चुनावी गठबंधन की निराली चोंचलेबाजी
April 17, 2019 • राकेश रमण
राजनीति का रंग भी निराला है। यहां मौजूदा स्थिति के बजाय भावी परिस्थितियों पर अधिक पैनी निगाह रखनी पड़ती है। तभी तो जिस बसपा का लोकसभा चुनाव में सूपड़ा साफ हो गया था और विधानसभा चुनाव में जिसकी हैसियत अपने दम पर एक राज्यसभा की सीट पर कब्जा करने की नहीं बची उसके साथ मिलकर असीमित संभावनाओं को साकार करने के लिये उस सपा ने उसे अपने से अधिक लोकसभा की सीटें देकर चुनाव पूर्व गठबंधन किया है जिसकी हालिया दिनों तक सूबे में स्पष्ट बहुमत की सरकार थी और बीते लोकसभा से लेकर विधानसभा तक के चुनाव में भारी मोदी लहर के बावजूद जिसने अपनी सम्मानजनक मौजूदगी दर्ज कराई थी। निश्चित तौर पर अगर मौजूदा आंकड़ों को आधार बनाकर गठबंधन की रूपरेखा तैयार की जाती तो अव्वल तो सियासी शून्य के धरातल पर खड़ी बसपा के साथ सपा का कोई समझौता ही नहीं होना चाहिये था और अगर बसपा के बिखर कर दिशाहीन हो रहे वोट बैंक को अपनी ओर मोड़ने के लिये समझौता किया भी जाता तो उसमें बसपा के हिस्से में सपा के मुकाबले आधे से भी कम सीटें आनी चाहिये थी। लेकिन हुआ इसके उलट। कहां तो सपा के सहयोग से दोबारा अपनी खोयी जमीन को पाने के लिये बसपा को पहल करनी चाहिये थी लेकिन पहल हुई सपा की ओर से। बसपा का मान-मनौवल भी सपा ने ही किया और अपने से अधिक संख्या में सीटें देकर उसे गठबंधन करके चुनाव लड़ने के लिये सहमत भी सपा ने ही किया। यहां तक कि सीटों के बंटवारे में भी सपा ने बसपा की हर मांग को स्वीकार करते हुए यूपी की वे सभी बारह सीटें अपने कोटे में ले लीं जहां का इतिहास ही नहीं है कि वहां एक बार भी सपा या बसपा को जीत हासिल हुई हो। यानि एक ओर समझौते के तहत हुए बंटवारे में सीटों की तादाद भी बसपा को ही अधिक मिली और तमाम असुरक्षित सीटों से उसे मुक्ति भी मिल गई। उस पर तुर्रा यह कि बसपा की ओर से अपने परंपरागत मतदाताओं को साफ शब्दों में बता दिया गया है सपा के उसी उम्मीदवार का समर्थन किया जाए तो बसपा के चुनाव चिन्ह को सपा क सायकिल के ऊपर रखे। अब सपा के उम्मीदवार सायकिल पर हाथी की सवारी कैसे कराएंगे यह उन्हें ही सोचना होगा। लेकिन समग्रता में देखें तो चुनावी जीत के मामले में आंकड़े अनुकूल नहीं होने के बावजूद बसपा के वोट फीसद में निरंतरता व निश्चितता के कारण सपा को हर कीमत पर बसपा का सहयोग हासिल करने के लिये मजबूर होना पड़ा है ताकि भविष्य के समीकरणों को अपने अनुकूल किया जा सके। इसी प्रकार के बेमेल गठजोड़ क पटकथा दिल्ली में भी लिखी जा रही है जहां विधानसभा की 70 में 67 सीटों पर जीत दर्ज कराके प्रचंड व ऐतिहासिक बहुमत की सरकार चला रही आम आदमी पार्टी उस कांग्रेस के साथ चुनावी गठजोड़ करने के लिये जल बिन मछली की तरह बुरी तरह तड़प रही है जिसे लोकसभा से लेकर विधानसभा चुनाव तक में एक भी सीट पर जीत दर्ज कराने में कामयाबी नहीं मिल सकी। हालांकि बीते दिनों राष्ट्रीय स्तर पर गैर भाजपाई दलों को एक मंच पर लाने की कोशिश के तहत कांग्रेस ने आप के साथ भी गर्मजोशी भरा रिश्ता