जानलेवा बीमारी है क्षय रोग
March 23, 2019 • बाल मुकुन्द ओझा

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार क्षय रोग जानलेवा बीमारी है। यह रोग एक बैक्टीरिया के संक्रमण के कारण होता है। इसे फेफड़ों का रोग माना जाता है। टी.बी. के बैक्टीरिया साँस द्वारा शरीर में प्रवेश करते हैं। रोग से प्रभावित अंगों में छोटी-छोटी गाँठ बन जाती हैं। उपचार न होने पर धीरे-धीरे प्रभावित अंग अपना कार्य करना बंद कर देते हैं और यही मृत्यु का कारण हो सकता है।

विश्व क्षय रोग दिवस पूरे विश्व में 24 मार्च को घोषित किया गया है और इसका ध्येय लोगों को इस बीमारी के विषय में जागरूक करना और क्षय रोग की रोकथाम के लिए कदम उठाना। क्षय रोग दुनिया भर में रुग्णता और मृत्यु दर की एक प्रमुख वजह है क्योंकि क्षय रोग से प्रत्येक वर्ष 1.7 मिलियन लोगों की मृत्यु हो जाती है जिसका तात्पर्य है प्रत्येक बीस सेकण्ड में एक मौत। भारत में क्षय रोग विश्व की विशालतम महामारी है और यह रोग 15 से 45 वर्ष के बीच के भारतीयों का सबसे बड़ा हत्यारा है। भारत में यह एक दिन में हजार से भी अधिक मौतों का कारण है। भारत में टीबी के मरीजों की संख्या दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा है। यदि एक औसत निकालें तो दुनिया के 30 प्रतिशत टीबी रोगी भारत में पाए जाते हैं। टी.बी. का पूरा नाम है ट्यूबरकुल बेसिलाइ। यह एक छूत का रोग है और इसे प्रारंभिक अवस्था में ही न रोका गया तो जानलेवा साबित होता है। यह व्यक्ति को धीरे-धीरे मारता है। टी.बी. रोग को अन्य कई नाम से जाना जाता है, जैसे तपेदिक, क्षय रोग तथा यक्ष्मा। दुनिया में छह-सात करोड़ लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं और प्रत्येक वर्ष 25 से 30 लाख लोगों की इससे मौत हो जाती है। देश में हर तीन मिनट में दो मरीज क्षयरोग के कारण दम तोड़ देते हैं। हर दिन चालीस हजार लोगों को इसका संक्रमण हो जाता है। क्षय रोग के कीटाणु, संक्रमित लोगों के खांसने, छींकने, बातें करने और थूकने से हवा में घुलकर रोग को बढ़ाते हैं। किसी भी व्यक्ति की सांसों में घुलकर यह दण्डाणु उसे प्रभावित कर सकते हैं। क्षय रोग की शुरुआत में आप थोड़ा सा काम करने पर थक जाते हैं आपको कमजोरी महसूस होने लगती है। कई बार लोग इस लक्षण को गंभीरता से नहीं लेते हैं और धीरे-धीरे आपके शरीर पर टी.बी के बैकटेरिया आक्रमण करना शुरु कर देते हैं। बुखार आना, सर्दी जुकाम होना यह तपेदिक होने की शुरुआत भी हो सकते हैं। कई बार यह अपने आप ठीक भी हो जाता है लेकिन कभी-कभी यह वापस भी आ जाता है। ऐसे में बिना देर किए तुरंत क्षय रोग का टेस्ट कराएं।
इस घातक बीमारी से बचने के लिए, विश्व स्वास्थय संगठन द्वारा प्रत्यक्ष निगरानी उपचार कोर्स, जिसे डॉट्स के नाम से जाना जाता है, की सिफारिश की गई है। यह बैक्टीरियोसाइडल और बैक्टीरियोस्टेटिक दवाओं की मिश्रित चिकित्सा पद्धति है जिसमें आइसोनियाजिड, रिफैम्पिन, इथामब्युटोल और पाइरैजिनामाइड शामिल है। टी.बी रोग अब लाइलाज नहीं रहा। हमारे देश में ऐसी दवाईयां बन चुकी हैं जिनसे क्षय रोग ठीक हो सकता है। इन दवाओं का कोर्स 6-9 महिने का होता है। लेकिन सामान्य तौर पर मरीज थोड़ा सा ठीक महसूस करने पर दवाओं का सेवन करना बंद कर देता। इससे टी.बी के दोबारा होने का खतरा बढ़ जाता है। डॉट्स के जरिए टी.बी के रोगियों को ठीक किया जाता है। इसके द्वारा कम समय में रोगी को पूरी तरह से इस रोग से मुक्ति दिलाई जा सकती है। यह विधि स्वास्थय संगठन द्वारा विश्व स्तर पर टी.बी. को नियन्त्रण करने के लिये अपनाई गई एक विश्वसनीय विधि है, जिसमें रोगी को एक-दिन छोड़कर हफ्ते में तीन दिन डॉट्स कार्यकर्ता के द्वारा दवाई का सेवन कराया जाता है।
भारतीय धार्मिक ग्रंथों में क्षय रोग का उल्लेख मिलता है। ऋगवेद (1500 ई.पू. लिखा गया) में क्षय रोग को यक्षमा कहा गया है, अथर्ववेद में इसे बालसा कहा गया है। सुश्रुत संहिता (620 ई.पू. लिखा गया) में इस रोग से बचाव के लिए मां का दूध, विभिन्न प्रकार के मांस, शराब और आराम का प्रयोग करने को कहा गया है। शिव पुराण में क्षय रोग का वर्णन मिलता है। इसकी कहानी के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्री के पति चंद्रमा को क्षय रोग होने का श्राप दिया था।
टीबी भारत की प्रमुख स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक है। देश आज पहले की तुलना में टीबी से लड़ने के लिए बेहतर रूप से तैयार है। देश प्रभावी रूप से इस रोग को रोकने के लिए इसके निदान, उपचार और देखभाल की आधुनिक तकनीकों से लैस है। वर्ष 2012-2017 की अवधि के दौरान, संशोधित राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम ने 42 मिलियन से अधिक व्यक्तियों की जांच की और 7 मिलियन से अधिक रोगियों का उपचार किया गया।