परोपकाराय पुण्याय
March 14, 2019 • राकेश रमण
ऐसा कम ही देखा जाता है जिसके पास धन भी हो और बड़ा मन भी। धन और मन का संयोग बेहद दुर्लभ होता है। लेकिन जब मन बड़ा हो और धन भी असीमित हो तो वह आदमी किस तरह से समाज की दशा सुधारने और वंचितों को मुख्य धारा के साथ जोड़ने की मजबूत पहल करके इतिहास के पन्नों में अपना नाम सुनहरे हर्फों में लिखवा सकता है इसकी मिसाल हैं आईटी दिग्गज और विप्रो के अध्यक्ष अजीम प्रेमजी जिन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई और कड़ी मेहनत से बनाई गई विप्रो लिमिटेड कंपनी के 34 फीसदी शेयर परोपकार कार्य के लिए दान कर दिए हैं। इन शेयरों का बाजार मूल्य 52,750 करोड़ रुपये है। यह कोई पहली बार नहीं है जब प्रेमजी ने बड़ी राशि दान की हो बल्कि प्रेमजी की इस पहल से परोपकारी कार्य के लिए अब तक उनके द्वारा दान की गई कुल रकम 1,45,000 करोड़ रुपये (21 अरब डॉलर) हो गई है। जो कि विप्रो कंपनी के स्वामित्व का 67 फीसदी है। परोपकार के प्रति इनकी दीवनागी का आलम यह है कि 73 वर्षीय प्रेमजी ऐसे पहले भारतीय हैं जिन्होंने ‘द गिविंग प्लेज इनीशिएटिव’ पर हस्ताक्षर किए हैं। इस पहल की शुरुआत बिल गेट्स और वॉरेन बफेट ने की थी। इस पहल के तहत अपनी 50 फीसदी संपत्ति परोपकारी कार्य के लिए देने का वादा किया जाता है। प्रेमजी का नाम भारत के पांच सबसे अमीर लोगों में भी शामिल है। लिहाजा उनकी दान की रकम का बड़ा होना भी स्वाभाविक ही है। लेकिन जिस तरह से व्यापारिक कुशलता व मुनाफे को समाज की सेवा के साथ जोड़कर उन्होंने अपने धन को सही दिशा में खर्च करने की राह दिखाई है वह वाकई उनके नाम के मुताबिक ही अजीम है। वैसे भी कहा जाता है कि धन की वास्तव में तीन ही गति होती है यानि अंजाम होता है। या तो दान किया जाए, अथवा भोग किया जाये अन्यथा उसका अंतिम परिणाम नाश ही होता है। लेकिन प्रेमजी ने अपने द्वारा अर्जित धन को नाश की दिशा में जाने से रोकने के लिये जिस तरह से भोग और दान की राह पकड़ी है वह वाकई काबिले तारीफ है। धन संचय की भी अपनी एक सीमा है और उसके भोग का दायरा भी सीमित है। लिहाजा अगर धन को सही दिशा में खर्च ना किया जाए तो उसका नाश होना तय ही है। लेकिन प्रेमजी ने अपने धन को नाश से बचाने के लिये दान की जो राह चुनी उसी के तहत उन्होंने समाजसेवा के लिए ‘अजीज प्रेमजी फाउंडेशन’ बनाई है जो मुख्य रूप से शिक्षा के क्षेत्र में काम करती है। साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों को ये फाउंडेशन आर्थिक मदद भी देती है। फाउंडेशन का लक्ष्य पब्लिक स्कूलिंग को बेहतर करना है। ये फाउंडेशन कर्नाटक, उत्तराखंड, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पुडुचेरी, तेलंगाना, मध्यप्रदेश और उत्तर-पूर्वी राज्यों में सक्रिय है। बीते पांच साल में वंचित तबकों के लिए काम कर रहे करीब 150 एनजीओ को अजीम प्रेमजी फाउंडेशन से काफी फंड भी मिला है। अपनी इस प्रेरक सोच को लेकर प्रेमजी का कहना है कि, “मुझे दृढ़ विश्वास है कि हम में से, जिन्हें धन रखने का विशेषाधिकार है, उन्हें उन लाखों लोगों के लिए बेहतर दुनिया बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देना चाहिए जो बहुत कम विशेषाधिकार प्राप्त हैं।’’ अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि अजीम प्रेमजी ने अपनी निजी संपत्तियों का त्याग कर, उसे धर्मार्थ कार्य के लिए दान कर परोपकार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाई है जिससे अजीम प्रेमजी फाउंडेशन द्वारा परोपकार की भावना के तहत किये जाने वाले समाजसेवा के कार्यों में सहयोग मिलेगा। फाउंडेशन के बयान के मुताबिक प्रेमजी द्वारा विप्रो के 34 फीसदी शेयरों का दान किये जाने के बाद अब अजीम प्रेमजी फाउंडेशन दुनिया की सबसे बड़ी फाउंडेशन की सूची में शुमार हो गई है। दरअसल इस तरह की सोच सामान्य नहीं है और इसके लिये सिर्फ संस्कारों की ही नहीं बल्कि वंशानुगत आचार, व्यवहार व इमानदारी का भी अपना अलग महत्व होता है जो स्थूल रूप में भले ही दिखाई ना दे लेकिन सूक्ष्म रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी परिष्कृत होते हुए इंसान के मौजूदा जीवन की सोच को भी प्रभावित करती है। इसका ज्वलंत उदाहरण है प्रेमजी और उनके पूर्वज। प्रेमजी के पिता भी अपने समय के जाने माने व्यापारी थे। उन्हें बर्मा के चावल राजा के रूप में जाना जाता था। वे सब्जी, चावल और रिफाइंड खाद्य तेल के विश्व स्तरीय व्यापारी व उत्पादक थे। हाशिम प्रेमजी को देश के बंटवारे के बाद पाक के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान का वित्त मंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन उन्होंने भारत में रहना ही पसंद किया। उन्ही हाशिम प्रेमजी के बेटे अजीम प्रेमजी ने भी भारत के प्रति अपने पूर्वजों के प्यार और भारत के आम लोगों की सेवा करने का संस्कार आगे बढ़ाना और उस पर तन, मन, धन और मन, वचन व कर्म से अमल करना लगातार जारी रखा है। अपनी उपलब्धियों व स्वभाव के लिये दुनिया में अलग पहचान रखने वाले प्रेमजी अगर इतना बड़ा दान नहीं भी करते तब भी उनकी बेहद अमीर व प्रतिष्ठित व्यक्ति की पहचान पर कोई संकट नहीं हो सकता था। इनकी पहचान से जुड़ी उपलब्धियों का जिक्र करें तो वर्ष 2011 में वे भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से भी सम्मानित किये जा चुके हैं। प्रेमजी को फ्रांस का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘शेवेलियर डी ला लीजन डी ऑनर’ भी मिल चुका है। उन्हें ये सम्मान समाजसेवा करने, फ्रांस में आर्थिक दखल और आईटी उद्योग विकसित करने को लेकर दिया गया। प्रेमजी तीसरी भारतीय हस्ती हैं जिन्हें फ्रांस ने अपने सर्वोच्च नागरित सम्मान प्रदान किया है। उनसे पहले यह सम्मान पाने वाले भारतीयों में बंगाली अभिनेता सौमित्र चटर्जी और बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान का नाम शामिल है। वर्ष 2010 में, उन्हें एशिया-वीक द्वारा दुनिया के 20 सबसे शक्तिशाली लोगों में से एक चुना गया था और टाइम मैगजीन द्वारा भी उन्हें विश्व के 100 सबसे अधिक प्रभावशाली लोगों में सूचीबद्ध किया जा चुका है। यानि अपने जीवन में प्रेमजी ने केवल ध नही नहीं कमाया बल्कि मान-सम्मान व प्रतिष्ठा की पराकाष्ठा भी देखी है। इसके बावजूद उनका यह कहना बेहद महत्वपूर्ण है कि उन्हें धन की बहुतायत से कभी रोमांच महसूस नहीं हुआ। यह वाकई बड़ी बात है कि मूल रूप से गुजरात के माने जानेवाले निजारी इस्माइलिया शिया मुस्लिम परिवार में पैदा हुए प्रेमजी ने ना तो खुद पर अल्पसंख्यक समुदाय के साथ जुड़ी कट्टरता को हावी होने दिया और ना ही भारत की सर्वधर्म समभाव की भावना से कभी खुद को तिल भर भी डिगने दिया। वे वाकई नाम के ही नहीं बल्कि काम के भी अजीम हैं जिनकी दिखाई राह लगातार सबको प्रेरणा देती रहेगी।