तिरिया जन्म झनि दे
July 19, 2019 • उर्मिला शुक्ल

(उर्मिला शुक्ल)

सोने सा दमकता रंग ,माथे पर गोल सिंदूरी बिंदी ,ओठों पर पान की गहरी लाली और बड़ी - बड़ी कजरारी आँखें ;मगर उनमें एक सूनापन तैरता रहता . उनका एक ही सपना था कि उनकी कोख भी हरिया जाय .वे भी मजलिस में सिर उठा कह सकें कि वे निरबंसिन नहीं हैं ;मगर ऐसा हुआ नहीं .उनका यह सपना उनकी कजरारी आँखों की कोर में ही अटक कर रह गया . कितनी चकित कर देने वाली बात है न .संतानवती होने के बाद भी वे निरबंसिन कही जाती थीं .मैं उनकी संतान हूँ .मुझे उन्होंने नौ महीने अपनी कोख में रखा था . मुझे उन्होंने उतने ही कष्ट से जना था ,जितने कष्ट से बेटे जने जाते हैं .फिर भी उनकी कोख हरियाई नहीं थी .क्यों ?क्योंकि मैं बेटी थी ! अपने इस एक दुर्गुण के कारण वे निरबंसिन कहलाती रहीं .हाँ ! ये उनका ही दुर्गुण था .उनकी ही कमी थी कि उन्होंने बिटिया को जन्म दिया था .उस जमाने में बेटी को जन्म देने वाली औरत तो दुर्गुणी ही मानी जाती थी .सो उनके इस दुर्गुण ने उनके सारे गुणों पीछे ठेल कर उन्हें निरबंसिन बना दिया था .

वे इस गौरवशाली देश के उसी प्रांत में जन्मीं थीं ,जिसे दुनिया राम के नाम से जानती है .जिसकी धरती के कण - कण पर राम का आख्यान लिखा है .और सीता ? उनकी भी कथायें हैं .उनके त्याग ,बलिदान के साथ- साथ उनके धरती में समा जाने की कथा भी है ;मगर इन कथाओं में वह कथा कहीं नहीं है जो उ सीता के स्वाभिमान की कथा है .सीता की ही क्यों ,वह कथा सम्पूर्ण तो स्त्री जाति के स्वाभिमान की कथा है . उन्होंने उस पुरुष के पास लौटना स्वीकार नहीं किया था,जिसने उन्हें उस समय त्याग दिया  था जब ,उन्हें उसकी अधिक जरूरत थी .यह एक स्त्री का स्वाभिमान था ; मगर इससे पुरुष के पुरुषत्व की धार गोंठिल हो जाती .राम जैसे आदर्श पुरुष के अस्वीकार बात पुरुषसत्ता के गले कैसे उतरती भला .सो उसने इस  कथा को पीछे ठेल दिया और उन कथाओं  को प्रचारित किया ,जो पुरुषसत्ता को पोषण देती है .इसीलिए लोक कथाओं में भी सीता राम की अनुगामिनी हैं .वे पत्नी हैं . लव - कुश जैसे होनहार बेटों को जन्म देने वाली सीता - माता हैं वे .उनकी पहचान राम से है जिनकी वे पत्नी थीं .उनकी पहचान लव और कुश से है ,जिन्हें उन्होंने जन्म दिया था .मगर वो सीता जो शिव के धनुष को उठाने की क्षमता रखती थी ,वो सीता जिसने  रावण को भी सयंम का पाठ पढने पर मजबूर कर दिया था ,उसका कोई जिक्र ही नहीं है .इसके उलट उस अग्नि परीक्षा को प्रचारित किया गया जो सीता को ही नहीं पूरी स्त्री जाति को अपमानित करती है .

यह है पुरुषसत्ता .जो स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकारना ही नहीं चाहती  . इसीलिए उसने सीता जैसी सशक्त स्त्री को अनुगामिनी बना दिया और एक सामाजिक साँचा तैयार किया ,जिसमें से ढलकर सीता जैसी औरतें ही बनायी जाने लगीं .फिर  सदियों - सदियों से सीता के साँचे में ढलती औरतें खुद को वही मान बैठीं जो समाज ने मनवाया . कुलटा ,कलंकिनी ,बाँझ और निरबनसिनी सब कुछ मान लिया अपने को .

