया को धीमा करने के लूप होल को भी समाप्त कर दिया गया है और जिन क्षेत्रों में जांच के लिये एनआइए के हाथ बंधे हुए थे वहां भी वह अपनी मजबूत पकड़ बनाकर भारत विरोधी तत्वों को उनके अंजाम तक पहुंचाने में सक्षम हो जाएगी। इस विधेयक को पारित कराने के क्रम में गृह मंत्री अमित शाह का यह कहना बेहद महत्वपूर्ण है कि सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक करके भारत ने बता दिया है कि आतंक के खिलाफ कार्रवाई का मतलब क्या होता है? शाह के इस संकेत से इतना तो साफ है कि भारत के सीने को खरोंच कर विदेश में ऐश करने वालों से निपटने का अब ठोस इंतजाम कर लिया गया है और इसका नतीजा भी शीघ्र ही दिखाई पड़ने की उम्मीद करना कतई गलत नहीं होगा।