थका देनेवाला चुनाव
May 16, 2019 • राकेश रमण

कहने को भले ही पिछली बार का लोकसभा चुनाव नौ चरणों में सम्पन्न हुआ था जबकि इस बार सात चरणों में ही चुनाव कराए जा रहे हैं। लेकिन वास्तव में देखा जाए तो वाकई इस बार चुनाव की लंबी प्रक्रिया ने पूरे देश, व्यवस्था और प्रशासन को बुरी तरह थका-उबा दिया है। इस तरह की लंबी चुनावी प्रक्रिया से फायदे कम और परेशानियां ही अधिक होती हैं। यही अब नियति बन गई है। जिनका चुनाव शुरू में ही हो जाता है, उनके लिए ज्यादा समस्या नहीं है, लेकिन जिन उम्मीदवारों को बाद वाले चुनाव में मतदान का सामना करना पड़ता है, उन्हें काफी कठिनाई होती है। एक तो उन्हें लंबे समय तक प्रचार करना पड़ता है। जिसके कारण उनका खर्च काफी बढ़ जाता है। इसके अलावा उन्हें चिलचिलाती गरमी का सामना भी करना पड़ता है। सुरक्षा बलों को भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने और आने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। सरकार का पैसा भी काफी खर्च होता है। इसलिए इस तरह की लंबी चुनावी प्रक्रिया से बचा जाना चाहिए। स्थिति यह है कि चुनाव आचार संहिता लागू हो जाने के बाद जहां एक ओर सरकारी स्तर पर नीतिगत फैसले लंबित हैं, वहीं आधिकारिक मशीनरी के चुनाव में व्यस्त होने से छोटे-मोटे काम और मंजूरियां भी ठप हैं। कारोबारी अब खुलकर इस पर विरोध जताने लगे हैं और सरकार से मांग की है कि आम चुनाव दो से तीन चरणों में एक महीने के भीतर खत्म होना चाहिए। जमीनी स्तप पर देखा जाए तो 10 मार्च को चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद से केंद्र, राज्य और नगर निगमों के स्तर पर सभी नीतिगत फैसले लंबित हो गए, जबकि 1 अप्रैल से नए वित्त वर्ष की शुरुआत के मद्देनजर अधिकांश कारोबारियों को कई औपचारिकताएं पूरी करनी थीं। खासकर जीएसटी से जुड़ी कई प्रक्रियाएं अधर में हैं और काउंसिल की आखिरी बैठक में हुए कई फैसले नोटिफाई नहीं हो पाए हैं। दिल्ली जीएसटी के एक अधिकारी ने बताया, ऑनलाइन बैकएंड काम बंद नहीं हुआ है, लेकिन स्टाफ चुनावी ड्यूटी पर होने से असेसमेंट, अपील और फील्ड सर्वे प्रभावित होते हैं। विभाग पर चुनावी खर्चों की मॉनिटरिंग और असेसमेंट की जिम्मेदारियां भी हैं। अप्रैल महीने के टैक्स डिपॉजिट और रिटर्न फाइलिंग में सुस्ती है। इंडस्ट्री, एनवायरमेंट और नगर निगमों में लाइसेंस और मंजूरियों को जारी और रिन्यू करने का काम ठप है। सबसे ज्यादा मुश्किलें सीलिंग और फायर एनओसी के जद में आईं यूनिटों को पेश आ रही है। एन्फोर्समेंट एजेंसियां उनके खिलाफ कार्रवाई में नहीं हिचक रहीं, जबकि संबंधित विभागों में कोई सुनवाई नहीं हो रही। नगर निगमों में औद्योगिक श्रेणियों के लिए प्रॉपर्टी टैक्स की दरें अचानक बढ़ गई हैं, जबकि निगम चाहकर भी इसे अभी नहीं रोक सकते। चुनाव कार्य के लिए वाहनों को जब्त किए जाने का असर जहां परिवहन सेवाओं पर पड़ेगी, वहीं बाहर से माल नहीं आने से कारोबार भी प्रभावित हो रहा है। वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि दिखाई पड़ रही है। स्थिति यह है रमजान के महीने में फलों के भाव आसमान छू रहे हैं। दिल्ली में केला 80 रूपए दर्जन तक की दर से बिक रहा है। वाहनों की कमी होने पर लोग रेल से यात्रा तय करते हैं। वहां के स्टेशनों तक आने-जाने के लिए वाहन की आवश्यकता पड़ेगी ही। ऐसे में आवागमन की परेशानी बढ़ गई है। 