भय बिन होय न प्रीत
August 25, 2019 • बाल मुकुन्द ओझा

                              व्यंग्य 

          (बाल मुकुन्द ओझा)

देश की सियासत में भय या डर को लेकर कई अर्थ और अनर्थ निकाले जा रहे है। इसे हम यूँ भी कह सकते है जितना मुंह उतनी बातें। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी कहते है देश को लूटने वाले भ्रष्ट नेताओं को जेल जाने का डर सताए, तो यह डर अच्छा है। इसके जवाब में कांग्रेस  अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि राजीव गांधी को पूर्ण बहुमत मिला था लेकिन उन्होंने इसका इस्तेमाल डर का माहौल बनाने में नहीं किया। उन्होंने इसारे इसारे में मोदी पर हमला करते हुए कहा राजीव ने घमंड नहीं काम करके दिखाया। सोनिया गांधी ने कहा कि 1984 में  राजीव गांधी विशाल बहुमत से जीतकर आए थे लेकिन उन्होंने उस जीत का इस्तेमाल भय का माहौल बनाने और डराने या धमकाने के लिए नहीं किया। दूसरी तरफ मोदी ने कहा देश को लूटने वालों में कानून का डर होना ही चाहिए और अपने काले कारनामों के भंडाफोड़ से  डरे हुए भ्रष्ट नेताओं को वे जेल पहुंचा कर ही दम लेंगे। मोदी ने डर को परिभाषित करते हुए कहा जब दुश्मन में भारत का डर हो तो यह डर अच्छा है। जब आतंक की आंखों में सैकड़ों के पराक्रम का डर हो, तो यह डर अच्छा है। जब भगोड़ों को संपत्ति जब्त होने का डर हो, तो यह डर अच्छा है। जब मामा के बोलने से बड़े-बड़े परिवार बौखला जाएं, तो यह डर अच्छा है। 
डर को लेकर देश में सियासी पारा गरमाने लगा। नेता लोग इस डर या भय को अपने अपने पक्ष में भुनाने में जुट गए। ऐसे में रामायण के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास का एक दोहा सहसा ही याद हो उठा। भगवान राम जब वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई करने समुद्र किनारे पहुंचे और समुद्र देवता से समुद्र पार करने की इजाजत मांगी। तीन दिन की प्रतीक्षा के बाद उन्हें गुस्सा आ गया और उन्होंने अपना धनुष निकाल समुद्र देवता पर हमले के लिए उसकी ओर निशाना साधा। इसी सन्दर्भ में तुलसीदास का यह दोहा खूब प्रचलित हुआ -
बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब, भय बिन होय न प्रीत।
सचमुच यह दोहा हमारे आज के नेताओं पर बहुत सटीक बैठता है। मोदी कहते है न खाऊंगा और न खाने दूंगा। देखते है यह डर या भय केवल बयानों तक सीमित रहता है या भ्रष्टों में भय पैदा करता है। भ्रष्टाचार के आरोप में पूर्व गृह मंत्री और कांग्रेस के एक बड़े नेता चिदंबरम के सीबीआई की हिरासत में जाने से लोगों को इस डर का कुछ कुछ मतलब समझ में आने लगा है। देखने की बात है सलाखों के पीछे जाने के इस डर से वे क्या क्या उगलते है या यह डर बिन बाजे पटाखे की तरह फुस्स होता है।