फैसलों में देरी का दुष्परिणाम
September 7, 2019 • राकेश रमण
सही समय पर उचित फैसला लेने के बजाय किसी भी मसले को अधिकतम समय तक टालते जाने का परिणाम कितना भयावह हो सकता है इसकी ताजा मिसाल मध्य प्रदेश में दिख रही है जहां कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी अब हद तक बढ़ गयी है कि मामले को संभालने के लिये पार्टी की अंतरिम अध्यक्षा सोनिया गांधी को आगे आना पड़ा है। वास्तव में देखा जाये तो पिछले साल हुए प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा के पंद्रह साल से जारी शासन को उखाड़ फेंकने और सीटों की दौड़ में उसे पीछे छोड़ देने में कांग्रेस को जो कामयाबी मिली उसके पीछे निर्णायक भूमिका पार्टी के नेताओं की आपसी एकजुटता ने ही निभाई थी। खास तौर से कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच तालमेल व सामंजस्य बनाकर कांग्रेस ने जिस मजबूती से चुनाव लड़ा उसी का नतीजा रहा कि तमाम अनुमानों, अटकलों और आशंकाओं को धता बताते हुए पार्टी ने चुनाव में उम्मीद से अधिक सीटें जीतकर सूबे में अपनी सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की। इसके लिये पर्दे के पीछे जो समझौता हुआ था उसके तहत बेशक कमलनाथ को पहले पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष और बाद में मुख्यमंत्री भी बनाया गया हो लेकिन तय यह भी हुआ कि किसी भी मामले में वे अपनी मनमानी नहीं करेंगे और सिंधिया और दिग्विजय के साथ सामंजस्य बनाकर ही काम करेंगे। साथ ही कमलनाथ को मुख्यमंत्री बना दिये जाने के बाद सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष का स्वाभाविक दावेदार माना जा रहा था क्योंकि दिग्विजय को प्रदेश के संगठन या सरकार में कोई भूमिका देना पार्टी को भी स्वीकार्य नहीं था और उन्हें भी इसकी कोई हसरत नहीं थी। ऐसे में बेहतर होता कि कमलनाथ के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद प्रदेश संगठन की कमान सिंधिया को सौंप दी जाती। लेकिन उस दौरान विधानसभा चुनाव में जीत दिलाने वाले समीकरणों में लोकसभा चुनाव से पहले कोई भी छेड़छाड़ नहीं करना ही बेहतर समझा गया और प्रदेश अध्यक्ष के पद पर कमलनाथ को ही बरकरार रहने दिया गया। लेकिन लोकसभा चुनाव में एक ओर सिंधिया और कमलनाथ ने दिग्विजय के ना चाहते हुए भी उन्हें भोपाल की सीट से चुनाव लड़ने के लिये मजबूर कर दिया ताकि हार की सूरत में प्रदेश की राजनीति में उनका दबदबा कमजोर पड़ जाये और जीत की सूरत में वे राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हो जाएं। दूसरी ओर सिंधिया की ओर से मिल रही मजबूत चुनौती को देखते हुए ऐसी पैंतरेबाजी की गयी कि गुना की उनकी परंपरागत सीट पर उनके नाम का ऐलान करने में ही काफी देर कर दिया गया और उनको टिकट देने के साथ ही उनके कांधों पर उत्तर प्रदेश में पार्टी को जीत दिलाने की जिम्मेवारी लाद दी गई। इस दोहरे काम में वे इस कदर उलझे कि ना तो अपनी सीट बचा पाए और ना ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी को जीत दिला पाये। वह मामला निपटने के बाद तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने पद से इस्तीफा देकर एक अलग ही बखेड़ा खड़ा कर दिया जिसमें उलझकर पार्टी प्रदेश की राजनीति को दिशा देने की