बदलते परिदृष्य में श्रमिक आंदोलनों का भविष्य
April 30, 2019 • डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

                                         मई दिवस विशेष
वैसे देखा जाए तो श्रमिक संगठन और श्रमिक आंदोलनों का दौर समूची दुनिया में कहीं नेपथ्य में चला गया है। इसका एक प्रमुख कारण दुनिया में आर्थिक उदारीकरण का दौर और सोवियत रुस में साम्यवाद का पराभव माना जा सकता है। हमारे देष में 90 के दषक के उदारीकरण के दौर के बाद से श्रमिक आंदोलनों का दौर करीब करीब लुप्त ही हो गया। कहने को आज भी श्रमिक संगठन है और इसमें भी कोई दो राय नहीं कि श्रमिक संगठनों की आज भी प्रासंगिकता है। दरअसल समय के बदलाव को नहीं समझने के कारण ही श्रमिक आंदोलनों पर प्रष्न चिन्ह उभरा और श्रमिकों का इन आंदोलनों से मोह भंग हुआ। दरअसल श्रमिक आंदोलन के नाम पर अपने वर्चस्व को कायम करने की होड या फिर अहम के कारण श्रमिकों और श्रमिक आंदोलनों को नुकसान हुआ। एक समय था जब कल कारखानों के बाहर श्रमिकों के टेंट आम होता था और नारों की गूंज आम होती थी। पर आज ऐसा कम ही दिखाई देता है। आज यह भी समझ आ गई है कि अधिक लंबा व हठधर्मिता का आंदोलन नहीं चल सकता। यही कारण है कि बैंकों का एकीकरण जैसी बड़ी घटनाएं भी आम होती जा रही है। इतना सब कुछ होने के बाद भी यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि देष में अमीर गरीब की खाई बढ़ गई है और गैरसंगठित श्रमिक की हालत बदतर होती जा रही है। संगठित वर्ग चाहे वह सरकारी कर्मचारियांे का हो या गैरसरकारी संस्थानोें का वे अपने संगठन के बल पर सुविधायुक्त होते जा रहे हैं। समस्याएं तो अधिक गैर संगठित वर्ग के सामने हैं।

यों तो श्रम दिवस के नाम पर एक दिन का सवेतनिक अवकाश और कहने को कार्यशालाएं, गोष्ठियों व अन्य आयोजनों की ओपचारिकताएं पूरी कर ली जाती है पर आज असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की समस्याओं को लेकर वह गंभीरता नहीं दिखाई दे रही जो होनी चाहिए। हांलाकि सरकार असंगठित वर्ग के लिए भी सामाजिक सुरक्षा व अन्य योजनाएं लेकर आ रही है पर उनका प्रभाव अधिक नहीं दिखाई दे रहा है। मजे की बात यह है कि पिछले दिनों की विधानसभा चुनावों और अब चल रहे लोकसभा चुनावों में राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों के केन्द्र में भी किसान और बेरोजगार युवा तो दिखाई दे रहे हैं पर असंगठित वर्ग के लिए कोई ठोस रोडमेप दिखाई नहीं दे रही। सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती मंहगाई से सबसे अधिक प्रभावित असंगठित क्षेत्र के कामगार ही होते हैं। जहां तक कर्मचारियों का प्रश्न है उनको मंहगाई भत्ते के माध्यम से थोड़ी बहुत भरपाई हो जाती है वहीं संगठित क्षेत्र के श्रमिकों को भी कुछ राहत मिल ही जाती है। ले देकर असंगठित क्षेत्र के कामगारों के सामने दो जून की रोटी जुटाना मुश्किल भरा काम होता जा रहा है। असंगठित क्षेत्र में भी खास तौर से दुकानों पर, ठेलों पर, चाय की स्टाॅलों, होटलों-ढ़ाबों पर काम करने वाले आदमियों की मुश्किलें अधिक है। इसके अलावा रिक्सा-टेक्सी चलाने वाले, माल ढोने वाले, कारिगर, पलम्बर, सेनेटरी का काम करने वाले, बिजली सुधारने वाले, परिवार पालने के लिए रेहडी, थडी या साइकिल आदि से सामान बेचने वाले और ना जाने कितनी ही तरह के काम करने वाले असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों की समस्याआंे का अंत नहीं हैं। रोजमर्रा के काम करने वाले लोगों की समस्याएं अधिक है। कल कारखानों में भी ठेके पर श्रमिक रखने की परंपरा बनती जा रही है और तो और अब तो सरकार भी अनुबंध पर रखकर एक नया वर्ग तैयार कर रही है। गांवों में खेती में आधुनिक साधनों के उपयोग व परंपरागत व्यवसाय में समयानुकूल बदलाव नहीं होने से भी गांवों से पलायन होता जा रहा है।