कायम करने को लेकर दिलचस्पी दिखाई थी लिहाजा आप ने भी दिल्ली में अपनी मजबूत उपस्थिति में कांग्रेस को हिस्सेदारी देने के एवज में पंजाब, गोवा, हरियाणा और चंडीगढ़ में गठजोड़ का समीकरण बिठाना शुरू कर दिया। आप के इस महत्वाकांक्षी समीकरण से कांग्रेस बिदक गई और उसने दिल्ली में अपने दम पर खम ठोंकने की तैयारी शुरू कर दी। इसी के तहत शीला दीक्षित को मैदान में उतारा गया और आप के प्रति सहानुभूति रखनेवालों को किनारे लगा दिया गया। लेकिन आप को बेहतर मालूम है कि बीते विधानसभा चुनाव में उसे दिल्ली में जो सफलता हासिल हुई उसमें निर्णायक भूमिका कांग्रेस के उस परंपरागत वोट बैंक ने ही निभाई जो दोबारा शीला के साथ निकल गया तो उसके हिस्से में कुछ नहीं आएगा। लिहाजा आप ने नए सिरे से कांग्रेस को शीशे में उतारने की कोशिशें शुरू कर दीं और इस बार उसने गोवा और पंजाब में गठजोड़ की कोशिश छोड़कर दिल्ली के अलावा सिर्फ हरियाणा की दस और चंडीगढ़ की एक सीट पर यानि कुल अठारह सीटों पर समग्रता में बंटवारे की मांग सामने रख दी। लेकिन कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि दिल्ली के अलावा उसे कहीं भी आप के सहयोग की जरूरत नहीं है लिहाजा अगर वह सिर्फ दिल्ली में गठजोड़ को लेकर बातचीत करे तभी उससे कोई समझौता हो सकता है। लेकिन आप को कांग्रेस की यह शर्त हजम नहीं हो रही है। तभी इन दिनों आप के शीर्ष नेताओं की ओर से सार्वजनिक तौर पर सियासी विलाप किया जा रहा है। दरअसल यह आप को भी पता है और कांग्रेस को भी अगर दिल्ली में भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव रोकने की पहल नहीं की गई तो सूबे की सभी सातों सीटें एक बार फिर भाजपा के खाते में जा सकती हैं। लेकिन मसला है कि कांग्रेस और आप के बीच एक दूसरे से अधिकतम लाभ हासिल करने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। आप को विश्वास ही नहीं है कि वह बीते विधानसभा चुनाव में लिखी जा चुकी सफलता की गाथा को एक बार फिर दोहरा सकती है जबकि कांग्रेस को यह उम्मीद नहीं है कि जिन मतदाताओं ने उसे विधानसभा के बाद नगर निगम के चुनाव में भी नकार दिया वे इस बार लोकसभा चुनाव में उसका समर्थन करेंगे। ऐसे में दोनों को अपनी कमजोरियां पता हैं लेकिन दोनों मिलकर एक नयी मजबूती की गाथा लिखने के बजाय एक दूसरे की ताकत छीनने की जुगत बिठाने में जुटे हैं। कांग्रेस की कोशिश है कि आप से उसकी दिल्ली की ताकत में साझेदारी का सौदा किया जाए जबकि आप की ख्वाहिश है कि लोकसभा में कांग्रेस के कांधे पर चढ़कर दिल्ली से बाहर भी अपना अधिकतम विस्तार किया जाए। यानि दोनों का मकसद लंबी साझेदारी का नहीं बल्कि तात्कालिक समीकरणों को साधने का है ताकि भविष्य में पूरी ताकत पर खुद का कब्जा जमाया जाए और सहयोगी को दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका जाए। लेकिन मसला है कि एक दूसरे की ताकत बनने के लिये दोस्ती की राह पर आगे बढ़ने के बजाय एक दूसरे की ताकत छीनने के लिये हो रहे इन गठजोड़ों पर मतदाताओं का क्यों और कैसे भरोसा जम सकता है?