जीवन का अभिन्न अंग है महासागर
June 7, 2019 • बाल मुकुन्द ओझा

                        (बाल मुकुन्द ओझा)

विश्व महासागर दिवस प्रतिवर्ष 8 जून को मनाया जाता है। पृथ्वी का तीन चैथाई भाग जल से घिरा हुआ है। महासागर वह समग्र लवण जलराशि है जो पृथ्वी के लगभग तीन चैथाई पृष्ठ पर फैला हुआ है। महासागर के छोटे छोटे भागों को समुद्र तथा खाड़ी कहते हैं। संसार में पाँच महासागर हैं जिनके नाम तथा क्षेत्रफल इस प्रकार हैं। प्रशांत महासागर 6,36,34,000 वर्ग मील, ऐटलैंटिक महासागर 3,13,50,000 वर्ग मील, हिंद महासागर 2,83,56,000 वर्ग मील, आर्कटिक महासागर 40,00,000 वर्ग मील तथा ऐंटार्कटिक महासागर 57,31,000 वर्ग मील।
महासागरों में प्रशांत महासागर सबसे गहरा है। इसकी औसत गहराई 14,000 फुट से अधिक है। विश्व में होनेवाली वर्षा महासागरों पर ही निर्भर है। महासागर कभी सूखता नहीं क्योंकि इसमें से जितना पानी वाष्प बनकर उड़ता है वह वर्षा द्वारा नदियों में बहकर पुन सागर में मिल जाता है। इस प्रकार से पानी का एक चक्र बना रहता है। महासागर लहरों तथा ज्वार भाटा से कई प्रकार के कटाव एवं जमाव करता है जिनसे विशेष प्रकार की भू-आकृतियाँ बनती हैं। लहरों से विभिन्न प्रकार के द्वीप तथा खाड़ियों का निर्माण होता है। विश्व में होनेवाली वर्षा महासागरों पर ही निर्भर है। महासागर कभी सूखता नहीं, क्योंकि इसमें से जितना पानी वाष्प बनकर उड़ता है वह वर्षा द्वारा नदियों में बहकर पुन सागर में मिल जाता है। इस प्रकार से पानी का एक चक्र बना रहता है। महासागर लहरों तथा ज्वार भाटा से कई प्रकार के कटाव एवं जमाव करता है, जिनसे विशेष प्रकार की भू-आकृतियाँ बनती हैं। लहरों से विभिन्न प्रकार के द्वीप तथा खाड़ियों का निर्माण होता है। पृथ्वी केवल ठोस पदार्थ से ही नहीं बनी है, बल्कि जल से भी भरी हुई है ।
सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण होने के कारण महासागर अत्यंत उपयोगी हैं। बताते है पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति महासागरों में ही हुई। धरती के 71 प्रतिशत हिस्से पर महासागर फैले हुए है। पूरी दुनिया का 98 प्रतिशत जल महासागरों में और 2 प्रतिशत जल नदियों, झीलों आदि में है। विश्व महासागर दिवस मनाने का प्रमुख कारण विश्व में महासागरों के महत्व और उनकी वजह से आने वाली चुनौतियों के बारे में विश्व में जागरूकता पैदा करना है। इसके अलावा महासागर से जुड़े पहलुओं, जैसे- खाद्य सुरक्षा, जैव-विविधता, पारिस्थितिक संतुलन, सामुद्रिक संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग, जलवायु परिवर्तन आदि पर प्रकाश डालना है। महासागर धरती के मौसम को निर्धारित करने वाले प्रमुख कारक हैं। महासागरीय जल की लवणता और विशिष्ट ऊष्माधारिता का गुण पृथ्वी के मौसम को प्रभावित करता है। महासागरीय धाराएं जिस क्षेत्र से बहती वहाँ के तापमान की स्थितियों को प्रभावित करती हैं, जैसे-गर्म धाराएं सतह के तापमान को बढ़ा देती हैं। वैसे क्षेत्र जहां गर्म और ठंडी धाराएं मिलती हैं, दुनिया में मछली पकड़ने के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
मानव जीवन को विभिन्न प्रकार से जीवन दान देने वाले महासागरों में बढ़ता प्रदूषण चिंता का विषय बनता जा रहा है। अरबों टन प्लास्टिक का कचरा हर साल महासागर में समा जाता है। आसानी से विघटित नहीं होने के कारण यह कचरा महासागर में जस का तस पड़ा रहता है। अकेले हिंद महासागर में भारतीय उपमहाद्वीप से पहुंचने वाली भारी धातुओं और लवणीय प्रदूषण की मात्रा प्रतिवर्ष करोड़ों टन है। विषैले रसायनों के रोजाना मिलने से समद्री जैव विविधता भी प्रभावित होती है। इन विषैले रसायनों के कारण समुद्री वनस्पति की वृद्धि पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। आज विश्व की करीब 30 प्रतिशत जनसंख्या तटीय क्षेत्रों में निवास करती है। यही वजह है कि विश्व के सबसे विशालकाय जीव ब्लू व्हेल से लेकर असंख्य सूक्ष्म जीवों को रहने के लिए ठिकाना मुहैया कराने वाले महासागर आज इंसानी गलतियों के कारण प्रदूषित हो रहे है।