ओर ध्यान ही नहीं दे पायी। हालांकि राहुल का अनुसरण करते हुए सिंधिया ने भी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के पद से इस्तीफा दे दिया ताकि प्रदेश की राजनीति पर अपनी पकड़ मजबूत की जा सके। उन्हें उम्मीद थी कि ऐसा करने के बाद उन्हें प्रदेश में पार्टी की कमान सौंप दी जाएगी। लेकिन राहुल का प्रकरण लंबा खिंच गया जिसके निपटने के बाद ही किसी अन्य मामलों पर ध्यान केन्द्रित किया जा सकता था। लेकिन सिंधिया का सब्र छलकने लगा और उन्होंने पार्टी को अध्यक्ष का मसला शीघ्र सुलझा लेने की सार्वजनिक तौर पर सलाह दे दी। उनकी यह सलाह और उनके समर्थकों द्वारा उन्हें राहुल का उत्तराधिकारी घोषित किये जाने की मांग ने ऐसा जोड़ पकड़ा मामला सिंधिया के नियंत्रण से बाहर हो गया। तस्वीर ऐसी बनी कि वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर नजरें गड़ाये हुए हैं। ऐसे में उनकी खानदानी विश्वसनीयता सवालों के घेरे में इस कदर फंसी कि वे कहीं के नहीं रहे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और प्रदेश सरकार के खिलाफ रेत खनन के मसले को लेकर मोर्चा खोल दिया। उनके समर्थकों ने दिग्विजय के प्रदेश सरकार में वर्चस्व को लेकर अलग ही हाय तौबा मचानी शुरू कर दी। रही सही कसर कमलनाथ ने अपनी कुर्सी बचाने के लिये इन दोनों की आलाकमान से शिकायत करके पूरी कर दी। अब स्थिति यह है कि पार्टी पर दबाव बनाने के लिये सिंधिया समर्थक यह अफवाह उड़ा रहे हैं कि अगर उन्हें संगठन में सम्मान नहीं मिला तो वे पार्टी छोड़कर भाजपा में चले जाएंगे। दूसरी ओर दिग्विजय को किनारे करना भी पार्टी के लिये संभव नहीं है जो सपा, बसपा व निर्दलीयों के समर्थन से चल रही सरकार के तारणहार की भूमिका निभाते आ रहे हैं। अब आलम यह है कि ना तो कमलनाथ और दिग्विजय इस पक्ष में हैं कि सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाये और ना ही सिंधिया इससे कम पर मानने के लिये सहमत हैं। अब सिरदर्दी हो गयी है पार्टी आलाकमान के लिये जिसे डर सता रहा है कि अगर इस लड़ाई पर विराम नहीं लगा तो पार्टी में विधायकों की बगावत ना शुरू हो जाये। हालांकि इस सिरदर्दी से उबरने के प्रति गंभीरता दिखाते हुए सोनिया ने सबको अनुशासन के दायरे में रहने और सार्वजनिक तौर पर बयानबाजी करने के बजाय पार्टी के फोरम पर ही अपनी बात रखने का निर्देश दिया है। लेकिन ना तो सिंधिया के समर्थक इससे शांत होते दिख रहे हैं और ना ही दिग्विजय के समर्थक कमजोर पड़ना चाह रहे हैं। ऐसे में छीछालेदर हो रही है कमलनाथ सरकार की जिनकी कथनी और करनी को लेकर उनके ही विधायक और मंत्री सवाल उठाने लगे हैं। जाहिर तौर पर इस सिरदर्दी का कोई ठोस व सर्वमान्य हल पार्टी आलाकमान को यथाशीघ्र निकालना ही होगा। लेकिन यह नौबत ही नहीं आती अगर फैसले को टाला नहीं गया होगा। अगर सरकार बनने के फौरन बाद सिंधिया को अध्यक्ष बना दिया गया होता तो आज इस तरह से बागी तेवर दिखाने की उन्हें जरूरत ही नहीं पड़ती। लिहाजा पार्टी नेतृत्व को इस दिशा में गंभीरता से सोचना होगा कि फैसला लेने में देरी से बचा जाये क्योंकि यह अकेले मध्य प्रदेश का मामला नहीं है बल्कि फैसले में हो रही देरी के कारण सिरदर्दी का सामान राजस्थान से लेकर महाराष्ट्र तक में एकत्र हो रहा है।