“जेहि बिटिया कय जनम होत है ,ऊ ठउर की भूईया तक झरस जाती है “ये सूक्ति अम्मा को नानी ने ,नानी को उनकी अम्मा ने ,उनकी अम्मा को उनकी अम्मा ने घुट्टी पिलाई थीं .तर्क और विरोध ?इसका तो सवाल ही नहीं था .सो अम्मा ने भी मान लिया था कि वे दूसरों से कमतर हैं .इसलिए कि वे वह  नहीं कर पायीं ,जो उन्हें करना था . जो कर्तव्य था उनका, जिसके लिए ही जन्म हुआ था उनका .पति की वंशबेल बढ़ाने में वे अक्षम रहीं ,यह बात उनके मन में गहरे पैठ चुकी थी . न तो वे इतनी पढ़ी लिखी थीं और न ही साइंस ने तब इतनी तरक्की की थी कि वे जान पातीं कि लिंग निर्धारण में स्त्री का तो कोई हाथ होता ही नहीं है .सो जीवन भर एक बोझ लिए रहीं. अपने मन को छेदती  रहीं और छिदवाती रहीं उस काया को ,जो कभी कंचन कही जाती थी .बार- बार आपरेशन की पीड़ा से गुजरीं .न जाने कितने देवालयों में माथा नवाया , मन्नतें मांगीं ,झाड़ -फूंक ,टोना – टोटका सब किया ;मगर ये आकाँक्षा कभी पूरी नहीं हो पायी .इस अधूरी आकाँक्षा ने उनकी आँखों की वो सुन्दरता ही छीन ली ,जो उनकी विशेषता हुआ करती थी .अब सूनापन ही उन आँखों का स्थायीभाव बन गया था .

वे डोरियन की साड़ी के आँचल को अपनी कमर में कुछ इस तरह खोंसती थीं कि वह इंच भर भी इधर -उधर नहीं होता था .ठीक उसी तरह ,जिस तरह उनका मन .अपने मन को साध रखा था उन्होंने .मैंने उन्हें कभी ठठाकर हँसते नहीं देखा . अपनी ख्वाहिशों को दबाकर कैसे जिया जाता है, वे बखूबी जानती थीं .उनके इर्द -गिर्द  वर्जनाओं की एक सघन बाड़ थी ,जिसे तोडना तो दूर उसके पार झाँकना तक गवारा नहीं था उन्हें .

दंडक वन की सीता

फिर बाप्पा की नौकरी की नौकरी लगी थी मध्य प्रदेश में और पोस्टिंग मिली सुदूर बस्तर के दंतेवाडा में .दंतेवाडा उन दिनों एक छोटा सा कस्बा था . आदिवासी इलाके का एक कस्बा .जहाँ के जीवन में जंगल सा विस्तार था .एक खुलापन था वहाँ ..वहाँ की स्त्रियाँ भी उतनी ही स्वतंत्र थीं ,जितने पुरुष .वहाँ स्त्री पुरुष में वैसा भेदभाव नहीं था ,जैसा अन्य समाजों में होता है .वहाँ की स्त्रियाँ उनकी तरह चारदीवारी में कैद नहीं थीं .उनकी हँसी और उनके जीवन पर कोई पहरा नहीं था .वे ठठाकर हँसती और खुलकर जीती थीं .अम्मा चकित सी उन्हें देखतीं और सोचतीं की ये कौन सी दुनिया है ? यहाँ औरतों को इतनी आजादी कि वे पराये मरदों के संग इस कदर जोर - जोर से हँसती - खिलखिलाती हैं ! उनके साथ हाट -बजार जाती हैं !उनके यहाँ मरदों के साथ ऐसे  हाट - बजार जाना और इस तरह हँसी ठिठोली करना ,तो गुनाह ही माना जाता था .अब अम्मा के लिए भी बंधन वैसा कठोर नहीं रह गया था . सुदूर बस्तर के उस कस्बे में अब अम्मा का वो समाज नहीं था ,फिर भी वे उस वर्जना के घेरे को  लाँघ नहीं पायीं थीं . तभी तो अवध से हजारों मील दूर रहकर भी वे उन्हीं वर्जनाओं को जीती रहीं ,अपने उस नासूर को सहलाती रहीं ;जिसका यहाँ कोई वजूद ही नहीं था .अब वहाँ कोई निरबंसिन कहने वाला था ही नहीं . कारण उस अंचल में लड़की और लड़के में उस तरह का कोई भेद था ही नहीं .