15 अप्रैल से शादी-विवाह का लग्न शुरू हो गया, जो जुलाई के दूसरे सप्ताह तक रहेगा। इस दौरान बारात ले जाने और तिलक चढ़ाने आने-जाने में भी लोगों को परेशानी हो रही है। दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन को इस अवधि में बाहर से आने वाले सुरक्षा बलों की तैनाती, उनके कैंप के स्थान आदि की व्यवस्था करनी होती है। इसके लिए ज्यादा सुविधाजनक स्कूल-कॉलेज ही होते हैं लिहाजा जिला प्रशासन ने इस कार्य के लिए इनके भवनों को अधिग्रहित कर लिया है। ऐसे में बच्चों का पठन-पाठन प्रभावित होना स्वाभाविक ही है। हालांकि चुनाव को लेकर यह कार्य करना भी प्रशासन की बाध्यता है। अधिकांश शिक्षकों की ड्यूटी चुनाव में लग गई है और शिक्षण संस्थान में मतदान केन्द्र बनाए गए हैं। चुनाव कार्य के लिए जिला प्रशासन बस, ट्रक, ट्रैक्टर, मैजिक, जीप आदि वाहनों को जब्त भी करता है। इसका भी असर आम लोगों पर ही पड़ता है। यहां से जब्त वाहन दूसरे जिलों में भी भेजे जा सकते हैं। इसके आलावा बीमारी-शादी आदि के लिए बैंक से आमजनों को ज्यादा रुपये निकालने पड़ते हैं। जबकि ऐसे लोगों पर निर्वाचन आयोग व आयकर की खास नजर रहती है। पुलिस की भी ड्यूटी चेकिंग में लगाई जाती है। सच पूछा जाए तो चुनाव की लंबी प्रक्रिया से बहुत सारी परेशानियां खड़ी हो जाती हैं। यह सब 1990 के दशक में मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन के समय शुरू हुआ था। चुनाव के दौरान हिंसा को रोकने के लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती करने वाले वह पहले मुख्य चुनाव आयुक्त थे। पहली बार आदर्श आचार संहिता को प्रभावी ढंग से लागू करने, चुनावों में बाहुबल और धन शक्ति पर लगाम लगाने, मामलों को दर्ज करने और मतदान नियमों का पालन नहीं करने के लिए उम्मीदवारों को गिरफ्तार करने और उम्मीदवारों के साथ नापाक गठबंधन करने के लिए अधिकारियों को निलंबित करने का श्रेय शेषण को ही जाता है। बाद में, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से चुनाव के दौरान सुरक्षा बलों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भी कहा। टीएन शेषण की दिखाई राह और रीति-नीति का अनुसरण चुनाव आयोग द्वारा लगातार जारी है। लेकिन इस कदर लंबी, उबाऊ और थकाऊ चुनाव प्रक्रिया के कारण आम जन जीवन किस कदर अस्त व्यस्त हो गया है इसकी मिसाल अलवर में हुए सामूहिक दुष्कर्म के मामले में देखी गई जहां पुलिस ने यह कह कर मामला दर्ज करने से इनकार कर दिया कि चुनाव की व्यस्तताओं के कारण वह इस तरह के मामले में उलझने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में सवाल है कि चुनाव को सहूलियत भरा बनाने का उपाय क्यों ना तलाशा जाए। अगर सुरक्षा को देखते हुए ऐसा किया जा रहा है तो पश्चिम बंगाल में इसकी धज्जियां उड़ती हुई दिख चुकी हैं। रहा सवाल व्यवस्था को संभालने का तो अगर 80 के दशक में जबकि ना तो इतनी तरक्की थी, ना संसाधन थे और ना ही इतनी तकनीकी सहूलियतें थी उसके बावजूद चार चरणों में आम चुनाव को निपटाया जा सकता था तो अब क्यों नहीं?