बड़े बदलाव की जरूरत
May 13, 2019 • राकेश रमण
भाजपा में बाहर से जितनी सांगठनिक शांति और नेतृत्व की स्थिरता नजर आ रही है वह वास्तव में पूरी तरस्वीर का सिर्फ एक रूख है जो सार्वजनिक तौर पर दिखाया जा रहा है। तस्वीर का दूसरा पहलू ऐसा भी है जिसे छिपाने का भरसक प्रयास हो रहा है और इस पर पर्दा डाले रखने में पूरा भगवा खेमा फिलहाल काफी हद तक सफल भी दिखाई दे रहा है। लेकिन सच पूछा जाए तो तस्वीर का वह दूसरा पहलू बेहद ही रोचक भी है और गंभीर भी जिसके तहत पार्टी में जल्दी क बड़े बदलावों की जमीन तैयार हो रही है। पार्टी के भीतर दिखाने और छिपाने की बातों का अंतर इसी बात से समझा जा सकता है कि दिखाने को तो संगठन को पूरी तरह एकजुट, सशक्त व अनुशासित बताया जा रहा है लेकिन अंदरूनी तौर पर एक बड़ा वर्ग इस बात से काफी नाराज है कि मौजूदा नेतृत्व के सुर में सुर नहीं मिलाने वाले को इस कदर हाशिये पर धकेल दिया जाता है जहां उसके विरोध का कोई मायने मतलब ही नहीं रह जाता है। यानि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जिस कदर बाधित व हतोत्साहित किया गया उसीका नतीजा है कि इस बार का चुनाव पूरी तरह ऐसे लोगों के कांधों पर ही आ गया है जिन्हें वास्तव में संगठन व सरकार में सीधा व बड़ा लाभ मिला है वर्ना पार्टी के कई बड़े नेता इस पूरे चुनाव प्रचार अभियान में सिर्फ हाजिरी बनाने के लिये ही कभी कभार सक्रिय दिखाई पड़े हैं। निश्चित ही बेचैनी सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर ही नहीं है बल्कि संगठन के संचालन के तौर तरीकों को लेकर भी है। जिस तरह से पार्टी के राष्ट्रीय संगठन का स्वरूप आंचलिक व क्षेत्रीय नजरिये से असंतुलित दिखाई पड़ रहा है उसके कारण भी पार्टी के काफी बड़े वर्ग में असंतोष और नाराजगी की बात कही जा रही है। आलम यह है कि अव्वल तो संगठन व सरकार का शीर्षतम पद एक ही सूबे यानि गुजरात से आने वाले मोदी व शाह के हवाले कर दिया गया है और दूसरे अन्य व खास तौर से दक्षिणी व पूर्वी राज्यों को संगठन व सरकार में दिखावे भर के लिये ही स्थान दिया गया है। इसमें भी अव्वल तो जमीनी कार्यकर्ताओं की पूरी तरह उपेक्षा की गई है और जिन्हें संगठन या सरकार में स्थान दिया भी गया है उनकी भूमिका इतनी सीमित कर दी गई है वे अलग ही अंदरखाने कसमसा रहे हैं। इसके अलावा दिखावे के लिये जिन चेहरों को आगे किया गया है उनमें से ज्यादातर आयातित और व्यक्तिवादी ही हैं ना कि विचारधारावादी या सिद्धांतवादी। व्यक्तिवाद को प्रोत्साहन देने के क्रम में जिस तरह से विचारों और सिद्धांतों को किनारे कर दिया गया है उससे भी पार्टी के काफी बड़े वर्ग में असंतोष है और जिस तरह से मोदी के आगे पूरी पार्टी को नतमस्त, शरणागत व पिछलग्गू बना दिया गया है उससे भी वे लोग असंतुष्ट हैं जिनका मानना है कि व्यक्ति तो आते-जाते रहते हैं लेकिन विचार और सिद्धांत ही किसी संगठन को सदा-सर्वदा आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इसी प्रकार सत्ता की मलाई के वितरण में वरिष्ठता और योग्यता की उपेक्षा करके मनमाने तरीके से 'अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनों