घृणित और विखंडन युक्त इस्लामिक हथकंडा
October 2, 2019 • विष्णुगुप्त

(विष्णुगुप्त)

इस्लामिक शासकों द्वारा इस्लाम का डर-भय दिखाना और इस्लाम को हथकंडा के तौर पर प्रस्तुत करना कोई नयी बात नहीं है। खासकर गैर इस्लामिक देशों और गैर इस्लामिक जनता को डराने-धमकाने के लिए इस्लाम के आधार पर मुस्लिम समुदाय की गोलबंदी की बात होती रहती है, कभी इस्लामिक देशों के शासक तो कभी इस्लामिक आतंकवादी संगठन ऐसी बात करते रहते हैं। 
कभी मिश्र, सीरिया जैसे मुस्लिम देश ने इस्राइल के खिलाफ मुसलमानों की गोलबंदी की बात की थी पर ये देश खुद इस्राइल से युद्ध में हार कर समझौते के लिए बाध्य हुए, कभी ईरान और मलेशिया जैसे मुस्लिम देश भी इस्राइल सहित अन्य काफिर देशों के खिलाफ मुसलमानों की एकता और गोलबंदी की बात की थी। पर उनकी बात भी अनसुनी हो गयी, इन सब की अपील पर कोई खतरनाक प्रक्रिया सामने नहीं आयी, इन सबों की दुनिया में जगहंसाई ही हुई। गैर मुस्लिम आबादी के बीच इनकी यह सोच एक कट्टरवादी और घृणात्मक की कसौटी पर देखी गयी। निश्चित तौर पर ऐसी अपील और ऐसी मजहबी प्रक्रिया से इस्लाम के प्रति कोई सहानुभूति सामने नहीं आती है बल्कि यह कहना जरूरी हो जाता है कि ऐसी अपील और ऐसी मजहबी प्रकिया से इस्लाम की ही छवि खराब होती है, इस्लाम के प्रति असहिष्णुता ही सामने आती है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि यूरोपीय  और अमेरिकी उदार समाज में इस्लाम के प्रति घृणा और विखंडन ही उत्पन्न होती है।
 अभी-अभी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने मुस्लिम शासकों की उर्पयुक्त हथकंडे और घृणात्मक मजहबी प्रक्रिया को आगे बढाया है, एक हथकंडे के तौर पर प्रस्तुत किया है। इसके संकेत और निष्कर्ष बहुत ही खतरनाक है। जाहिर तौर पर इमरान भारत को डराने-धमकाने के लिए हथकंडे के तौर पर इस्लाम को प्रस्तुत किया था, परमाणु युद्ध का खतरा दिखाया था, जेहाद को सही ठहराया था, पूरी दुनिया के मुस्लिम समुदाय को संगठित होकर खडा होने के लिए उकसाया था। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि इमरान खान के ऐसे हथकंडों से डर कौन रहा है, इमरान खान के ऐसे हथकंडों से क्या भारत डरने वाला है, ऐसे हथकंडों से दुनिया के अन्य देश भी सहानुभूति प्रकट करने के लिए सामने आयेंगे, क्या ऐसे हथकंडों से कश्मीर में जेहाद और आतंकवाद का नया दौर शुरू हो सकता है? क्या ऐसे हथकंडों का प्रभाव दुनिया के अन्य मुस्लिम देशों पर पडेगा, क्या ऐसे हथकंडो से दुनिया के अन्य मुस्लिम देश अपने हित छोड कर पाकिस्तान के हित रक्षक होने के लिए तैयार होंगे, क्या ऐसे हथकंडे से दुनिया के अन्य समुदाय के बीच कोई सकरात्मक सहानुभूति उत्पन्न होगी? 