बस्तर ही नहीं समूचे छ्त्तीसगढ़ में पुरुषसत्ता को पोषण देने वाले व्रतों का चलन ही नहीं था . भारत अधिकांश इलाकों में किया जाने वाला व्रत ,जो लड़के की माँ को श्रेष्ठ और लड़की की माँ को कमतर बनाता था ,वो हलषष्ठी व्रत यहाँ संतान कामना का व्रत था . यहाँ इसे लड़के की माँ ही नहीं ,हर स्त्री करती थी . सिर्फ व्रत ही नहीं और भी बहुत कुछ ऐसा था ,जो उनके उस समाज से अलग था ;मगर वे उसी समाज से ,उसके नियमों से आजीवन बँधी रहीं .सच तो ये है कि उन्हें वो वर्जनाये गलत लगती ही नहीं थीं .उसे उनके मन ने स्वीकार लिया था .वे उनके जीवन का हिस्सा बन गयी थीं ,तभी तो उनसे आजाद होकर भी वे आजाद नहीं हो पायी थीं .बल्कि वहाँ का वो वातावरण उन्हें रास ही नहीं आ रहा था . उन्हें लगता कि सीता की ही तरह उन्हें भी वनवास मिला है .उसकी मियाद लंबी जरुर है ; मगर एक दिन जब उनके वे अपनी नौकरी से मुक्त हो जायेंगे तब वे अपने देश लौट जायेंगी . ' देश '!वे विदेश में नहीं रहती थीं .वे जहाँ रहती थीं ,वो  इसी भारत देश का हिस्सा था ;मगर उनके लिए परदेश था वो .दरअसल देश और परदेश की परिभाषा मन से जुड़ी होती है ,जिसे मन अपना मान ले वह अपना देश और जिसे मन अपना न माने वो विदेश .वे उस अंचल से कभी जुड़ ही नहीं पायी थीं . तभी तो गुड़िया (नाग पंचमी )पर उनका मन खूंटा तुड़ाकर भागी गाय सा वहीं अवध के इलाके में जा पहुँचता था .वे याद करतीं कि सब लडकियाँ अपने मायके आयी होंगी .अब वे सब गुडिया बना रही होंगी .अब  गाँव भर की लडकियाँ मिलकर गुड़िया डालने गयी होंगी .और गाँव के लडके गुड़िया पीटने .फिर रात को बगिया में सरावन (खेत समतल करने की मोटी  और लंबी लकड़ी ) का झूला पड़ेगा और सब लडकियाँ और औरतें झूलेंगी .सब मिलकर सावन गायेंगी .वे वहाँ नहीं जा पायीं ये सोचकर उदास होतीं .फिर झट से अपनी उदासी को पोंछकर वे मुझे बताने लगतीं कि उस दिन और कौन - कौन सी रस्में होती हैं .सबके साथ झूला झूलते सावन गाते हुये कितना मजा आता है और वे सावन गाने लगतीं –

“झूला पड़ा कदम की डारी झूलय ,जनक दुलारी नाय .”

कभी वे बिदेसिया गातीं ,तो कभी  'नकटा ' और सोहर .दरअसल अपने उस अंचल में अम्मा गउनइ गाने में प्रवीन मानी जाती थीं .उनका कंठ बहुत सुरीला था .इसीलिए किसी के घर छठी – बरही हो या फिर बियाह हो ,उन्हें गाने का बुलावा मिलता था ;मगर उस वनवासी इलाके में उन गीतों की कोई बसर ही नहीं थी .बोली – बानी ,तीज - त्यौहार सब कुछ एकदम अलग थे .जो त्यौहार उस अंचल में मनाये जाते थे .उन्हें मनाने का उनका मन ही नहीं करता था और जिसे वे मनाना चाहतीं उसे वहाँ कोई जानता ही नहीं था .सो वे गुडिया बनातीं ;मगर उन्हें कहाँ डालने जातीं और कौन उन्हें पीटने  जाता ?सो उनकी गुड़िया भी उन्हीं की तरह उदास पड़ी रह जातीं .वे होली पर बल्ले (गोबर के छोटे – छोटे उपले जिनके बीच में छेद होता था ) बनातीं कि होलिका दहन पर प्रहलाद की पूजा करेंगी ;मगर वहाँ तो न होलिका दहन होता था और न ही अबीर गुलाल खेला जाता था . फिर बप्पा का तबादला रायपुर हुआ .रायपुर तब भी छत्तीसगढ़ का बड़ा शहर था .यहाँ की संस्कृति बस्तर की वनवासी से अलग थी .यहाँ छत्तीसगढ़ की  मैदानी संस्कृति थी .यहाँ की बोली - बानी ,तीज – त्यौहार कुछ अलग तो थे ;मगर वैसी अजनबीयत नहीं थी उनमें ;फिर भी अम्मा का मन अपने अंचल ,अपने देश के इर्द गिर्द भटकता रहता .