को दे' की तर्ज पर व्यक्तिवादी तौर पर विश्वासपात्रों पर ही मेहरबानी दिखाये जाने की नय परंपरा भी असंतोष की वजह के तौर पर उभरी है। इसी प्रकार सत्ता के लिये सिद्धांतों से समझौता करना और बाद में फजीहत होने के बाद अपने ही फैसलों को पलट देना भी नेतृत्व की विश्वसनीयता के लिये नुकसानदायक रहा है। मिसाल के तौर पर जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन करके सरकार बनाना और बाद में इस प्रयोग के असफल रहने पर खुद स्वीकार करना कि वह पार्टी का गलत फैसला था और वास्तव में वह महामिलावट की सरकार ही थी। इसी प्रकार महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सिर्फ सीट पर समझौता नहीं हो पाने के कारण राजग के सबसे पुराने सहयोगी शिवसेना से अलग होकर चुनाव लड़ना और बाद में ना सिर्फ उसके समर्थन से ही सूबे में सरकार बनाना बल्कि लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ने के लिये मनाने के क्रम में उसके सभी शर्तों को सिर झुकाकर स्वीकार कर लेना भी ऐसा ही मसला है जिससे पार्टी के काफी बड़े वर्ग को यह सोचने पर मजबूर किया है कि निर्णायक नेतृत्व का आखिर मतलब क्या है? ऐसे तमाम मसले हैं जिसको लेकर पूरा भगवा खेमा ना तो एकमत है और ना ही इसे स्वाभाविक तौर पर स्वीकार कर पा रहा है। इसके अलावा व्यक्तिवाद की मजबूती के लिये सैद्धांतिक व वैचारिक विरोधियों को ठिकाने लगाने की नीति भी भगवा खेमे के उस वर्ग को कतई रास नहीं आ रही है जो व्यक्ति के कारण नहीं बल्कि बल्कि विचारों व सिद्धांतों के कारण संगठन से जुड़ा हुआ है। ऐसे में महत्वपूर्ण हो जाती है भाजपा की मातृ संस्था यानि आरएसएस और पार्टी के सहोदर यानि आरएसएस के अन्य अनुसांगिक संगठनों की राय। इस लिहाज से देखें तो पूरे संघ परिवार में भाजपा की मौजूदा रीति-नीति को लेकर अंदरूनी स्तर पर व्यापक समीक्षा का दौर लगातार जारी है। मंथन इस बात पर चल रहा है कि सत्ता ही सर्वोपरि है या सिद्धांत व विचार। बेशक बहुतायत लोगों का मत सत्ता और विचारधारा के बीच संतुलन कायम करके आगे बढ़ने के पक्ष में ही सामने आ रहा है लिहाजा सरकार पर किसी तरह का अंकुश या प्रतिबंध लगाए जाने का तो कोई संकेत नहीं मिल रहा है लेकिन संगठन को व्यक्तिवादी राजनीति से बाहर निकाल विचारों व सिद्धांतों को मजबूती देने की दिशा में आगे बढ़ाने का उपाय अवश्य तलाशा जा रहा है। इस सिलसिले में आवश्यक हो चला है कि सरकार और संगठन की तारतम्यता की धुरी सत्ता के बजाय सिद्धांतों को बनाया जाए और जिन मसलों को प्रतीकात्मक तौर पर स्वीकार करके व्यावहासिक तौर पर उनसे दूरी बनाए रखने की नीति पर अमल किया जा रहा है उसमें बदलाव लाया जाए और ऐसी दिशा में आगे बढ़ा जाए ताकि पूरी भाजपा सिर्फ मोदी पर ही निर्भर ना रहे बल्कि भाजपा में फिर ऐसी शक्ति का संचार किया जाए जो मोदी का विकल्प भी प्रस्तुत कर सके और भविष्य के लिये नये नेतृत्व को भी उभार सके। यानि पार्टी किसी की पिछलग्गू बन कर ही चलती रहे यह स्थिति तात्कालिक तौर पर भले ही सहज व स्वाभाविक लगती हो लेकिन दूरगामी तौर पर इससे नुकसान ही होगा जिसकी बाद में भरपाई करनी भी मुश्किल हो सकती है।