ज्वाइंट वेंचर स्कीम से जीडीए को 448 करोड़ की चपत
August 2, 2019 • ब्यूरो चीफ
            # यह नुकसान जीडीए को शिप्रा एस्टेट लिमिटेड के साथ ज्वाइंटवेंचर से हुआ
गाजियाबाद। भाजपा के वरिष्ठ पार्षद राजेंद्र त्यागी ने एक बार फिर जीडीए को निशाने पर लिया है। उन्होंने जीडीए के पूर्व अधिकारियों पर आरोप लगाया कि इंदिरापुरम में ज्वाइंट वेंचर स्कीम से जीडीए को 448 करोड़ रुपये की चपत लगी। उन्होंने शुक्रवार को एक प्रेसवार्ता कर इसका खुलासा किया। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर पूरे मामले की सीबीआई से जांच कराने की मांग की है। उनका दावा है कि अगर सीबीआई से इस केस की जांच हुई तो कई अफसर भी इसमें फंस जाएंगे।
 
प्रेसवार्ता में उन्होंने बताया कि यह नुकसान जीडीए को शिप्रा एस्टेट लिमिटेड के साथ ज्वाइंट वेंचर से हुआ। जीडीए ने इस कंपनी के साथ भूखंड संख्या-10 एवं 17 वैभवखंड में ज्वाइंटवेंचर किया था। इसका कुल क्षेत्रफल 22 हेक्टेयर था। इसी ज्वाइंट वेंचर में उन्होंने दावा किया कि प्राधिकरण को 448 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। बताया गया है कि इंदिरापुरम आवासीय योजना के लिए 1295 एकड़ जमीन का जीडीए ने अधिग्रहण किया था। इसका मूल्य जीडीए ने प्लॉट आवंटित करने के लिए 5600 रुपये वर्गमीटर तय किया और इसमें 1320 रुपये प्रति वर्गमीटर का डेवलपमेंट चार्ज जोड़कर इसका वास्तविक मूल्य 6920 रुपये प्रति वर्गमीटर तय किया। इस कॉलोनी में 148 हेक्टेयर जमीन बहुमंजिली इमारतों के लिए रिजर्व की गई। 1988 में इसका भू-उपयोग परिवर्तन किया गया और एफएआर 1.5 तय किया गया। जीडीए ने 1993 में प्राधिकरण की बोर्ड बैठक में एक प्रस्ताव लेकर आया, जिसमें कुल एफएआर 1.5 में से कुछ की कटौती कर दी और इसका लोड ग्रुप हाउसिंग पर डाल दिया। लेकिन इसी बीच मंदी का दौर शुरू हो गया और जीडीए ने 148 हेक्टेयर भूमि पर अर्द्धनिर्मित 14 मंजिले टॉवर जो है, जैसा है जहां है की स्थिति में बेचने के लिए निविदा आमंत्रित की। 4 जून 1994 को प्राधिकरण बोर्ड द्वारा जीटीपीएल अधिकतम बोली आई और इसके साथ जीडीए का एमओयू साइन हो गया। लेकिन, अनुबंध की शर्तों के अनुसार जीटीपीएल भुगतान नहीं कर पाया और 17 फरवरी 1995 को एमओयू निरस्त हो गया।
 
बदलती परिस्थितियों के चलते 21 सितंबर 1995 को एक समझौते के आधार पर दोनों के बीच एमओयू का निर्णय लिया गया और अनुमोदन के लिए प्रस्ताव शासन को भेजा गया। किंतु कंपनी फिर भी भुगतान नहीं कर पाई और 12 दिसंबर 1996 को अनुबंध निरस्त हो गया। जीटीपीएल इसके खिलाफ हाईकोर्ट गया, जिसमें अपील खारिज हो गई। जीटीपीएल को जमा धनराशि के बराबर जीडीए ने जमीन देकर बाकी जमीन को बल्क में बेचने को प्रस्ताव मांगे। 27 मार्च 2000 को निविदा आमंत्रित की गई। इसमें शिप्रा एस्टेट लिमिटेड की उच्चतम बोली आई, जिसमें 106.31 करोड़ रुपये की बोली लगाई गई। 31 मार्च 2000 को इसे स्वीकृत कर लिया गया। भूखंड संख्या-10 व 17 वैभवखंड इंदिरापुरम का अर्द्धनिर्मित टावर, क्षेत्रफल 22.31 हेक्टेयर देने के लिए 8 जनवरी 2001 को प्राधिकरण ने एमओयू साइन किया। 
 
