बंदूक अपसंस्कृति से मुक्त होना ही होगा
March 19, 2019 • विष्णुगुप्त
                (विष्णुगुप्त)
घातक या साधारण कोई भी हथियार हिंसा के प्रतीक होते हैं, अति सर्वश्रेष्ठता की विकृत मानसिकता को जन्म देने वाले होते हैं, हिंसा की आग मे निर्दोष जिंदगियों को जला कर राख करने वाले होते हैं। यही कारण है कि अति गंभीर हथियार रखने वाले देश, समूह और व्यक्ति लुटेरी मानसिकताओं को अंजाम देकर निर्दोष और कमजोर पर तरह-तरह के अत्याचार, उत्पीडन करते हैं। हथियार को सिर्फ सुरक्षा का प्रतीक नही माना जाना चाहिए, हथियार को हिंसा और अपराध का प्रतीक माना जाना चाहिए। वैध और अवैध सभी प्रकार के हथियारों के प्रति अब नजरिया बदलनी चाहिए ताकि ब्रैडन टैरेन्ट जैसी हिंसक और बर्बर घटना से बचा जा सके।
          दुनिया ने अभी हाल ही में बंदूक अपसंस्कृति का हिंसक  दुष्परिणाम को देखा है, यूरोपीय देश न्यूजीलैंड में एक व्यक्ति ने मस्जिद में हमला कर 50 से अधिक लोगों को मौत का शिकार बना डाला। दुनिया के अधिकतर लोग यह मानते हैं कि वह व्यक्ति जिसने बंदूक से इतने लोगों को सरेआम मौत का शिकार बना डाला था, वह इस्लाम के अनुदार और हिंसक प्रवृतियों के खिलाफ गुस्से में था। इसके साथ ही साथ उस व्यक्ति को मानसिक तौर विछिप्त बताने की भी प्रकिया चल रही है। यह सही है कि मजहब आधारित सोच रखने वाले हर शख्त किसी न किसी रूप मानसिक विकृति के शिकार होते है, मानसिक विकृति के कारण ही हिंसा के सहचर बन जाते हैं और निर्दोष लोगों को खून बहाना उनकी मानसिकताएं मानवता को लहूलुहान करती हैं। दुनिया में जितने भी मजहबी समूह हैं, दुनिया में जितने भी मजहबी सोच से पीडित आतंकवादी संगठन है वे सभी मजहब आधारित विकृति से बाहर कुछ देख या सोच ही नहीं सकते हैं। अलकायदा, तालिबान, आईएस जैसे मजहबी संगठन भी इसी प्रकार की विकृति के शिकार हैं। सूचना क्रांति के विस्फोट भी ऐसी विक्षिप्त और विकृति की मानसिकताओं को तोड़ नहीं सका हैं। पर दुनिया असली समस्याओं और संकटों के प्रति सोच चाकचैबंद ढंग से रखती ही नहीं है। सही सोच यह है कि मजहबी तौर पर विक्षिप्त लोगों और संगठनों के पास आसानी से हिंसक हथियार कैसे पहुंच जाते हैं, मजहबी तौर पर विकृत लोगों को हथियार देने वाले लोग कौन हैं, किस मकसद से इन्हें हथियारयुक्त किया जाता है,? ब्रैन्टन टैरेन्ट का उदाहरण देख लीजिये। ब्रैन्टन टैरेन्ट के पास अगर आधुनिक हथियार उपलब्ध नहीं होते तो फिर वह इतनी आसानी से न तो न्यूजीलैंड की मस्जिद मे हमला कर सकता था और न ही 50 से अधिक लोगों को मौत का शिकार बना सकता था। ब्रैन्टन टैरेन्ट ने आसानी से अति हिंसक हथियार हासिल किये थे। अमेरिका और यूरोप में बन्दूक अपसंस्कुति लंबे समय से हिंसा बरपा रही है, शांति में अशांति फैला रही है। फिर अमेरिका और यूरोप बन्दूक की अपसंस्कृति में संशोधन या फिर बन्दूक अपसंस्कृति पर प्रहार करने के लिए आगे क्यो नहीं आ रहे हैं।
                   बन्दूक अपसंस्कृति पर पर्दा डालने की बडी कोशिश हुई है, सिर्फ यह कहा जा रहा है कि ब्रैन्टन टैरेन्ट इस्लाम और मुस्लिम आतंकवादी संगठनों से घृणा करता था, इसीलिए उसने ऐसे बर्बर और हिंसक करतूत के कदम उठा लिये। यह सच है कि अमेरिका और यूरोप आज किसी न किसी रूप से इस्लाम के आक्रामक प्रचार-प्रसार के कारण न केवल अंचभित है बल्कि मुस्लिम आतंकवादी संगठनों द्वारा फैलायी जा रही हिंसा और घृणा से विचलित और पीड़ित और आक्रोशित भी है। अमेरिका और यूरोप के वैसे युवा जो गैर मुस्लिम हैं अब किसी भी प्रकार से इस्लाम और मुस्लिम आतंकवादी संगठनों के प्रति सहानुभूति रखने के लिए तैयार नहीं है, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि मुस्लिम आबादी को बहुलतावाद का प्रतीक समझने के लिए तैयार हैं जबकि अमेरिका और यूरोप का समाज बहुलतावाद पर आधारित हैं जहां सभी धर्मो और मजहब को बराबरी अधिकार दिया जाता है, अपनी किस्मत बनाने के लिए समान अवसर दिया जाता है, मुस्लिम दुनिया की तरह यूरोप और अमेरिका का समाज एंकाकी समाज नहीं है जहां पर सिर्फ और सिर्फ मजहबी तानाशाही पसरी होती है, मजहबी धृणा पसरी होती है और अन्य धर्मो को हिंसा, आतंकवाद, घृणा का शिकार बना कर इस्लाम स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जाता है। इधर अमेरिका और यूरोप में अलकायदा, आईएस जैसे मुस्लिम आतंकवादी संगठनों ने एक पर एक आतंकवादी घटनाएं कर अमेरिका और यूरोप के युवा वर्ग मे आक्रोश पैदा किये हैं, जिसकी परिणति न्यूजीलैंड मे ब्रैरेन्ट टैरेन्ट जैसे युवा की आक्रोशित हिंसा है।
