बूढ़े दरख्त की व्यथा
February 6, 2019 • रेनू सिंघल
क्यूँ खामोश है वो जर्जर होता बूढ़ा दरख्त 
सूनी सी पथराई आंखों से देख रहा है सब मंजर ।
झर झर बहते अविरल अश्रु नित
कौन सुने अब उसकी बानी …।
नहीं किसी को अब जरूरत उसकी 
वो तो है बस ठूँठ अकेला सा 
खड़ा गांव के है जो बीच अकेला ।
 
बरसों पहले जब वो  हरा भरा था
 रौनक गाँव की हुआ करता था ।
देखे उसने कई रंग निराले 
गोद मे इसके गूंजी न जाने , कितनी किलकारियां…?
कितने जश्न त्यौहार मनाये छांव में इसकी ...।
 
राधा की बिटिया थी दुलारी जो
जिसका लग्न भी इसी की छांव मे हुआ था
किसन चाचा भी सरपंच बने जब 
इसकी छांव मे ही चौपाल जमाते थे ।
 
तपती जेठ की भरी दुपहरी सब मिल
इसकी छांव तले ही दिन बिताते 
अपनी अपनी व्यथा सुनाते 
सबकी सुनते सुलह कराते ।
 
कितने सावन इसकी डालों पर 
झूलें सखियां मन हर्षित होकर ।
झूम के जब बरसता सावन 
पूरा गांव मेघ मलहार गाता ।
 
ठौर ठिकाना जब न किसी को मिलता
तो इसकी ही गोद मे आकर सोता ।
कितने बचपन इसने दुलराये 
प्यार के कितने दीप जलाये ।
 
जिन शाखों को इसने प्यार से सींचा
उन्हीं शाखों ने जर्जर होती देह को छोड़ा 
कांप रहा था बूढ़ा दरख्त वो ...
पर देह को इसकी छलनी किया उन्हीं शाखों ने 
जिन को इसने जीवन दिया था ।
 
वक्त मगर कहाँ रुकता है ...
इक दिन तो सबको जाना है …!!
पर बूढ़ी आंखों की उम्मीदें आबाद रहें सब फुले फलें ।
इक दिन बोझ समझ कर उसको 
 अलग हो गईं सब शाखाएँ एक एक कर
खड़ा रह गया भीड़ मे अकेला ,जर्जर होता दरख्त बेचारा ।
 
मौन हुए आज शब्द भी उसके सारे 
रोता नही अब वो पर ...
 ह्रदय की पीड़ा कैसे कहे वो …
नही किसी से चाहिये उसे कुछ 
सब के लिये दुआ करे वो 
आबाद रहें सब यही कामना 
इस बूढ़े दरख्त को भी याद रखना ।