            इन सभी प्रश्नों पर इमरान खान या फिर उनके देश की कूटनीति पहले या बाद में आत्म विश्लेषण नहीं किये होंगे। अगर इमरान खान और उनके देश की कूटनीति इन सभी प्रश्नों के आत्म विश्लेषण किये होते तो ये कभी भी इस्लाम का भय नहीं दिखाये होते, कश्मीर को इस्लाम से न जोडकर मानवता और मानवाधिकार से जोडे हुए होते। निश्चित तौर पर कश्मीर की वर्तमान राजनीतिक घटना को मानवता और मानवाधिकार के साथ जोडे हुए होते तो दुनिया के नियामकों और दुनिया के जनमत के बीच इस प्रश्न पर सहानुभूति प्रकट होती। पर यह कहना सही होगा कि इमरान खान ने यह अवसर खो दिया। इमरान खान कोई दक्ष राजनीतिज्ञ नही है, कोई दक्ष कूटनीतिकार नही है, इमरान खान मूलत' क्रिकेटर हैं। कोई पक्के राजनीतिज्ञ ही इस मर्म को समझ सकता है। पाकिस्तान के लिए दुर्भाग्य यह है कि उनकी सत्ता पर विराजमान शख्त पक्के राजनीतिज्ञ और कूटनीतिकार नहीं हैं।
       इमरान खान ने जिस पूरी मुस्लिम आबादी की जेहाद की बात की है वह भी एक प्रहसन है। पाकिस्तान के पक्ष में पूरी मुस्लिम आबादी उतर जायेगी, क्या यह संभव है? क्या पाकिस्तान को पूरी दुनिया की मुस्लिम समुदाय अपना खलीफा मानती है? पूरी मुस्लिम आबादी भी एक जुट कैसे होगी? मजहबी इस्लामिक देश में रहने वाली मुस्लिम आबादी एकजुट हो सकती है पर गैर मुस्लिम देश में रहने वाली मुस्लिम आबादी भी साथ जुड कर जेहाद क्यों और कैसे कर सकती है। राष्ट्रीयता का प्रश्न उठेगा? फिर भारत में रहने वाली मुस्लिम आबादी, अमेरिका में रहने वाली मुस्लिम आबादी या फिर यूरोप में रहने वाली मुस्लिम आबादी, जापान, कबोडिया जैसे बौद्ध देश में रहने वाली मुस्लिम आबादी की राष्ट्रीयता कौन सी होगी? क्या इनकी राष्ट्रीयता इस्लाम होगी? अगर इनकी राष्ट्रीयता इस्लाम होगी तो फिर ये संबंधित देश के नागरिक कैसे होंगे? इतना ही नहीं बल्कि ये मुस्लिम आबादी जिनकी राष्ट्रीयता इस्लाम होगी तो फिर संबंधित देश की नागरिक सुविधाओं का उपयोग मुस्लिम आबादी कैसे करेगी? क्या ऐसे हथकंडों से इनकी छवि खराब नहीं होगी, गैर मुस्लिम आबादी इनकी नागरिक सुविधाएं लुटने और इन्हें इस्लाम की राष्ट्रीयता के आधार पर इस्लामिक देशों में भेजने की मांग क्यो नहीं करेंगे? खास कर अमेरिका और यूरोप में मुसलमानो की राष्ट्रीयता पर प्रश्न खडा होता है, इस्लामिक राष्ट्रीयता पर राजनीति की लक्ष्मण रेखा भी खिची जाती है। कहा यह जाता है कि अमेरिकी, यूरोपीय या फिर जापानी जैसी राष्ट्रीयता से इन्हें दिक्तत है या फिर अस्वीकार है तो इन्हें इस्लामिक राष्ट्रीयता वाले देश मे ही चला जाना चाहिए। इसी प्रश्न पर अमेरिका में मुस्लिम और ईसाइयों के बीच लक्ष्मण रेखा खिची गयी है। खुद डोनाल्ड ट्रम्प कोई एक बार नहीं बल्कि कई बार कह चुके हैं कि इस्लामिक राष्ट्रीयता की बात करने वाले मुसलमानों को अमेरिकी कानून का पाठ पढाया जायेगा और उन्हें उनके मूल देश में भेज दिया जायेगा। अमेरिका में डोनल्ड ट्रम्प के शासन के दौरान इस प्रश्न पर बडी-बडी राजनीति, प्रशासनिक और सुरक्षात्मक कार्यवाहियां भी हुई है। डोनाल्ड ट्रम्प ने इसी दृष्टिकोण से कई देशों की मुस्लिम आबादी के अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा चुके हैं। मुस्लिम आबादी को वीजा देने मे अमेरिकी प्रशासन असहिष्णुता ही बरतता रहा है। यह सब इमरान खान जैसी सोच के दुष्परिणाम है।