इन्स्टीट्यूट आॅफ ह्यूमन डवलपमेंट नई दिल्ली के अनुसार एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में केवल 7 प्रतिशत श्रमिक ही संगठित क्षेत्र में है। 93 फीसदी कामगार असंगठित क्षेत्र में है। जानकारोें के अनुसार असंगठित क्षेत्र के कामगारों में भी 60 प्रतिशत कामगारों की स्थिति बेहद चितंाजनक मानी जाती है। करीब 50 फीसदी श्रमिक केजुअल वेज पर काम कर रहे हंै वहीं केवल 16 प्रतिशत मजदूरों ही नियमित रोजगार से जुड़े हुए हैं। खेती में आधुनिकीकरण के चलते मानव श्रम की कम आवश्यकता के कारण यही कोई 36 फीसदी लोगों ने खेती पर निर्भरता छोड़ अन्य कार्यों को अपनाया है। गृह उद्योगों का जिस तरह से विस्तार होना चाहिए था वह अपेक्षाकृत नहीं हो पा रहा है। इसके चलते सामाजिक विसमता बढ़ती जा रही है। हांलाकि महात्मा गांधी रोजगार गाॅरन्टी योजना मनरेगा में निश्चित रोजगार की बात की जा रही है पर इसमंे भी रोजगार के क्षेत्र में विसमता पनपी हैै।
एक समय था जब मजदूर आंदोलन पीक पर था पर उदारीकरण के दौर व साम्यवाद के पतन के बाद से स्थिति मंे बदलाव आया हैं हांलाकि साम्यवादी या यों कहें कि वामपंथी आज भी वामपंथ का पराभव या यांे कहें कि असर कमतर मानने को तैयार नहीं है पर सचाई सामने है। आज वामपंथ और श्रमिक आंदोलन कुंद हो गए हैं। दरअसल एक समय जब श्रमिक आंदोलन या वामपंथ प्रभावी था उस जमाने में श्रमिक आंदोलनों का भटकाव और श्रमिक आंदोलन कल कारखानों और श्रमिकों से रोजगार छिनने का कारण बनने लगा तो धीरे धीरे श्रमिक आंदोलनों से श्रमिकों का मोहभंग होने लगा। जो आंदेालन श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए होता वह आंदोलन हठधर्मिता या यों कहे कि झुकने को तैयार नहीं होने के कारण औद्योगिक प्रतिष्ठानों में स्थाई तालाबंदी और उससे जुड़े श्रमिकों के रोजगार को खत्म करने वाला बनने लगा तो यह घोर निराषा का कारण बन गया। वास्तविकता तो यह है कि मजदूर आंदोलन आज लगभग दम तोड़ता जा रहा है। इसके कई कारण रहे हैं। श्रमिकों नेताओं ने समय रहते सोच में बदलाव लाने पर जोर नहीं दिया और इसका प्रभाव मजदूर आंदोलनों को पीछे धकेलने के रुप में सामने आया। एक सोच यह भी विकसित हुआ कि मजदूर आंदोलन तेजी से होने वाले औद्योगिक विकास में रुकावट ड़ाल रहा है और उसके परिणाम स्वरुप श्रमिक आंदेालन की धार धीरे धीरे कुंद पड़ने लगी।
देश के आर्थिक विकास में असंगठित श्रमिकों की भागीदारी को नकारा नहीं जा सकता। सरकार द्वारा समय समय पर इनके लिए सामाजिक सुरक्षा उपायों की घोषणा भी की जाती रही है। पर इसका पूरा लाभ असंगठित श्रमिकों को प्राप्त नहीं हो पाता है। असंगठित श्रमिकों के कौशल को विकसित करने के लिए नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था, कच्चे माल की उपलब्धता, बीमा-स्वास्थ्य जैसी सुरक्षा और विपणन सहयोग के माध्यम से असंगठित क्षेत्र के बहुत बड़े वर्ग को लाभान्वित किया जा सकता है। हालांकि सरकार द्वारा अफोर्डैबल आवास योजना व अन्य योजनाएं संचालित की जा रही है। यदि थोड़े से प्रयासों को गति दी जाती है तो असंगठित क्षेत्र के कामगारों के हितों की भी रक्षा हो सकती है और उन्हें सामाजिक सुरक्षा कवच देकर अच्छा जीवन यापन की सुविधा दी जा सकती है। इससे देश में लघु उद्योग, सेवा क्षेत्र, हस्तशिल्प, परपंरागत रोजगार, दस्तकारी आदि को बढ़ावा मिल सकता है समाज में संगठित और असंगठित क्षेत्र के बीच बढ़ रही खाई को पाटने में सहायता मिल सकती है। सरकार और गैरसरकारी संगठनों को इस दिषा में ठोस रोडमेप बनाना होगा ताकि एक बड़ा और जरुरतमंद वर्ग विकास की मुख्य धारा से जुड़ सके।