चुनावी सरोकार का घोषणापत्र
April 2, 2019 • राकेश रमण
लोकसभा चुनाव के लिये देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने अपना घोषणापत्र जारी कर दिया है। हालांकि कुल 55 पृष्ठों में प्रकाशित इस घोषणा पत्र में तकरीबन तमाम मसलों पर पार्टी ने अपनी नीतियां स्पष्ट की हैं और भविष्य के लिये अपने दृष्टिकोण को उजागर किया है। लेकिन समग्रता में समझने की कोशिश करें तो यह सही मायने में यह ‘लोकलुभावन वायदों’ और ‘नीतियों में नरमी’ का संकल्पपत्र ही है। कांग्रेस द्वारा की गई लोकलुभावन घोषणाओं की बात करें तो अनिवार्य आवश्यकता की वस्तुओं की जीएसटी से बाहर रखने, बाकी वस्तुओं और सेवाओं पर समान दर से कर लगाने और जीएसट की उलझनों को न्यूनतम करने का वायदा किया गया है। साथ ही न्यूनतम आय योजना, रोजगार सृजन और किसानों के लिए अलग बजट समेत कई बड़े ऐलान किए गए हैं। घोषणापत्र में देश के 20 प्रतिशत गरीब परिवारों को सालाना 72 हजार रुपये की आय सुनिश्चित कराने, खाली पड़े 22 लाख सरकारी पदों को 2020 तक भरने, 10 लाख युवाओं को ग्राम पंचायत में रोजगार दिलाने, तीन साल के लिए बिना सरकारी मान्यता या इजाजत के कोई भी व्यवसाय शुरू करने की सुविधा देने, मनरेगा के तहत 100 दिन के बजाय 150 दिन रोजगार उपलब्ध कराने की गारंटी देने, कृषि क्षेत्र व किसानों के लिये अलग से बजट पेश किये जाने, किसान द्वारा कर्ज नहीं चुकाए जाने के नतीजे में दायर होने वाले मुकदमों को आपराधिक के बजाय दीवानी बनाने, जीडीपी का छह प्रतिशत देश की शिक्षा व्यवस्था पर खर्च करने, जीडीपी का दो फीसदी विज्ञान और प्रौद्योगिकी में लगाने और हेल्थ केयर में प्राइवेट हेल्थ इंश्योरेंस को बढ़ावा देने के बजाय सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं के ढ़ांचे को मजबूत करने की बात कही गई है। इसके अलावा उन नियमों व नीतियों में नरमी लाने का भी वायदा किया गया है जिससे समाज के काफी बड़े वर्ग का सीधा सरोकार होता है। मसलन कर चोरी के मामलों को आपराधिक के बजाय दीवानी बनाना, नागरिकता कानून में हुए संशोधनों को वापस लेना, स्वतंत्र न्यायिक शिकायत आयोग का गठन करना, नागरिकों द्वारा सामान्य तौर पर उल्लंघन किये जानेवाले कानूनों के मामले को आपराधिक के बजाय दीवानी बनाना, देशद्रोह के अपराध को परिभाषित करनेवाली आईपीसी की धारा 124ए को समाप्त करना, पुलिस को मानवीयता से पेश आने के लिये विवश करने के लिये अत्याचार निरोधक कानून बनाना, जमानत को नियम व जेल को अपवाद बनाना, तीन साल से कम सजा के प्रवाधान वाले मामलों के विचाराधीन कैदियों को और सात साल तक की सजा वाले छह माह जेल में बिता चुकनेवालों को तुरंत करने का वायदा भी किया गया है। यानि समाज के बहुत बड़े तबके से सरोकार रखनेवाले मुद्दों को आगे रखकर एक बड़ी लकीर खींचने का भरपूर प्रयास किया गया है। लेकिन ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर पर चुनाव कराने की अपनी ही मांग को घोषणापत्र का हिस्सा बनाने से परहेज बरतकर कांग्रेस ने विवाद के बजाय संवाद की पतवार से सियासी नाव को चुनावी भवसागर से पार लगाने का प्रयास भी किया है। वास्तव में देखा जाये तो देश में ऐसे माहौल में लोकसभा चुनाव हो रहा है जब ना तो जमीनी स्तर पर सत्ताविरोधी बड़ी लहर है और ना ही सत्ताधारियों को ठोस चुनौती देने में सक्षम मजबूत विकल्प उभर कर सामने आ पाया है। अलबत्ता सत्ताविरोधी वोटों के बिखराव की पटकथा भी पहले से तैयार है और सत्ताधारियों की रीति-नीति की खामियों को उजागर करके मतदाताओं को अपने पक्ष में खड़ा करने के लिये आवश्यक मुद्दों के तीर से विरोधियों के लश्कर का तरकश भी काफी हद तक खाली ही है। उस पर मुकाबला भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरीखी शख्सियत से है जिसकी सियासी क्षमता, दक्षता और कुशलता का लोहा समूची दुनिया मानती है। ऐसे में मुख्य विरोधी दल कांग्रेस ने ‘हम निभाएंगे’ के संकल्प के साथ जो चुनावी घोषणापत्र जारी किया है उसमें समाज के एक बड़े वर्ग को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाने के लोकलुभावन वायदे भी किये गए हैं और धुर भाजपाविरोधी माने जानेवाले वर्ग की संवेदना से जुड़े मसलों पर भाजपा के उलट नीति अपनाने का भरोसा दिला कर उन्हें लुभाने की कोशिश भी की गई है। यानि घोषणापत्र का सीधा फोकस उन मसलों पर रखा गया है जिससे आम लोगों का, किसानों का, युवाओं का, महिलाओं का, छोटे व्यापारियों का और गरीबों का सीधा सरोकार हो। हालांकि ऐसी ही रणनीति कांग्रेस ने बीतें दिनों हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी अपनाई थी और उसे इसका भरपूर फायदा भी मिला। विधानसभा चुनावों में किसानों की कर्जमाफी के वायदे का ऐसा असर हुआ कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सरीखे ऐसे गढ़ों में कांग्रेस ने भाजपा को धूल चटा दी जहां भाजपा को उतना ही मजबूत और विपक्ष को उतना ही कमजोर करके आंका जा रहा था जैसी तस्वीर इन दिनों सतही तौर पर लोकसभा चुनाव में दिखाई पड़ रही है। यहां तक कि जैसी मजबूत व विकल्पहीन छवि नरेन्द्र मोदी की राष्ट्रीय राजनीति में दिखाई पड़ रही है वैसी ही ठोस व ताकतवर छवि राजस्थान में वसुंधरा राजे की, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चैहान की और छत्तीसगढ़ में डाॅ रमण सिंह की मानी जा रही थी। उनके मुकाबले कांग्रेस काफी हद तक कमजोर और बिखरी हुई ही नहीं बल्कि वैकल्पिक नेतृत्व पेश कर पाने में भी विफल दिखाई पड़ रही थी। लेकिन आम लोगों से सीधा सरोकार रखने वाले और समाज के सीमांत वर्ग को सीधा लाभ पहुंचाने के किसान कर्ज माफी के कांग्रेस के वायदे ने ऐसा असर डाला कि उन तीनों सूबों का भाजपा का अभेद्य माना जानेवाला दुर्ग ढ़ह गया और उसकी प्राचीर पर कांग्रेस का झंडा लहरा उठा। एक बार फिर कांग्रेस ने वही दांव लोकसभा में आजमाने की पहल की है और अपने चुनावी घोषणा पत्र में ऐसे वायदे किये हैं जिससे देश की आधी से अधिक आबादी को सीधा लाभ उपलब्ध कराने का भरोसा दिलाने का प्रयास किया गया है। लेकिन राजनीतिक लाभ के लिये जिस तरह से अफस्पां हटाने, पुलिस के हाथ बांधने, अलगाववादियों को एक बार फिर मुख्य धारा में वापस लौटने का मौका देने, नागरिकता रजिस्टर तैयार करने के काम को ढ़ीला करने, नागरिकता विधेयक में हुए संशोधनों को वापस लेने सरीखे जो संकेत दिये गये हैं उससे भले ही अल्पसंख्यक समुदाय की संवेदना को सहलाने का सियासी प्रयास सफल हो जाए लेकिन राजनतिक तौर इससे भाजपा द्वारा भड़काई जा रही राष्ट्रवाद की आंधी को ही गति मिलेगी जिससे कांग्रेस को नुकसान भी हो सकता है।