पुस्तक
July 8, 2019 • डॉ रंजना सिन्हा सैराहा
                      पुस्तक
 
जीवन की पुस्तक खुली, बांचू मैं मुंहजोर।
सात बचन को याद कर, हंसती हूं पुरजोर।।
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खुलती पुस्तक बांच के,अंदर झांकू खोय ।,
विषय वासना चोलना, अच्छा लगा न मोय ।।
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पुस्तक संगत साधु की, ज्ञान पिपासा खोल।
गड़बड़ झाला दुनिया का, दो कौड़ी में तौल।।
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पुस्तक के चंद पेज मां, सार ज्ञान का होय ।
बार-बार उसको पढूं,शंका मन की धोय  ।।
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स्वर व्यंजन सब साध के, पुस्तक बनी अंजोर।
तुलसी कृत रामायण को, हिन्दू पढ़ते भोर ।।
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पुस्तक छोटी ही भली, शब्द शब्द हो सार ।
ज्ञान की जोति जल पड़े, मृगतृष्णा को मार।।
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साखी कबीर नाम की , अंदर झांके ज़ोय।
पानी से तो हिम भया, रहस्यवाद में खोय।।
 
*डॉ रंजना सिन्हा सैराहा*
 सेवानिवृत्त प्राचार्या, 
राज महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय बांदा उ प्र