जिस आपातकाल के विरोध के चलते उपेक्षित रहीं, उसने वक्त बदलते ही पहुंचा दिया संसद
June 8, 2019 • राकेश गुप्ता
                                           साक्षात्कार
मशहूर नृत्यांगना और राज्यसभा सांसद पद्मविभूषण डॉ सोनल मानसिंह से वरिष्ठ पत्रकार राकेश गुप्ता ने विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की। इस दौरान डॉ सोनल मानसिंह ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य के वर्तमान और भविष्य पर अपने विचार व्यक्त करने के साथ-साथ अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक अनुभव भी साझा किए। इमरजेंसी का विरोध करने के कारण उन्हें किस तरह की राजनीतिक यातनाएं झेलनी पड़ी, इसका जिक्र भी उन्होंने बेबाकी से किया।
प्रस्तुत है राकेश गुप्ता के साथ सोनल मान सिंह की हुई बातचीत के मुख्य अंश:-
 
सवालः सोनल जी आपका स्वागत है। आप स्वतंत्रता सेनानी परिवार से आती हैं और आपके दादा जी ने तो नमक सत्याग्रह आंदोलन में भी भाग लिया। एक स्वतंत्र विचार वाले परिवार से आने के बावजूद क्या नृत्य को करिअर के रूप में चुनना आपके लिए आसान रहा। क्योंकि जिस समय आपने इसे चुना वो समय मुझे लगता है कि नृत्य के लिए बहुत अच्छा या फवरेबल नहीं था? अपनी इस यात्रा के बारे में कुछ बताएं। 
 
जवाबः आपकी बात बिल्कुल सही है, शत-प्रतिशत सही है कि परिवेश नृत्य के अनुरूप नहीं था। लेकिन पहले तो मैं ये कहूंगी कि मैंने नृत्य को नहीं चुना, नृत्य ने मुझे चुना। नृत्य की देवी ने मुझे माध्यम बनाया। हम गुजराती हैं और हमें ये कहा गया कि नृत्य-संगीत सीखो, लेकिन वो भी करो यानि पढ़ाई भी करो। तो मैंने कई बार कहा है कि वो ही करो, वो भी करो, यह 'ही' और 'भी' का फर्क है, तो मैंने बीए भी किया, जर्मन लिटरेचर से ऑनर्स भी किया। ये करो वो करो नृत्य भी करो आगे। तो मेरे मुंह से निकला, गुजराती में कि, 'मुझे तो यही करना है'। लेकिन परिवार ने विरोध किया, तो मैं घर से भाग गई। और अकेले बम्बई से बेंगलुरू आ गई अपने गुरू के पास। उस समय मेरी उम्र केवल 18 साल की थी। मैंने 7 साल की उम्र से ही भरतनाट्यम सीखना शुरू कर दिया था और आज भी अपने आप को विद्यार्थी ही मानती हूं।
 
सवालः आप भारतीय शास्त्रीय नृत्य की ध्वजवाहक हैं। लेकिन आपके पीछे जो युवा पीढ़ी है, उन्हें रिअलिटी शो अच्छे लगते हैं, वो वेस्टर्न डांस में ज्यादा इनट्रेस्ट लेते हैं, आपको नहीं लगता कि कहीं ना कहीं ये ट्रेंड हमारी सांस्कृतिक पहचान को धुमिल कर रही है। 
 
जवाबः मैं सहमत नहीं हूं। यदि ऐसा होता तो आज नृत्य लगभग खत्म हो गया होता। हजारों नए डांसर आ रहे उभरकर। खासकर नए युवा पुरुष भरतनाट्यम, कुचीपुड़ी, कथक नृत्यकार आगे आ रहे हैं। पुरूषों का इस नृत्य के प्रति रूझान बढ़ा है। रिऐलिटी शो का अपना चार्म है, उसका अलग ग्लैमर है। रिएलिटी शो और चैनलों के प्रति मेरा आक्रोश है। 200-250 लगभग टीवी चौनल होंगे। लेकिन उसमें साधना और डीडी भारती जैसे 4-5 चैनलों के अलावे दूसरा कोई भी चैनल भारतीय संस्कृति और कला व विज्ञान के बारे में कुछ नहीं दिखाता। ये एक बहुत ही खेद का विषय है। भारतीय कला और संस्कृति के प्रति भारतीय टीवी चैनलों की भी जिम्मेदारी बनती है। टीआरपी का वाला भूत बिल्कुल गलत है। रिअलिटी शो हैं, ठीक है अच्छा है। बच्चों को पैसा मिल जाता है, स्क्रीन पर आते हैं, मां-बाप को दिखाते हैं। मैंने रुमझुम एक शो किया था। उसमें मैंने भारतीय नृत्य के सामने नॉन भारतीय नृत्य का मुकाबला करवाया। जो ढाई मिनट में रियलिटी शो में जीतकर आए थे, उनसे हमने ढाई मिनट के नहीं, पांच मिनट के या छह मिनट के नृत्य करवाये वो नहीं कर सके। 
 
सवालः पिछले वर्ष राष्ट्रपति द्वारा राज्य सभा के लिए आप मनोनीत की गईं, ये बहुत बड़ी रिकॉगनेशन है आपकी कला को, हमारी संस्कृति को। नृत्य-कला के क्षेत्र से आप शायद 70-72 वर्ष में दूसरी सांसद हो राज्यसभा की। आपको कैसा लगा जब आपको राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया?
 
