बुनियादी शिक्षा की जमीनी सच्चाई  
August 31, 2019 • बाल मुकुन्द ओझा

(बाल मुकुन्द ओझा)

भारत में प्रारंभिक शिक्षा पर हर साल करोड़ों अरबों रुपए की अथाह धनराशि खर्च करने के बावजूद बच्चों में पढ़ने-लिखने के कौशल क्यों नहीं आ पा रहे हैं, इस पर गंभीरता से मंथन करने की जरुरत है। देश में बुनियादी शिक्षा को लेकर एक बार फिर बहस शुरू हो गई है। अनेक संस्थाओं ने अपनी रिपोर्टों में देश में बुनियादी शिक्षा को लेकर सवाल उठाये हैं और बताया है कि आजादी के 73 वर्षों के बाद भारी शैक्षिक विस्तार के बावजूद गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने के कार्य में हम बहुत पिछड़े हुए हैं। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां हमारी आधी से अधिक आबादी गरीबी में जीवन बसर कर रही है। रिपोर्टों में खुलासा किया गया है कि प्रारम्भिक शिक्षा का देहाती क्षेत्रों में हाल बहुत बुरा है जहां आठवीं का छात्र गुणा भाग सही तरीके से नहीं कर सकता और पांचवीं का छात्र पुस्तक नहीं पढ़ सकता।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सरकारी स्कूलों की बदहाली में सरकार के नियम और कानून कायदे भी रुकावट बने हुए है। एक तो संसाधनों की कमी से यूँ ही जूझ रहे है सरकारी विधालय। ऊपर से उपलब्ध सुविधाओं का भी हम पूरा उपयोग कर पाने में नकारा साबित हो रहे है। देशभर में लाखों ऐसे स्कूल है जिनके कमरों में कबाड़ भरा पड़ा है और प्रशासन की शिथिलता के कारण इनका निस्तारण न होने का खामियाजा बच्चों को उठाना पड़ा रहा है। कमरों की कमी के चलते बच्चे खुले आसमान के नीचे पढ़ने को मजबूर है।
स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर किए जा रहे तमाम प्रयासों के बावजूद पिछले चार साल में इनमें मामूली सुधार ही नजर आ रहा है। आज भी पांचवी कक्षा के करीब आधे बच्चे दूसरी कक्षा का पाठ नहीं पढ़ सकते। वहीं आठवीं कक्षा के 56 फीसदी बच्चे गणित के दो अंकों के बीच भाग नहीं दे सकते। देश के सबसे बड़े गैर सरकारी संगठन प्रथम के वार्षिक सर्वेक्षण एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट 2018 के अध्ययन से यह जानकारी मिली है। यह रिपोर्ट देश के 596 जिलों के 17,730 गांव के पांच लाख 46 हजार 527 छात्रों के बीच किए गए सर्वेक्षण पर आधारित है। 
भारत की प्रारम्भिक शिक्षा की कमजोरियों के कारण ही हम शिक्षा की दौड़ में पिछड़े हैं और गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्राप्त करने के अभाव के कारण शिक्षा की बदहाली का रोना रो रहे हैं। बताया जाता है कि सरकारी और गैर सरकारी प्रयासों एवं शिक्षा के अधिकार कानून के अमल में लाने के बाद स्कूलों में बच्चों के दाखिले की स्थिति में आशातीत सुधार परिलक्षित हुआ है। मगर गुणवत्तायुक्त शिक्षा में हम पिछड़ गये हैं। सरकारी स्कूलों के मामलों में निजी स्कूलों की स्थिति फिर भी अच्छी बताई जा रही है। सक्षम लोग आज सरकारी विद्यालयों की अपेक्षा निजी विद्यालयों में अपने बच्चों को पठन-पाठन में अधिक रूचि लेते हैं। क्योंकि उन्हें मालूम है कि सरकारी स्कूल पुरानी परिपाटी का अनुसरण कर रहे हैं। अध्यापकों की पठन-पाठन के काम में उदासीनता और लापरवाही ज्यादा है। ग्रामीण विद्यालयों की हालत अधिक बुरी है। 
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से हमारा तात्पर्य ऐसी शिक्षा से है जो हर बच्चे के काम आये। इसके साथ ही हर बच्चे की क्षमताओं के संपूर्ण विकास में समान रूप से उपयोगी हो। कक्षा में बच्चों को चर्चाओं के माध्यम से अपनी बात कहने और ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया में भागीदारी का मौका मिले। साथ ही कोई भी बच्चा सीखने के पर्याप्त अवसर से वंचित न रहे। कक्षा में मैत्री पूर्ण माहौल बनाया जाये जिसमें छात्र बिना झिझक के अपनी बात कह सके और शिक्षक की कही बात समझ सके। सच तो यह है बालकों को पढ़ना, लिखना और समझना जैसे कौशल नहीं मिल पाए हैं। हर साल सरकार शिक्षा बजट में बढ़ोतरी करती है। मगर  प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षा की स्थिति सुधरने की बजाय बिगड़ती जा रही है। इस कमी को सुधारे बगैर बुनियादी शिक्षा के लक्ष्य को हासिल करना संभव नहीं दिखता। 
शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के 9 वर्ष बाद के लेखे जोखे पर नजर डालें तो जमीनी सच्चाई सामने जायेगी। घरों पर सफाई, पंक्चर की दुकानों, सब्जियों के ठेलों    होटल ढाबों, साडी-कालीन बिनाई, ईट भट्ठों और निर्माण कार्यों में काम करते बच्चे सरेआम मिल जायेंगे हैं। इन बच्चों के मां बाप का कहना है  पहले पेट भरेंगे फिर स्कूल भेजेंगे। ये है हमारी वास्तविकता जिस पर मंथन की जरुरत है।