इंसाफ मांगती कारसेवकों की लाशें
February 2, 2019 • राकेश रमण
आज एक अंग्रेजी न्यूज चैनल का हिन्दी संस्करण आरंभ हुआ तो उसने पहले ही बड़ा धमाका करते हुए राम मंदिर आंदोलन के दौरान निहत्थे कारसेवकों पर चलाई गई पुलिस की गोली के मामले में ऐसा खुलासा किया जिसे जानकर किसी के भी रोंगटे हो जाएं। हालांकि यह बात किसी से छिपी नहीं है कि राम मंदिर आंदोलन के लिये रथ लेकर पूरे देश को जगाने के निकले लालकृष्ण आडवाणी ने जब बिहार की सरहद में प्रवेश किया तो तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने उनके रथ के पहिये को रोक दिया और आडवाणी को गिरफ्तार करा दिया। लालू के इस कदम ने उन्हें रातों-रात अल्पसंख्यकों का मसीहा और धर्मनिरपेक्षता का सबसे बड़ा चेहरा बना दिया। लालू को राजनीतिक फलक पर आगे बढ़ता हुए देखकर यूपी के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने उससे भी बड़ा कदम उठा लिया और उन्होंने पुलिस को निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। उस एक घटना ने बिहार में लालू के साथ और यूपी में मुलायम के साथ हिन्दुत्व विरोधी वोटों को ऐसा जोड़ा कि वह आज भी उनके साथ जुड़ा हुआ है। तभी तो मुलायम को कारसेवकों पर गोली चलवाने का कभी अफसोस नहीं हुआ बल्कि वे आज तक बड़े गर्व के साथ यह बताते आ रहे हैं कि उन्होंने भारत में धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिये ऐसा कदम उठाया था और अगर इसके लिये उन्हें इससे बड़ा कदम भी उठाना पड़ता तो वे उससे पीछे नहीं हटते। खैर, अब तो यह सब बीते वक्त की बातें हो चुकी हैं और अब तक यही माना जाता रहा कि उस घटना में कुल सोलह कारसेवकों की मौत हुई थी और तकरीबन चालीस से अधिक कारसेवक गोली लगने से घायल हुए थे। लेकिन आज एक नये-नवेले चैनल ने अपने पदार्पण के साथ ही जो खुलासा किया है वह ना सिर्फ हैरान-परेशान और दुखी करनेवाला है बल्कि इस बात को लेकर जागरूक करनेवाला है कि आखिर अपनी राजनीति चमकाने के लिये किस सरहद को लक्षमण रेखा के तौर पर देखा जाए। अयोध्या में 1990 में यूपी की मुलायम सिंह सरकार के दौरान कारसेवकों पर पुलिस की गोलीबारी के मामले में चैनल ने खुलासा किया है कि उस गोली कांड में ठीक उसी प्रकार निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलाई गई जैसे जलियावाला बाग में निहत्थे लोगों को घेरकर नरसंहार को अंजाम दिया गया था। दावा किया गया है उस घटना में सिर्फ आठ कारसेवकों की ही जान नहीं गई थी बल्कि सैकड़ों कारसेवकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। दावा यह भी किया गया कि पुलिस ने गोली चलाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा कि उसकी गोली सीधा सीने से ऊपर ही लगे ताकि जान बचने की नौबत ही ना बचे। जबकि अमूमन अगर भीड़ के हिंसक हो जाने पर अगर पुलिस को गोली चलानी भी पड़ती है तो उसे अंतिम समय तक यह ध्यान रखना होता है कि गोली कमर के नीचे लगनी चाहिये। इसके अलावा खुलासा यह भी हुआ है कि मृतकों की तादाद को कम करके दिखाने के लिये हिन्दू कारसेवकों