गाँधी का दांडी सत्याग्रह स्मारक एवं संग्रहालय
October 1, 2019 • बाल मुकुंद ओझा          

(बाल मुकुंद ओझा)

भारतीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास इस बात का साक्षी है कि 1920 से 1946 तक आजादी की निर्णायक लड़ाई महात्मा गाँधी के नेतृत्व में लड़ी गई। इस वर्ष पूरा विश्व महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मना रहा है। आजादी के आंदोलन में 1930 में 12 मार्च से 6 अप्रैल तक साबरमती से दांडी तक आयोजित गाँधी के ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह का अहम् योगदान था जिसने पूरी दुनियां का ध्यान खींचा और इतिहास में इस सत्याग्रह का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया।
 राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने 1930 में दांडी से अंग्रेजों के खिलाफ नमक सत्याग्रह की शुरुआत की थी। भारत के आधुनिक इतिहास का सबसे चर्चित गाँव है दांडी। पिछले 88 बरस से दुनियाभर में उसकी एक ऐसी पहचान है, जो मिटना तो दूर कभी धूमिल भी नहीं पड़ी। विश्व प्रसिद्ध दांडी गाँव गुजरात के शहर नवसारी से 16 किमी दूर स्थित है। अंग्रेजों ने नमक उत्पादन और उसके विक्रय पर भारी मात्रा में कर लगा दिया था। जिससे उसकी कीमत कई गुना तक बढ़ गई थी। अंग्रेजी शासन के दौरान भारत की अधिकतर गरीब जनसंख्या के खाने का नमक ही एक सहारा बचा था। उसपर भी अधिक कर होने से वे उसे खरीद पाने में असमर्थ थे। गांधीजी ने नमक कानून के खिलाफ 1930 में 12 मार्च से 6 अप्रैल तक साबरमती से दांडी तक पदयात्रा निकाली थी। जिसे दांडी मार्च कहा जाता है। इसमें बड़ी संख्या में लोगों ने बापू का साथ दिया था। इस ऐतिहासिक मार्च को जीवंत करने के उद्देश्य से दांडी में राष्ट्रीय नमक सत्याग्रह स्मारक एवं संग्रहालय बनाया गया है। यहां प्रतिमाओं के अलावा एक म्यूजियम और गेस्ट हाउस भी है, जहां लोग ठहर सकते हैं।
स्वतंत्रता आंदोलन के कारण दांडी गावं का नाम विश्व मानचित्र में अंकित हुआ है। महात्मा गाँधी ने यहाँ नमक सत्याग्रह कर दुनियां का ध्यान खींचा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहाँ राष्ट्रीय नमक सत्याग्रह स्मारक एवं संग्रहालय का निर्माण कराकर गाँधी की याद को अमर किया है। दांडी पहुँचने पर जो देखा और अनुभव किया वह वास्तव में अविसमरणीय है जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। 
दांडी में 110 करोड़ रुपये की लागत से राष्ट्रीय नमक सत्याग्रह स्मारक तैयार किया गया है। यह स्मारक भारत के भीतर नमक बनाने और उसकी बिक्री पर ब्रिटिश सरकार की मनमानी कर वसूली के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन को गरिमामय तरीके से याद करता है। ये स्मारक 15 एकड़ भूमि पर बनाया गया है। समारक में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 18 फीट ऊंची प्रतिमा बनाई गई है। इसके अलावा यहां खारे पानी के कृत्रिम तालाब भी बनाए गए हैं। यहां नमक बनाने के लिए सोलर मेकिंग बिल्डिंग वाले 14 जार भी रखे गए हैं। 80 दांडी यात्रियों की सिलिकॉन ब्रांज की मूर्तियां 42 मूर्तिकारों ने बनाई हैं जिनमें अलग-अलग देशों के नौ मूर्तिकार शामिल है। 24 भित्तिचित्र और सिलिकॉन कांस्य का ढांचा लगभग दो दर्जन कलाकारों ने तैयार किया था। यहाँ गांधी की पांच मीटर ऊंची एक प्रतिमा है जिसके हाथ में छड़ी है। यद्यपि इस स्मारक के हर कोने में देखने योग्य कुछ न कुछ बहुत खास चीज है, लेकिन यहां का सबसे खास आकर्षण हैं गांधीजी के नेतृत्व में आए 80 सत्याग्रहियों की प्रतिमाएं।