 अमेरिका की एक कूटनीतिज्ञ ने इमरान खान को आईना दिखाया है। अमेरिकी कूटनीतिज्ञ ने कहा है कि यह सब इमरान खान का एक स्वार्थ है। कश्मीर में मुसलमानों की चिंता तो उसे है पर चीन में मुसलमानों के उत्पीडन और संहार के प्रति इमरान खान की जबान क्यों नहीं खुलती है। चीन में कोई एक नहीं बल्कि कई लाख मुस्लिम चीनी जेलों या फिर चीनी यातना गृहों में कैद है। चीन के झिगजियाग प्रदेश मुस्लिम बहुल है। चीन के झिंगजियांग प्रदेश में अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग को लेकर जेहाद और आतंकवाद जारी है। मुस्लिम जेहाद और आतंकवाद को कुचलने के लिए चीन ने हिंसक और खौफनाक सैनिक नीति अपना रखी है। मजहबी कार्य से मनाही है। पर पाकिस्तान कभी भी चीने शिंगजियांग प्रदेश में रहने वाले मुस्लिम समुदाय के मानवाधिकार की बात नहीं करता है। इमरान खान भी चीन के खिलाफ बोलता नहीं है। इमरान खान की मुस्लिम कसौटी पर दोहरी नीति है और इमरान खान की इस दोहरी नीति से दुनिया कैसे अनभिज्ञ होगी।
  दुनिया का समर्थन पाकिस्तान को क्यों नहीं मिल रहा है? मुस्लिम दुनिया का भी पूर्ण समर्थन पाकिस्तान के साथ नहीं है। सिर्फ मलेशिया और तुर्की जैसे एक्के-दुक्के देश ही पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं। शेष मुस्लिम देश अपने-अपने हितों के साथ खडे हैं। दुनिया के सामने पाकिस्तान की कैसी छवि है, यह कौन नहीं जानता है? दुनिया के सामने पाकिस्तान की छवि एक आतंकवादी देश की है, दुनिया के सामने पाकिस्तान की छवि एक बर्बर इस्लामिक देश की है, दुनिया के सामने पाकिस्तान की छवि शांति के दुश्मन के रूप में है। सच यही है कि पाकिस्तान ने आतंकवाद और जेहाद का आउटसोर्सिंग कर दुनिया की शांति को हिंसा के रूप में तब्दील किया है, दुनिया की शांति में विष घोला है। पाकिस्तान के पोषित और प्रायोजित आतंकवाद और जेहाद से दुनिया में लाखों लोग मारे गये हैं।
  नये दौर का नया भारत है। नये दौर के नये भारत में पाकिस्तान का मुस्लिम हथकंडा कोई कारगर नहीं होगा। कश्मीर भारत का आतंरिक प्रश्न है। इमरान खान की मुस्लिम हथकंडे की चुनौती का प्रबंधन करने की शक्ति भारत के पास है। भारत ने कश्मीर के प्रशन का मुस्लिमकरण नहीं होने दिया, यह भारत का पराकर्म है। अब इमरान खान ही नहीं बल्कि पाकिस्तान जमात को भारत के पराकर्म को स्वीकार कर लेना चाहिए। इमरान खान ने दुनिया के मुसलमानों की एकता और जेहाद के जेहाद के लिए उकसा कर इस्लाम की ही छवि गिरायी है।