की लाशों का हिन्दू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार भी नहीं होने दिया गया बल्कि उसे गड्डा खोद कर जमीन के नीचे दफन कर दिया गया। हालांकि इन बातों को अफवाह व मनगढ़ंत भी माना जा सकता था क्योंकि इस मामले को लेकर जांच भी हो चुकी है और उसकी रिपोर्ट में ऐसी किसी बात का जिक्र नहीं हुआ है। लेकिन जांच कैसी हुई और किस तरह से जांच के नाप पर लीपापोती की गई यह बात भी सामने आ गई है। साथ ही यह भी सामने आया है कि नरसंहार के इस पूरे प्रकरण को जिलाधिकारी व पुलिस कप्तान के स्तर से निर्देशित व संचालिनत किया गया जिसमें पुलिस के निचले अधिकारियों व इंस्पेक्टर, दारोगा, हवलदार या सिपाही की हैसियत सिर्फ एक मोहरे भर की ही थी। यह पूरा खुलासा हुआ है चैनल द्वारा उस व्यक्ति का स्टिंग किये जाने से जो घटना के वक्त उस इलाके के थाने का प्रभारी था। रामजन्मभूमि थाने के तत्कालीन एसएचओ वीर बहादुर सिंह को इस स्टिंग में बताते हुए दिखाया गया है कि कारसेवकों के मौत का जो आंकड़ा बताया गया था, उससे ज्यादा कारसेवकों की मौत हुई थी। वीर बहादुर सिंह के शब्दों में, ‘‘घटना के बाद विदेश तक से पत्रकार आए थे। उन्हें हमने आठ लोगों की मौत और 42 लोगों के घायल होने का आंकड़ा बताया था। हमें सरकार को रिपोर्ट भी देनी थी तो हम तफ्तीश के लिए श्मशान घाट गए, वहां हमने पूछा कि कितनी लाशें हैं जो दफनाई जाती हैं और कितनी लाशों का दाह संस्कार किया गया है, तो उसने बताया कि 15 से 20 लाशें दफनाई गई हैं। हमने उसी आधार पर सरकार को अपना बयान दिया था। हालांकि हकीकत यही थी कि वे लाशें कारसेवकों की थीं। उस गोलीकांड में कई लोग मारे गए थे। आंकड़े तो नहीं पता हैं, लेकिन काफी संख्या में लोग मारे गए थे।’’ ऐसे में सवाल है कि आखिर सत्ता की सीढ़ी के तौर पर निहत्थे मासूम रामभक्तों की लाशों को इस्तेमाल करनेवाले मुलायम को आखिर इस अपराध के लिये कोई सजा भी मिल पाएगी या नहीं। उम्मीद तो नहीं है कि उन्हें कानून के माध्यम से इसकी कोई सजा मिल पाएगी लेकिन समाज को तो उन्हें जवाब देना ही चाहिये कि अव्वल तो ऐसी क्या मजबूरी हो गई कि कारसेवकों पर गोली चलाने का उन्हें आदेश देना पड़ा। और अगर ऐसा आदेश उन्होंने दे ही दिया तो सीना ठोंककर मौत के सही आंकड़े को स्वीकार क्यों नहीं किया। साथ ही मौत के बाद कारसेवकों की लाशों को चिता पर जलाकर उनकी अंत्येष्ठि का इंतजाम क्यों नहीं किया गया। लाश के साथ खिलवाड़ करने की आखिर क्या जरूरत थी। ये ऐसे सवाल है है जो हर संवेदनशील आदमी के मन को अवश्य ही मथेंगे और अफसोस होगा हमारी न्याय व्यवस्था पर जो अब तक इस मामले में इंसाफ नहीं कर पाई है। भगवान राम का मंदिर तो अयोध्या में आज नहीं तो कल बन ही जाएगा लेकिन जिन मांओं ने अपने बेटों को, जिन औरतों ने पति को, जिस बहन ने भाई को या जिस बच्चे ने अपने पिता को खोया उसके दर्द पर इंसाफ की मरहम कैसे रखी जाएगी। यह पूरा प्रकरण वाकई राजनीति के उस स्याह, विद्रूप और घिनौने चरित्र को उजागर करता है जिसे सिर्फ किस्से कहानियों में पढ़ा जाता रहा है।