कथनी और करनी की एकरूपता की उम्मीद
January 29, 2019 • Rakesh Raman
राजनीति के बारे में अब तक यही मान्यता रही है कि इसमें कहने वाली बातों पर अमल नहीं किया जाता और जो किया जाता है उसके बारे में किसी से कभी कुछ कहा नहीं जाता। यानि कथनी और करनी की एकरूपता की उम्मीद अब तक सियासत से नहीं की जाती रही है। हालांकि कहना कुछ और करना कुछ की जो रणनीति हमारे राजनेताओं ने अब तक अमल में लाई उसी का असर हुआ कि लोगों ने नेताओं और राजनीतिक दलों से यह उम्मीद पालना ही छोड़ दिया कि वे चुनाव के दौरान वोट लेने के लिये जो कुछ कह रहे हैं उसे सत्ता में आने के बाद पूरा भी करेंगे। इसमें अगर किसी ने अपने चुनावी वायदे का कुछ भी हिस्सा पूरा कर दिखाया तो वह उसका एहसान जताने से भी कभी पीछे नहीं हटा। लेकिन मौजूदा दौर में कथनी और करनी का अंतर अब बीते दिनों की बात बनकर रह जाती हुई दिख रही है। अब के दौर में जितना कहा जा रहा है उसे पूरा कर देने भर से ही लोगों की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो रही हैं बल्कि उससे आगे की बातों पर भी अमल करने का जनदबाव बनने लगता है। यही वजह है कि अब कहने वालों को अपनी बात पर अमल करके भी दिखाना पड़ रहा है। वह जमाना नहीं रहा कि गरीबी हटाओ का नारा देकर या सबको रोटी, कपड़ा और मकान दिलाने का सब्जबाग दिखा कर चुनाव दर चुनाव सफलता का परचम लहराया जाता था। बल्कि अब तो अगर सत्ता संभालने के बाद अगर प्रधानमंत्री मोदी यह बताते हैं कि उनकी सरकार गरीबों को समर्पित रहेगी तो कार्यकाल पूरा होने के पहले उन्हें यह हिसाब भी देना पड़ रहा है कि उनकी सरकार की रीति-नीति के कारण गरीबों को क्या फायदा मिला। इसी प्रकार अगर राहुल गांधी विधानसभा चुनावों के दौरान किसानों की कर्जमाफी का वायदा करते हैं तो सत्ता संभालने के फौरन बाद कांग्रेस की सरकारों को पंजाब व कर्नाटक से लेकर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कर्जमाफी का फैसला अमल में लाने के लिये मजबूर होना पड़ता है। यहां तक कि अखिलेश यादव को भी यूपी में अपने चुनावी घोषणा पत्र सामने रखकर किये गये कामकाज का ब्यौरा देना पड़ा और अब योगी आदित्यनाथ को भी चुनावी घोषणापत्र में किये गये वायदों को सिलसिलेवार ढ़ंग से पूरा करने के लिये पहलकदमी करनी पड़ रही है। इस लिहाज से देखें तो अब मौजूदा वक्त में आम जनता को बेवकूफ बनाकर या झांसा देकर उसका वोट नहीं हड़पा जा सकता बल्कि उसके सामने ठोस बात कहनी पड़ेगी और यह भी बताना पड़ेगा कि आखिर उन बातों को कैसे व कितने दिन के भीतर अमल में लाया जाएगा। रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे के वायदे पर भरोसा करके मतदान करनेवाले लोगों का अब जमाना ही नहीं है अब तो सीधे पूछा जा रहा है कि मंदिर वहीं बनाएंगे की बात तो ठीक है लेकिन जब इसकी तारीख आप बताएंगे तभी जनता का वोट पाएंगे। इसी का नतीजा है कि कल तक मंदिर बनाने से बचने के लिये सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक हाथ बंधे होने की दुहाई देनेवाले प्रधानमंत्री मोदी की सरकार के रणनीतिकार अब अदालत से मांग कर रहे हैं कि विवादित जमीन को छोड़कर बाकी अधिग्रहित जमीन मंदिर के पैरोकारों के हवाले कर देने का आदेश जारी