जल बचाओ आंदोलन छेड़ने की जरूरत
July 1, 2019 •  देवानंद राय
( देवानंद राय)
हमारे देश में कभी संविधान बचाओ, तो कभी देश बचाओ तो कहीं आरक्षण बचाओ और न जाने क्या-क्या बचाओ जैसे आंदोलन चलते रहते हैं। यह सब देखने प्रसिद्ध हो चुके हैं कि हमेशा कहीं ना कहीं सुने जाते हैं और हमारा देश कितना बड़ा है कि यहां हर रोज किसी राज्य किसी जिले में आंदोलन तो चलते ही रहते हैं। पर कभी जल बचाओ,पेड़ बचाओ, पर्यावरण बचाओ जैसे आंदोलन हमें सुनाई क्यों नहीं देते ? क्या यह आंदोलन सिर्फ पर्यावरण दिवस, जल दिवस तक ही सीमित रह गए हैं ऐसा नहीं है कि लोग पर्यावरण के प्रति जागरुक नहीं है हमारे देश में तो पेड़ों को पूजा करने की परंपरा है हमारे संस्कृति में जल को भी देवता माना गया है|फिर हम क्यों जल को नष्ट कर रहे हैं ? उसे प्रदूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं पूरे विश्व में भारतीयों के प्रति एक आम धारणा है कि हम तब तक किसी मुद्दे पर गंभीर या सक्रिय नहीं होता जब तक वह समस्या विकराल रूप धारण न करें और पानी सर के ऊपर तक न पहुंचने लगे| क्या हम जल संकट की वैसी ही स्थिति का इंतजार कर रहे हैं ? प्रकृति हमें बार-बार चेता रही है फिर चाहे पिछले वर्ष शिमला में उत्पन्न हुआ जल संकट हो या हाल ही में चेन्नई में पैदा हुआ जल संकट जिसने पूरे विश्व को सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर हम इतना विकास और आधुनिकता पाकर ही क्या कर लेंगे ?जब जीवन की मूलभूत दशाएं ही पृथ्वी पर नहीं होंगी हवा, पानी, पेड़,मिट्टी यह पृथ्वी की मूलभूत चीजें हैं इनके बगैर पृथ्वी पर जीवन की कल्पना असंभव है| फिर हम क्यों नहीं इनको संरक्षित करने के प्रति संकल्पित होते हैं ? हाल ही में प्रधानमंत्री जी ने मन की बात 54वें संस्करण में जल संरक्षण पर विशेष बल दिया स्वच्छ भारत अभियान की तरह ही "जल संरक्षण अभियान" और और "पानी बचाओ आंदोलन" चलाने की आवश्यकता है। स्वच्छ भारत अभियान बेशक पूर्ण रूप में सफल नहीं हुआ पर उसने पूरे भारत को स्वच्छता के प्रति जागरूक किया और हर नागरिक को देश को स्वच्छ रखने में उसकी जिम्मेदारी समझाई आने वाले समय में यह अभियान अवश्य ही नई ऊंचाइयों को छू लेगा और वह दिन दूर नहीं जब पूरा भारत स्वच्छ और स्वस्थ होगा| ठीक वैसे ही हमें जन-जन में जल आंदोलन छेड़ने की आवश्यकता है| आज सिर्फ भारत ही नहीं पूरा विश्व जल संकट से जूझ रहा है हमें इस खुद के बनाए संकट से खुद ही निपटना होगा| देश के कुछ महान हस्तियों ने इस संकट से निपटने के अपने अलग-अलग तरीके अपनाएं जिनमें सदगुरु ने रैली फॉर रिवर्स जैसा अनूठा और अद्भुत कार्यक्रम चलाकर नदियों को और मानव को फिर से एक साथ जोड़ने का प्रयास किया,ठीक वैसे ही जलपुरुष राजेंद्र जी के सुझाव पर भी गौर करने की आवश्यकता है तथा उन्हें अमल में लाने की वर्तमान समय की जरूरत भी है। जल संकट पर बीते 15 जून को नीति आयोग ने एक रिपोर्ट पेश की थी जिसे "समग्र जल प्रबंधन सूचकांक" ( सीडब्ल्यूएमआई) कहा गया रिपोर्ट के अनुसार देश की 135 करोड़ की आबादी में से 60 करोड़ लोग पानी की किल्लत का सामना कर रहे हैं तथा भारत का 70% जल प्रदूषित है तथा जल गुणवत्ता सूचकांक में 122 देशों की सूची में हम 120 नंबर पर हैं। यह कितना शर्मनाक है ? यह उस देश की स्थिति है|जिस देश में नदियों को भी माँँ का दर्जा दिया गया है उन्हें जीवनदायिनी के नाम से सुशोभित किया जाता है।वहां पर इस तरह की स्थिति सचमुच दुखद है।एक अन्य सर्वे के अनुसार यदि जल को संरक्षित और नियोजित करने में युद्ध स्तर का कार्य नहीं किया गया तो अगले वर्ष अर्थात 2020 में देश के 21 बड़े शहर जो वर्तमान में डेंजर जोन में हैं उनके भूगर्भ जल स्तर शून्य पर पहुंच जाएगा। वैसे भी मध्य प्रदेश में वर्तमान में जलस्तर 500 फीट तक पहुंच चुका है।यह हमारे लिए खतरे की संकेत है। कई सर्वे तथा रिसर्च से ये भी.पता चला है कि भारत में पानी की कमी नहीं है बल्कि पानी के सही ढंग से प्रयोग करने की भारी कमी है। हम प्राचीन काल से ही जल संपन्न रहे हैं हमारा देश तीन महासागरों से घिरा हुआ है तथा हमारे देश में कभी भी नदियों की कमी नहीं रही। वह बात अलग है कि आज हमारे गैर जिम्मेदाराना हरकतों से कई नदियां सूख चुकी है तो कुछ लुप्त होने के कगार पर है। समय है कि जल के सही प्रबंधन की, रेनवाटर हार्वेस्टिंग को, डस्टबिन बॉक्स की तरह आम लोगों तक ले जाने की तथा वर्तमान समय में घरों में लगने वाले फिल्टर से निकलने वाले जल का प्रयोग करने कि। उन्हें व्यर्थ ना करें उन्हें भी घरेलू कामों में प्रयोग करने के लिए जागरूकता लानी होगी। इन दिनों सोशल मीडिया पर एक मैसेज बहुत वायरल हुआ है जो यह कहता है नल धीरे खोलो, पानी बदला लेता है। अन्न नाली में ना जाए वरना नाली के कीड़े बनोगे, सुबह-सुबह तुलसी पर जल चढ़ाओ, बरगद, पीपल और आवँला को पूजो जैसे हमारी पुरानी संस्कृति और परंपरा की और भी कई बातें उस मैसेज में लिखी हुई हैं। सही मायनों में यही हमारी संस्कृति और हमारी पहचान थी। परंतु हमने आधुनिकता के चक्कर में चमकता सोना पाने के चक्कर में अपना असली हीरा गँवा बैठे। अब वक्त है पुनः उस परंपरा को पुनर्जीवित करने की और फिर से उसी रास्ते की ओर चलने की ताकि हम जल को पुनः संरक्षित कर सके उसे आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित कर सके तथा उसका सही उपयोग कर अपने इस नीले ग्रह पर जीवन को बचा सकें। अंत में चलते चलते मित्रों ध्यान रखिएगा  "जल है तो कल है" !