चिंतित करते हैं चिन्मयानंद जैसे लोग
September 22, 2019 •  देवानंद राय
( देवानंद राय)
पहले नित्यानंद,फिर आसाराम फिर राम रहीम और अब चिन्मयानंद यह कुछ वह लोग हैं जो सनातन धर्म का ध्वजा लेकर चलते थे और आज इनके को कर्मों से सनातन धर्म की ध्वजा ही नहीं पूरा संत समाज शर्मसार हुआ है हालांकि राम रहीम का सनातन धर्म से मुख्य रूप से कोई जुड़ाव नहीं है वे डेरा सच्चा सौदा से जुड़े हैं फिर भी उन्होंने भी उन हजारों भक्तों श्रद्धालुओं का विश्वास तोड़ा है चिन्मयानंद ने जो जुर्म किया है उसकी सजा उन्हें कोर्ट देगी पर उनके  कुकर्मों से सनातन धर्म पर जो कलंक लगा है उसकी भरपाई कौन करेगा ? इन सब लोगों ने  जो लोगों का विश्वास तोड़ा है वह विश्वास फिर से कभी वापस नहीं आ सकता |अगर आज का युवा सनातन धर्म और धार्मिक मूल्यों, कर्मकांडो से दूर भागती है तो इसका एक कारण इस तरह के बाबाओं का होना भी है जो धर्म की आड़ में हर तरह के अधर्म करते हैं यह कुछ गिने-चुने नाम है जो आज हर लोगों की जुबान पर हैं पर इसमें कोई दो राय नहीं कि समाज में, आश्रमों में, मंदिरों में, मठों में या अन्य किसी धर्म या समुदाय में ऐसे बाबाओं, मौलवियों,बिशपो या धर्माचार्य नहीं होंगे वह भले ही गुप्त रूप से इस प्रकार के कुकृत्य को समाज के नजरों से बचाकर कर रहे होंगे पर ईश्वर की नजर से कब कहां कुछ छुप पाया है ? अगर हमारा इन संतों से विश्वास उठा अगर संतों की बातें सचमुच जीवन में नहीं उतार पाते तो उसका यह कारण भी है कि जो संत महात्मा बाबा इन बातों को कहते हैं और खुद पर्दे के पीछे संत बाबा से रंगीले बाबा में परिवर्तित हो जाते हैं| महान संत रामकृष्ण परमहंस जी का कहा करते थे कि शिष्य या भक्तों को गुरु के ज्ञान से मतलब रखना चाहिए गुरु के चरित्र या उसके जीवन के अन्य पहलुओं से नहीं पर आज के समय में रामकृष्ण जी का यह संदेश फिट नहीं बैठता आज का युग में हर व्यक्ति को उसकी कहीं सिद्धांतों की कसौटी पर हर वक्त तौला जा रहा हूं जब लोग आपकी बात याद करने के बजाए वीडियो बनाकर रखने में रुचि रखने लगे तब ये आवश्यक हो जाता है कि आप जो कहते हैं वह खुद भी जीवन में उतार और यह और यही मात खा गए यह बाबा लोग।इन्होंने "खुद को खुदा समझ लिया" मतलब जो काम यह पर्दे के पीछे कर रहे थे इन्हें लगा पर्दा कभी उठेगा नहीं पर अब पर्दा उठाने और गिराने की जरूरत ही क्या और कहाँँ रही ? जब वीडियो और फोटो वायरल होने भर से किसी को अर्श से फर्श तक पहुंचाया जा सकता है। चिन्मयानंद और भी जो बाबा उनकी तरह इस लिस्ट में शामिल हैं।यह लोग कतई नहीं कह सकते कि इस प्रकार का कृत्य उन्होंने अनजाने में किया है चिन्मयानंद तो न जाने कितनी बार छात्रा के साथ फोन पर बात कर चुके हैं आसाराम का गवाह भी मौजूद है उसी तरह नित्यानंद की फिल्में।लोग जितना चिन्मयानंद को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री होने से नहीं जाने उतना आज वीडियो वायरल होने से वे हर न्यूज़ चैनल और अखबारों के केंद्र में आ गए।