किया जाए। इसी प्रकार वायदे करके उसे अमल में लाने का भरोसा देकर ही चुनाव जीतना संभव हो पाने की बात अब कांग्रेस भी बेहतर ढ़ंग से समझ गई है। इसी का नतीजा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उतना ही वायदा कर रहे हैं जिसे पूरा भी किया जा सके। मसलन किसानों की कर्जमाफी का वायदा ऐसा ही था जिसे सरकार के शपथ लेने के फौरन बाद केबिनेट की बैठक बुलाकर अमल में ला दिया गया। इसी प्रकार बीते अड़तालिस घंटे में राहुल ने दो नये वायदे किये हैं। पहला वायदा समाज के निचले पायदान पर जीवन बसर कर रहे लोगों की आर्थिक मदद करने के लिये किया गया है और दूसरा वायदा महिलाओं को विधायिका में आरक्षण देने का किया गया है। निश्चित ही ये दोनों वायदे ऐसे हैं जिसे सरकार चाहे तो पूरा कर भी सकती है। हालांकि महिला आरक्षण का मसला ऐसा है जिसका विरोध केवल समाजवादी पार्टी सरीखे कुछ क्षेत्रीय दल ही कर रहे हैं लेकिन वास्तव में देखा जाये तो इसे लागू करने के लिये जिस इमानदारी की जरूरत है उसका अभाव पूर्ववर्ती संप्रग सरकार में भी दिखा था और मौजूदा मोदी सरकार में भी दिख रहा है। वह राजनीतिक इच्छाशक्ति ना तो संप्रग ने दिखाई और ना ही राजग ने कि ताकि राज्यसभा में धूल फांक रहे महिला आरक्षण विधेयक को सदन से पारित करा लिया जाए। वर्ना कोई कारण नहीं है कि सरकार चाह ले तो यह विधेयक पारित ना हो सके। ना सिर्फ पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में बल्कि मोदी सरकार के दौरान भी संसद का गणित इस विधेयक के पक्ष में ही है और दोनों सदनों के नब्बे फीसदी से अधिक दल ही नहीं बल्कि सांसद भी औपचारिक तौर पर खुद को महिला आरक्षण का हिमायती बता चुके हैं। लेकिन इसे उलझाए रखने के लिये बहाना तलाशा जाता रहा है सर्वानुमति का। यानि दो-तिहाई बहुमत से संविधान में संशोधन करने की क्षमता रखनेवाली संसद के संचालक अगर सर्वानुमति नहीं होने की बात कह कर महिला आरक्षण विधेयक को पारित कराने के दायित्व से बचने की कोशिश कर रहे हैं तो निश्चित ही इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। लेकिन बेहतर बात है कि राहुल गांधी ने इस मामले को शीर्ष प्राथमिकता देते हुए चुनावी मुद्दा बनाने की पहल की है। निश्चित ही देश की आधी आबादी के हित में इससे बेहतर बात नहीं हो सकती। बल्कि कायदे से राहुल के वायदे का मोदी सरकार को भी संज्ञान लेना चाहिये और संसद के बचे हुए समय में कोशिश करनी चाहिये कि यह पुनीत काम उसके हाथों की सम्पन्न हो जाए। इसी प्रकार न्यूनतम आय की गारंटी का मामला भी ऐसा ही है कि देश की अर्थव्यवस्था पर कुछ बोझ अवश्य पड़ेगा लेकिन आम जन में जो खुशहाली और उत्साह का सृजन होगा उसका सकारात्मक और सीधा परिणाम तरक्की की गति पर भी अवश्य ही पड़ेगा। लोगों की क्रय शक्ति में इजाफे से बाजार को जो गति मिलेगी उससे सरकार का राजस्व भी बढ़ेगा और स्वास्थ्य व समाज कल्याण के क्षेत्र में किये जा रहे बाकी खर्चों व सब्सिडियों में कटौती करने की राह भी खुलेगी। लिहाजा ऐसे वायदों का सामने आना निश्चित ही भारतीय लोकतंत्र की मजबूती व खूबसूरती को दर्शाता है और आम लोगों को यह आश्वस्ति देता है कि सरकार भले किसी की भी बने लेकिन देश के अच्छे दिन अवश्य ही आएंगे।