जवाबः 7 जुलाई 2018 की सुबह में हमारा एक कार्यक्रम स्वच्छ भारत के ऊपर था, प्रोग्राम शुरु होने वाला था, और उससे पहले फोन आया, मुझे प्रेसिडेंट ने बुलाया है राष्ट्रपति भवन। 
फिर कहा कि मैंने सुना कि देश ने तुमको गौरव नहीं दिया है। मैंने कहा, नहीं ये सब मिले हैं। बोले, पद्म अवॉर्ड मिला है क्या, 1991 की बात है। मेरे से कहीं छोटी लड़की ले गई थी।
 
सवाल : ऐसा क्यों किया सरकार ने आपके साथ, आपकी सरकार के साथ क्या दुश्मनी थी? 
 
जवाब : ऐसा सब इसलिए हुआ क्योंकि मैंने इमरजेंसी का विरोध किया था। मैंने यशपाल कपूर और इनके ऊपर कार्यक्रम करने का मना कर दिया था। मेरी बहुत लंबी कहानी है। मैंने बहुत झेला है। जब-जब कांग्रेस की सरकार रही, मैं बिल्कुल कटी रही। दूसरा, 1992 फिर पद्मभूषण सीधे दे दिया। 1993 में विवेकानंद जी का 100 वर्ष शिकागो तो वॉशिगटन में हो रहा था बड़ा कार्यक्रम। अटल जी मेरे घर आए मुझे कहने के लिए कि मैं चाहता हूं कि आप जाएं। लेकिन अर्जुन सिंह के कहने पर मेरी टीम का वीजा नहीं दिया गया। तब मैं रिकार्डेड म्यूजिक के साथ शिकागो गई परफॉर्म करने। तब से आप मानिए मेरे ऊपर संघी, सैफरन होने का धब्बा लगाया। मुझे धमकी भरे चिट्ठियां, कॉल सब आने लगे। आने के बाद से मेरे लिए वो धब्बा लग गया, लेकिन धब्बा क्या था मेरे लिए तो गौरव बन गया। लेकिन आप सोचिए, मैंने क्या-क्या झेला। मैं इस देश की हूं। आपका शुक्रिया आपने ये सवाल पूछा, शायद आपको ये पता नहीं था। 
 
सवालः सोनल जी जैसे कलाकार राजनीति में जा रहे हैं। आप राज्यसभा में गई मनोनीत होकर राष्ट्रपति के द्वारा, इलेक्शन लड़कर नहीं गई, लेकिन जिस तरह फिल्मी कलाकार, गायक राजनीति में जा रहे हैं। आपको कभी राजनीति में जाने की इच्छा नहीं हुई। 
 
जवाबः मैं कला नीति में हूं। वहीं मेरे लिए सही माध्यम है यह कहीं ना कहीं जोड़ता है। 
 
सवालः सोनल जी अभी लोकसभा चुनाव में लोगों ने मोदी सरकार के प्रति उनके कामों के प्रति जोरदार तरीके से समर्थन दिया, आपका क्या कहना इस चुनाव के बारे में। 
 
जवाबः मैं कुछ महीने से कह रही थी कि मुझे 300 से कम नहीं चलेगा। मैंने कहा, हम गिलहरी हैं जो श्रीराम के सेतु के लिए कंकड़ लाती थी। 300 से ऊपर आया। बहुमत आया। हम सब जानते हैं कि मोदी जी राष्ट्र को समर्पित हैं। मैं उनको कर्मयोगी कहती हूं। मेरे सामने जो उनका चित्र आता है कि केदारनाथ की गुफा में बैठे हैं। किसी ने सोचा कि इतनी मेहनत करने के बाद जब आपका बहुमत पक्का है तो व्यक्ति केदरनाथ मंदिर भी जाए, फिर जाकर गुफा में 17 घंटे बैठ जाए! कभी देखा ऐसा! मोदी जी का भगवा रंग देखकर मुझे कवि दिनकर जी की पंक्तियां याद आ रही हैं। “मेरे नगपति, मेरे विशाल, साकार दिव्य गौरव विराट, पौरुष के पूंजी भूत ज्वाल, मेरी जननी के हिम के रीत, मेरे भारत के दिव्य भाल।”