यही फर्क है तब के समय में और अब के समय में ममूक्ष आश्रम बना लेने और दिव्य धाम का बोर्ड लटका देने से कोई स्थल दिव्य नहीं हो जाता व्यक्ति की उर्जा ही किसी स्थल को दिव्यता और भव्यता प्रदान करती है पर यहां तो आश्रमों ही दुष्कर्म, मसाज,ब्लैकमेलिंग का धाम बन गया।एक तरीके से देखा जाए तो देश की युवा पीढ़ी जो रामदेव, मुरारी बापू,गोपाल गौर तथा अन्य साधु संतों की अलग क्रांति देख कर पुनः कर्म को धर्म से जोड़ कर और धर्म की ओर मुड़ा था वह चिन्मयानंद जैसे लोगों को देखकर फिर से वही युवा अपने कदम वापस खींचने और भोग वादी दुनिया की ओर बढ़ने को मजबूर हो चला है ।आखिर क्या फर्क रह गया ? एक भोगी व्यक्ति और एक भगवाधारी योगी के बीच| इस पर अंग्रेजी की एक कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है "इफ गोल्ड गेट्स रस्टेड व्हाट विल हैपन टू आयरन" अर्थात अगर सोने में जंग लग जाए तो लोहे का क्या होगा ? जब समाज में धार्मिक मूल्यों, सही- गलत का फर्क बताने वाले आचार्यो, जीवन में कर्म और धर्म का ज्ञान देने वाले संतों जीवन का सही उद्देश्य समझाने वाले महात्मा ही अधर्म और इस प्रकार के कृत्य में लिप्त रहेंगे तो समाज में किस ओर जाएगा इसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता।इस तरह के चंद कलयुगी बाबाओं के कारण जिस पांच हजार वर्ष पुरानी परंपरा, सभ्यता पर हम गर्व करते थे उन पर इन लोगों ने दाग लगाने और दूसरे धर्म ही नहीं अपने धर्म के व्यक्तियों के द्वारा उंगली उठाने का भरपूर मौका दिया है। आजकल कुछ बाबा और धर्माचार्य चाहे वह किसी भी धर्म समुदाय से क्यों ना हो उनके महंगी गाड़ी में चलने, आईफोन रखने और रियल स्टेट में हाथ मारने की एक अलग प्रतिस्पर्धा चल रही है और हम समझते हैं कि बाबा काम, क्रोध, मोह, माया छोड़ चुके हैं जबकि हकीकत यह है कि इनमें से कुछ लोग इन चारों में सबसे अधिक लिप्त हैं जिनमें से कुछ को हम मीडिया के सहारे जानते हैं कुछ गांव, शहर में इस प्रकार के कृत्य में शामिल हैं पर उन्हें सभी नहीं जानते और इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें हम कभी जान भी नहीं पाएंगे पर वह क्या कर रहे हैं वह खुद जानते हैं ? आज मीडिया से लेकर कानून,पुलिस, सुप्रीम कोर्ट सब उस लड़की के साथ खड़े हैं और उन्हें खड़ा भी रहना चाहिए पर चिन्मयानंद जैसे लोगों द्वारा हमारी संत परंपरा का जो नुकसान किया गया है जो अविश्वास पैदा हुआ है उसे भरने को कौन खड़ा होगा ? ऋषि परंपरा की पवित्रता और उसे जीवंत बनाए रखने के लिए संत महात्माओं को इस पर भी विचार करने की आवश्यकता है। अंतिम प्रश्न यह है कि क्या अब समाज किसी भी बाबा पर विश्वास करेगा ? क्या कोई साधु, संत, महात्मा के आश्रम या कुटिया में श्रद्धा भाव लेकर पहुंच सकेगा या फिर हर बाबा, हर संत, हर महात्मा को शक और संदेह भरी नजरों से देखेगा। चिन्मयानंद ने तो अपना दोष स्वीकार कर खुद के महापाप का बोझ थोड़ा कम कर लिया पर सवाल आज हर जनमानस के मन में यही है कि क्या अब आम व्यक्ति किसी बाबा, संत महात्मा को खुले मन से स्वीकार कर पाएगा ?