दर्द प्रेम पत्र का
August 4, 2019 • ललिता नारायणी
**दर्द प्रेम पत्र का **
 
कोई जगह नहीं थी जिस पर 
तुमने छाप न छोड़ी हो ,
नील बदन में आखिर हम भी
कितनी बार छुपाए जाते ।
 
तार -तार हम हुए कि तुमने
अपने निशा मिटाए हैं ,
जलती लौ में आखिर हम भी
कितनी बार जलाए जाते ।
 
चुल्लू भर पानी में तुमने 
कितनी बार डुबोया है 
ठहरे जल में आखिर हम भी
कितनी बार बहाए जाते  ।
 
नाम हमारा  **प्रेम पत्र था**
तुमने परिभाषित कर डाला
सच के संवादों में हम भी
कितना झूठ छुपाए जाते ।
 
     
*ललिता नारायणी*
प्रयागराज ( उत्तर प्रदेश )