         फिर भी अमेरिका और यूरोप अपनी बन्दूक संस्कृति की असफलता और हिंसा से पीछा नहीं छुटा सकते हैं, इसके अपराध से मुक्त नहीं हो सकते हैं। प्रश्न यह है कि अगर अमेरिका और यूरोप शांति और सदभाव शील समाज व्यवस्था में सक्रिय रहते हैं तो उन्हें फिर बन्दूक यानि अति हिंसक हथियारों से इतनी उग्र और प्रहारक प्रेम क्यों हैं? शांति और सदभाव की कसौटी पर हिंसा की कोई जगह नहीं होती है, बन्दूक सहित अन्य प्रकार के सभी हथियार हिंसा के प्रतीक होते हैं, अति सर्वश्रेेष्ठता की विकृत मानसिकता उत्पन्न करते हैं। अमेरिका और यूरोप की स्थिति यह है कि वहां पर साधारण ही नहीं बल्कि असाधारण और अति हिंसक हथियार आसानी से उपलब्ध होते हैं, कहा तो यहां तक जाता है कि अमेरिका और यूरोप के सभी नागरिको के पास हथियार हैं। यानि की इस निष्कर्ष को स्वीकार किया जा सकता है कि अमेरिका और यूरोप का समाज अति हथियारयुक्त हैं और अपने आप को शांति का प्रतीक बताने वाले यूरोपीय और अमेरिकी नागरिक हिंसक हथियार रखने में ही गर्व महसूस करते हैं। खासकर अमेरिका मे बन्दूक अपसंस्कृति और बन्दूक हिंसा हर समय अस्तित्व में होता है, सिर्फ युवाओं तक यह बन्दूक हिंसा सवार नहीं होती है बल्कि बन्दूक हिंसा बुजुर्ग और बच्चों पर सवार होकर हिसक बोलती है। अमेरिका के अंदर में बच्चों द्वारा हिंसा बरपाने की कोई एक या दो घटनाएं नहीं हुई है बल्कि अनेकों ऐसी हिंसा हुई है जिसमे बच्चों ने अपने घर से घातक हथियार लाकर अपने स्कूली साथियों और स्कूली टिचरों को मौत का घाट उतार डाले हैं। युवाओं द्वारा किसी न किसी वाद या फिर किसी न किस समस्या से आक्रोशित होकर सार्वजनिक जगहों पर गोलीबारी करना, निर्दोष लोगों को मौत का शिकार बना देने की घटनाएं आम हैं। अमेरिका में फेसबुक और टिवटर के जैसे चर्चित संस्थान भी बन्दूक हिंसा के शिकार हो चुके हैं, जहां पर आक्रोशित युवाओं ने गोलीबारी की घटना को अंजाम देकर हत्याएं की थी। अमेरिका और यूरोप में इस बात पर कम ही विचार होता है कि किसे हथियार की जरूर है और किसे हथियार की जरूरत नहीं है। अगर इस जरूरत का समझा जाता और यह तय किया जाता कि जिसे जान का खतरा है, जिसे अपने परिवार का खतरा है, जिसे अपनी संपत्ति का खतरा है उसे ही हथियार उपलब्ध कराया जाना चाहिए, हथियार मांगने वाला व्यक्ति कहीं विक्षिप्त या फिर विकृत मानसिकता का तो नहीं है, हथियार मांगने वाले का संबंध किसी न किसी प्रकार से आंतकवादी संगठन से तो नहीं है, हथियार मांगने वाले का संबंध किसी न किसी प्रकार से घृणा फैलाने वालों से तो नहीं है, हथियार मांगने वाले व्यक्ति का संबंध तो ऐसे मजहबी समूह से तो नही हैं जो विखंडनकारी, घृणाकारी और भेदभाव से उत्पन्न मानसिकता का पोषक है। अगर इन प्रकार की जांच होगी तो फिर ऐसे प्रकार के लोगों के पास सरकार प्रेषित हथियार उपलब्ध नहीं हो सकते हैं, ऐसी हिंसा और ऐसी घृणा से बचा जा सकता है। 
              ब्रेेन्टन टैरेन्ट के उदाहरण को अति गंभीरता के साथ लिया जाना चाहिए। न्यूजीलैंड के राष्टपति ने इस घटना को बडी गंभीरता प्रदान की है, उन्होंने न केवल अपनी विफलता मानी है, बल्कि कहा भी है कि उनके लिए बन्दूक की अपसंस्कृति आत्मघाती साबित हो रही है। न्यूजीलैंड के राष्टपति ने अब बन्दूक संस्कृति से पीछा छुडाने की बात भी कही है। न केवल न्यूजीलैंड को बल्कि अमेरिका और पूरे यूरोप को अब अपनी बन्दूक की अपसंस्कृति से मुक्त होना ही होगा, हथियार देने वाले कानूनों में संशोधन करना ही होगा, अगर ऐसा नहीं हुआ तो ब्रेन्टन टैरेन्ट जैसी अनेकानेक घटनाएं अमेरिका और यूरोप को आक्रांत एवं पीडित करती रहेगी।