चीन की चतुराई, अमेरिका की आत्मीयता
March 15, 2019 • राकेश रमण
तुलसीदासजी ने रामचरित मानस में लिखा है कि ‘आपतकाल परखिये चारी, धीरज धर्म मित्र और नारी। यानि मित्र की परीक्षा आपदा के वक्त ही होती है और इस लिहाज से देखा जाये तो निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि अमेरिका की ओर से भारत को आत्मीय साथ मिला है और चीन अपनी चतुराई दिखाने से बाज नहीं आया है। आज बेशक जैश सरगना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अंतर्राष्ट्रीय आतंकियों की सूची में शामिल कराने में भारत को कामयाबी नहीं मिल पाई हो लेकिन जिस तरह से इस मामले में वीटो पावर का बेजा इस्तेमाल करके चीन को समूचे विश्व की थुक्कम फजीहत झेलनी पड़ रही है और भारत को समूचे संसार से सहानुभूति और सहयोग मिल रहा है उसके पीछे अमेरिका की बहुत बड़ी भूमिका है। वह अमेरिका ही है जिसने पाकिस्तान को सबसे पहले हाशिये पर धकेलना शुरू किया और भारत का हाथ थामकर अपनी ओर खींचने की पहल की। यह किसी एक सरकार की मेहनत का नतीजा नहीं है। बल्कि इसकी भूमिका पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार के कार्यकाल में ही लिखी जा चुकी थी जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत के साथ नए सिरे से मित्रता की इबारत लिखने की पहल की। बेशक मौजूदा सरकारों के दौर में दोनों मुल्कों की करीबी में बहुत अधिक इजाफा हुआ है और आज स्थिति यह है कि बालाकोट में भारत के एयर स्ट्राइक के बाद अमेरिका ने सीधे तौर पर पाकिस्तान को पीड़ित मानने से इनकार कर दिया। अमेरिका की ओर से जिस तरह से कूटनीतिक सहयोग मुहैया कराया गया है और पाकिस्तान को आतंकियों पर दिखावे की ही सही, मगर कार्रवाई करने के लिये मजबूर होना पड़ा है वह निश्चित ही काबिले तारीफ है। लेकिन दूसरी ओर चीन ने जिस तरह की चतुराई दिखाते हुए पाकिस्तान को अपने परोक्ष समर्थन की आड़ देकर बचाने की कोशिश की है उसकी जितनी भी निंदा की जाए वह कम ही है। वह भी सिर्फ इसलिये क्योंकि अपने आर्थिक हितों के लिये उसे पाकिस्तान को सहयोग मुहैया कराना पड़ रहा है। मानवता का तकाजा कमजोर पड़ गया और चीन के लिये अपना आर्थिक हित ही सर्वोपरि हो गया है। ऐसे में चीन के साथ अब आर्थिक मसले पर ही जंग के लिये तैयार होने के अलावा भारत के पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं बचा है। हालांकि अभी भारत में आंतरिक चुनाव का माहौल है जिसमें आचार संहिता लागू होने के कारण भारत की मौजूदा सरकार कोई बड़ा नीतिगत फैसला करने से बचना ही चाह रही है लेकिन इसका कतई यह मतलब नहीं होना चाहिये कि चीन को उसकी करतूतों के लिये कुछ ना झेलना पड़े। उसकी हरकत और उसके पाकिस्तान प्रेम को अनदेखा करना कतई उचित नहीं माना जाएगा। आज स्थिति यह है कि चीन को भारत में हासिल हो रहे आर्थिक हितों की कोई परवाह ही नहीं रही और उसके लिये पाकिस्तान ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया। इस स्थिति में भारत को भी चीन के साथ अपने रिश्तों की समीक्षा करनी ही चाहिये। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव को जब देश का रक्षामंत्री बनने का मौका मिला और उस दौरान उन्होंने जब वैश्विक नजरिये से भारत की स्थिति का अध्ययन किया तब उनको इस बात में कोई शक-सुबहा नहीं रह गया कि चीन की ओर से भारत को किस स्तर की चुनौती मिल रही है। तभी उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि भारत का दुनिया में अगर कोई सबसे बड़ा दुश्मन है तो वह चीन ही है। मुलायम आज भी अपनी बात पर लगातार कायम है और वे संसद से लेकर सड़क तक अक्सर यह चेतावनी देते रहते हैं कि भारत का दुश्मन नंबर वन चीन ही है। लेकिन चीन के साथ बराबरी के स्तर पर मामले को सुलझाने की पहल आज तक नहीं हुई है। हालांकि डोकलाम के मसले पर भारत ने अवश्य सीना तानकर चीन की विस्तारवादी नीति का कड़ा प्रतिरोध किया। लेकिन ना तो उसके पहले चीन की चतुराई का समुचित जवाब देने की पहल की गई और ना ही उसके बाद। लेकिन बालाकोट के मामले के बाद और मसूद अजहर के मसले पर खुले तौर पर पाकिस्तान का हित सुरक्षित करनेवाले चीन को अब भारत से मूनाफा कूटने का मौका देना किसी भी लिहाज से उचित नहीं होगा। चीन से आयात होने वाली वस्तुएं कुछ बड़े गंभीर सवाल खड़ा करते हैं। क्या सरकार को चीन से आयात होने वाली वस्तुओं पर सही रूप से राजस्व मिल रहा है? क्या चीन से आयात का हवाला से कोई लेन देन है? क्या चीन के निर्यातकों को जो पैसा दिया जाता है कहीं वो भारत में आतंकी गतिविधियों को पनपने में उपयोग तो नहीं होता? चीन से जिन वस्तुओं का आयात होता है उनकी कीमत वास्तविकता से काफी कम होती है जिसके कारण उनकी वैल्यूएशन भारतीय पोर्ट पर काफी कम आंकी जाती है और उसी के अनुसार उस पर कस्टम ड्यूटी और आईजीएसटी लगती है जिससे सरकार को राजस्व की बड़ी चपत लगती है। वर्ष 1991 में जब देश की अर्थव्यवस्था के द्वार वैश्विक व्यापार के लिए खोले गए थे तब यह बहुत स्पष्ट था की केवल जिन प्रोजेक्ट में बड़ी लागत की आवश्यकता है, उन क्षत्रों में जहाँ उच्च स्तर की टेक्नोलॉजी की आवश्यकता है तथा उन क्षेत्रों में जहां रोजगार बड़ी मात्रा में बढ़ेगा केवल इन्ही तीन क्षेत्रो में वैश्विक व्यापार को अनुमति दी जायेगी। यह दुखद है की चीन के मामले में इन तीनों का कोई स्थान नहीं है। चीन से जो आयात होता है वो बड़ी मात्रा में वो साधारण से वस्तुएं हैं जो आम उपयोग में लाई जाती हैं। जो सामान चीन से आता है वो अच्छी क्वालिटी का है या नहीं इसको देखने वाला कोई नहीं है। यदि चीन की वस्तुओं की क्वालिटी को परखा जाए तो हमारे स्वदेशी उत्पाद कहीं बेहतर साबित होंगे और हमें चीन से आयात की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। लिहाजा बेहतर होगा कि अब चीन से आयात होने वाले सामानों पर ड्यूटी बढ़ाई जाए और व्यापारिक लाभ के लिये पाकिस्तान के साथ गलबहियां करके भारत के हितों के साथ खिलवाड़ करनेवाले चीन को उसकी उसी भाषा में सबक सिखाने के लिये अपने घरेलू उद्योगों को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया जाए।