कुपोषण घटा पर मोटापे का संकट बढ़ा
September 8, 2019 • डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

(डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा)

इसे शुभ संकेत ही माना जाना चाहिए कि देश में कुपोषितों की संख्या में तेजी से कमी आई है। हांलाकि बढ़ता मोटापा नए संकट की और इशारा कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र् संघ की हालिया रिपोर्ट में यह कहा है कि दुनिया के देशों में रोटी का संकट बढ़ा है। दुनिया के देशों में यही कोई 82 करोड़ दस लाख लोग भुखमरी के शिकार है। एशिया और अफ्रिका में ही ज्यादा भूखमरी के शिकार है। इसमें भी दक्षिण एशिया की स्थिति अधिक चिंतनीय मानी जा रही है। एशिया में जहां 11 प्रतिशत का आंकड़ा भूखमरी का है तो दक्षिण एशिया में यह आकड़ा 17 प्रतिशत पहुंच जाता है। ऐसे में हमारे देश में कुपोषण के आकड़े में कमी आना इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि देश में लोगों को अब पोषित भोजन मिलने लगा है। विश्व खाद्य सुरक्षा एवं पोषण स्थिति-2019 में जहां एक और गत तीन सालों में दुनिया के देशों में रोटी का संकट बढ़ा है।  हांलाकि खाद्यान्नों के उत्पादन में बढ़ोतरी हो रही है पर खाद्यान्नों की बरबादी भी कम नहीं हो रही। एशियाई देशों में जिसमें भारत भी शामिल है समुचित रखरखाव व वैज्ञानिक भण्डारण सुविधा की पर्याप्त सुविधा नहीं होने से लाखों टन अनाज बरबाद हो जाता है। खेत-खलिहान में, मण्डियों में, रेल्वे के प्लेट फार्मो मंे अनाज की बरबादी आम है। हांलाकि भारत में इसमें भी सुधार आया है। 1987के मुकाबले मेें देश में गरीबी दर में भी उल्लेखनीय कमी आई है। देश में 1987 की 48.9 प्रतिशत से घटकर 21.2 रह गई और अब इसमें और भी कमी आ रही है। 
 देश में कुपोषण से बचाने के लिए सरकारों द्वारा बहुआयामी प्रयास किए गए हैं। इनमें स्कूलों में मिड डे मिल, आंगणबाड़ी कार्यक्रम, गांवों में ही स्वास्थ्य जागरुकता कार्यकर्ता और चिकित्सा सुविधाओं में सुधार और विस्तार से स्थिति में बदलाव आया है। सरकार द्वारा सुरक्षित प्रसव, बेटी बचाओं बेटी पढाओं जैसे अभियानों के साथ ही विभिन्न कार्यक्रमों से गरीबी रेखा में कमी और कुपोषण की दर में कमी आना रहा है। भले ही ड्र्ाप आउट रोकने के नाम पर मिड डे मिल योजना चजी हो पर निश्चित रुप से खासतौर से ग्रामीण व अभावग्रस्त क्षेत्रों में यह योजना बच्चों को कुपोषण से बचाने में सफल रही है। इसी तरह से आंगणवाड़ी योजना भी महिला एवं बाल विकास मेें बेहद लाभकारी रही है। संयुक्त राष्ट्र् की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि 2004-06 में 25 करोड़़ कुपोषण के शिकार थे जो घटकर 19 करोड़ रह गई है। इसे शुभ संकेत ही माना जाना चाहिए। 
 कुपोषण से अलग अब जो नई समस्या हमारे देश में ही नहीं अपितु दुनिया के बहुत से देशों में तेजी से विस्तारित हो रही है वह मोटापा की समस्या है। देश में 18 साल से अधिक वय के 3 करोड़ 28 लाख लोग मोटापा की समस्या से रुबरु हो रहे हैं। दरअसल हमारा रहन-सहन और बदलती जीवन शैली इसके लिए अधिक जिम्मेदार है। आज पोष्टिक व स्वास्थ्यवर्द्धक खानों का स्थान पिज्जा,बरगर और ना जाने क्या क्या फास्टफूड लेते जा रहे है। बस दो मिनट के चक्कर में बच्चों के स्वस्थ्य से सीधे सीधे खिलवाड़ हो रहा है। विज्ञापनों की मायाबी दुनिया भी बच्चों या महिलाओं को केन्द्रीत होने से बच्चे नई नई चीजों पर आकर्षित हो जाते हैं और मामूली से ईनाम की चाह में जिद कर बैैठते है। दूसरा कारण संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार द्वारा लिए जाने व पति पत्नी नौकरी पेशा होने के कारण घर से बाहर या इंस्टेट खाने पर जोर अधिक रहने लगा है। इसका परिणाम सामने हैं। तेजी से मोटापा बढ़ता जा रहा है। जिसके चलते कोलस्टोल व अन्य की बढ़ोतरी के कारण एक समय धनाढ़्यों के लिए आरक्षित बीमारियों से आम आदमी और युवा ग्रसित होने लगे है। आज हृदय रोग आम होता जा रहा है। डिप्रेशन आम बात है। ऐसे में खान पान के तरीके में बदलाव लाना ही होगा। मोटापे की बीमारी के चलते आज जिम का अच्छा खासा बाजार तैयार हो गया है। लोग जिम जाकर मोटापे से राहत पाने और फिट रहने के टिप्स लेने लगे हैं। मोटापा घटाने की दवाओं के विज्ञापन आम होते जा रहे है। यह कमाई का तरीका बनता जा रहा है। 
 निश्चित रुप से यह अच्छी बात है कि देश में कुपोषण से शिकार लोगों की कमी आती जा रही है। पर हमें अब योग के साथ साथ लोगों के खान पान की और भी ध्यान देना होगा ताकि कुपोषण से बचते बचते मोटापा के शिकार हो जाएं। इसके लिए सरकार और गैरसरकारी संगठनों को अभियान चलाकर लोगों को शिक्षित करना होगा कि वे संतुलित, पोषक तत्वों से भरपूर पर गरिष्ठ भेजन से छुटकारा पाए नहीं तो कुपोषण से बचकर यदि मोटापें के शिकार होते हैं तो फिर इससे कोई लाभ होने वाला नहीं है। नहीं तो हम कितना भी कमा ले, खाने की सोचे पर मोटापा के चलते अनेक ब्याधियों से ग्रसित हो जाएंगे। देश में चिकित्सालयों में बढ़ती भीड़ इस और इशारा भी कर रही है। ऐसे में सरकार व गैरसरकारी संगठनों ो दो स्तर पर काम करना होगा। एक तरफ देश में भूखमरी को शून्य स्तर पर लाना होगा तो दूसरी और कुपोषण से बचाने के लिए पोष्टिक आहार व मोटापे से बचने की जागरुकता बनानी होगी। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब मोटापा एक बड़ी समस्या के रुप में आ जाएगा। देश के प्रत्येक नागरिक को दो जून की रोटी भी मिल तो दूसरी और परंपरागत खान-पान की आदत ड़ालकर मोटापे जैसे संकटों से मुक्ति पाने के लिए लोगों को जागरुक किया जा सके। सरकार इसके लिए मिड डे मिल व आंगणवाड़ी जैसी सुविधाओं को और अधिक विस्तारित कर सकती है। लोगों में अवेयरनेस केंपेन भी चलाया जा सकता है। पर यह सब समय रहते करना होगा।