एमओयू में दी गई शर्तों के अनुसार शिप्रा एस्टेट लिमिटेड को उपाध्यक्ष जीडीए से मानचित्र स्वीकृत कराना होगा। अर्द्धनिर्मित निर्माण की समीक्षा को वीसी की अध्यक्षता में एक मॉनिटरिंग कमेटी भी गठित की गई, जिसमें सचिव वित्त नियंत्रक, सीएटीपी, चीफ नियंत्रक, उपाध्यक्ष अथवा आवास बंधु नामित सदस्य रहेंगे। देय प्रीमियम 106.31 करोड़ की वसूली के लिए एक एस्को एकाउंट खोलने का भी निर्णय लिया गया। बिड अमाउंट के सापेक्ष 15.94 करोड़ रुपये 28 सितंबर 2000 को जमा कराये थे। एमओयू में 20 प्रतिशत धनराशि भुगतान करने के बाद बाकी बची 80 प्रतिशत धनराशि भुगतान के लिए शिप्रा एस्टेट लिमिटेड को किसी भी वित्त संस्थान से लोन लेने की सुविधा भी दी गई। बिड अमाउंट के सापेक्ष कंपनी ने 31 मार्च 2003 को बकाया सभी धनराशि जमा करा दी। प्लॉट नंबर-10 का मानचित्र शर्त के अनुसार 26 मई 2001 में स्वीकृत कराया गया। बाद में 3 अक्टूबर 2002 को संशोधित किया गया।
 
भूखंड संख्या-10 वैभवखंड के सम्पूर्ण भूभाग पर मानचित्र शिप्रा एस्टेट लिमिटेड द्वारा 17 जुलाई 2012 को प्रस्तुत किया गया। जो सिटी डेवलपमेंट चार्ज 164.64 करोड़ रुपये की शर्त पर 23 जुलाई 2013 को स्वीकृत कर लिया गया। अन्य चार्ज सम्मिलित करते हुए 168.82 करोड़ रुपये की देयता तय की गई। जबकि पूर्व में हुए एमओयू के अनुसार, 22.31 हेक्टेयर के लिए 1.5 एफएआर वर्ष 2001 में 106.31 करोड़ रुपये आवंटित किया गया था। उस समय भूमि का मूल्य 1900 रुपये प्रति वर्गमीटर की दर से आवंटित किया गया। वर्ष 2014 में इंदिरापुरम आवास योजना का सेक्टर-10, 50 हजार प्रति वर्गमीटर था। एक प्रतिशत अतिरिक्त एफएआर अनुमान्य किये जाने पर 22.31 हेक्टेयर भूमि के लिए 446 करोड़ रुपये अतिरिक्त प्राप्त होते। लेकिन, प्राधिकरण ने एमओयू की शर्तों को संज्ञान में नहीं लिया और गलत तरीके से 1.5 के स्थान पर 2.5 एफएआर बनाने की अनुमति शिप्रा एस्टेट लिमिटेड को जारी कर दी, जिससे जीडीए को मोटी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी। 
 
यही नहीं, बीजेपी पार्षद राजेंद्र त्यागी का आरोप है कि उच्चतम न्यायालय डिजाइन आर्च व सन टावर के प्रकरण में 13 नवंबर 2011 को जो फैसला आया कि अतिरिक्त एफएआर अनुमान्य किये जाने से पहले आवंटियों और आरडब्ल्यूए से सहमति लेना का भी उल्लंघन किया गया और 2014 में मानचित्र स्वीकृत कर दिया गया। 1.5 एफएआर का निर्माण करने का पट्टा रोजबेरी के पक्ष में निष्पादित हुआ था। ज्वाइंटवेंचर की शर्त के अनुसार, 1.5 एफएआर से अतिरिक्त 2.5 एफएआर दिये जाने से पूर्व प्राधिकरण को एक एफएआर के लिए अतिरिक्त मूल्य जो 446 करोड़ रुपया बैठता है, लेना चाहिए था। वहीं, अतिरिक्त एफएआर मान्य किये जाने के विषय में उक्त एफएआर की रजिस्ट्री प्राधिकरण से कराई जानी चाहिए थी, क्योंकि पट्टा विलेख में मात्र 1.5 के ही अधिकार दिये गये हैं। लिहाजा, पार्षद त्यागी ने मुख्यमंत्री से मांग की कि इस प्रकरण की जांच सीबीआई से कराकर जीडीए के दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए। 
 
उधर, इस सम्बन्ध में जीडीए अधिकारियों का कहना है कि इस विषय का अध्ययन करने के बाद ही कुछ बता पाएंगे, क्योंकि उठाया गया मामला पूर्ववर्ती अधिकारियों से जुड़ा हुआ है, इसलिए समीचीन अध्ययन जरूरी है। 
प्रेसवार्ता में राकेश पाराशर, वीरेंद्र सारस्वत, आरके सिंह, भूपेंद्र चित्तोडिय़ा, हिमांशु मित्तल, केके त्यागी आदि मौजूद रहे।