जब तक मैं छोटी थी ,तब मैं उनके मन को समझ नहीं पाती थी . कभी कुतुहल से भर कर उन्हें देखती रहती ,तो कभी उनके साथ उदास हो जाती  ;मगर जैसे जैसे बड़ी हुई ,मैं समझने लगी थी उन्हें और उनके विस्थापन की उस पीड़ा को जो उनके  भीतर ही भीतर कसकती थी . वह पीड़ा जिसे कोई समझ नहीं रहा था .लोगों की नजरों में वे भरी पूरी थीं .कोई कमी नहीं थी उन्हें .लोग सोचते हैं कि औरत तो धान का थरहा है ,उसे किसी भी खेत में रोप दो,वह अपनी जड़ें जमा ही लेती है  ;मगर ऐसा हो कहाँ पाता है .अगर ऐसा होता तो अम्मा यूँ ...?मगर लोग कहाँ समझते हैं इसे .लोग तो लोग ,बप्पा भी नहीं समझ पाये थे . वे तो यही समझते रहे कि उन्हें कोई तकलीफ़ ही नहीं है .उनका सोचना भी गलत नहीं था .उन्होंने तो उन्हें वो सारी सुविधायें दे रखीं थीं ,जिसे पाकर स्त्रियाँ अपना भाग्य सराहती हैं .मगर सुविधायें सुख का पर्याय नहीं होतीं ;यह बात वे समझ ही नहीं पाये थे .समझते भी कैसे वे भी तो उसी पुरुष समाज का अंग थे .जो स्त्री के  सुख को गहने - कपड़े से तोलता है . इसीलिए वो इसके आगे सोचने की जरूरत ही नहीं समझता ,और स्त्री ?वह भी कहाँ कह पाती है कुछ .वो कहे भी तो किससे ?कौन सुनेगा उसे .वह समाज जो उसे इंसान तक नहीं मानता या उसका वो परिवार जिसे वो तो अपना सब कुछ मानती है ;मगर वो उसके लिए एक रखवार से अधिक कुछ नहीं होती है. ये बात वो जानती भी है समय समय पर जनवा दिया जाता है उसे ;मगर वह फिर भी उस घर की रखवारी करती रहती है .उससे जीवन भर जुड़ी रहती है .वह अपनी नियति जानती है शायद इसीलिए कुछ नहीं कहतीं बस मन ही मन घुटती रहती है . शायद ये घुटन ही है जब ये और -और बढ़ जाती है ,तब गीत बन कर उसके ओठों से फूट पड़ती है .तभी तो स्त्री के गीतों में दर्द ही दर्द लहराता है .फिर चाहे वो अवध में गाया जाने वाला बेटी की विदाई का गीत हो या फिर छत्तीसगढ़ अंचल का सुआ गीत ,दोनों ही स्त्री के दर्द को उकेरते हैं -

“पंइया मैं लागत हौं चंदा सुरुज के रे सुआ न 

तिरिया जनम झनि दे

तिरिया जनम मोर गउ के बरोबर रे सुआ न

जंह पठवे तंह जाय रे सुआ न .

भाई ल देहे  महल दुमहला

हम ला त देहे बिदेस रे सुआ न .

 मुझे आज भी याद है दीवाली के अवसर पर जब स्त्रियाँ ये सुआ गीत गाती  थीं ,तब उनके गीत सुनकर अम्मा की आँखे झर - झर झरती थीं .तब मैं उनके रोने का कारण समझ नहीं पाती  थी .तब मैं कुछ भी कहाँ समझ पाती थी .तभी तो उनकी हर बात मुझे बुरी लगती थी .मुझे लगता था कि अम्मा मेरी सबसे बड़ी दुश्मन हैं .बस वे ही मुझे रोकती –टोकती हैं .तब मुझे कहाँ मालूम था कि वे तो सिर्फ माध्यम थीं . आदेश तो पितृसत्ता का ही होता था .जिस दिन से मैंने पितृसत्ता की इस सच्चाई को जाना ,मैं अम्मा के करीब होती चली गयी थी .अब वे मुझे दुश्मन नहीं अपनी हितु लगने लगी थीं ,क्योंकि अब मैं तिरिया जनम झनि दे गीत के मर्म को समझने लगी थी .