भविष्य के भारत का शैक्षणिक एजेंडा
June 4, 2019 • डॉ. विजय सोनकर शास्त्री

(डॉ. विजय सोनकर शास्त्री)

शिक्षा किसी भी देश के निर्माण का महत्वपूर्ण अंग होती है। शिक्षा हर मानव में संस्कार को जन्म देती है और संस्कार से मानव समाज का सकारात्मक विकास प्रशस्त होता है। यह वाक्य हजारों सालपुरानी भारतीय हिन्दू संस्कृति की परंपरा को दर्शाता है। प्राचीन काल में गुरुकुलोंए आश्रमों तथा बौद्ध मठों में शिक्षा ग्रहण करने की व्यवस्था होती थी। नालन्दाए तक्षशिला एवं वल्लभी जैसे शिक्षा केंद्रोंकी पहचान विश्व स्तर पर थी और विदेशी छात्र भी भारत में शिक्षा के लिए आते थे। लेकिन समय के साथ ऐसे कई शिक्षा केंद्र नष्ट कर दिए गए। मुगल काल से लेकर अंग्रेजों के समय आने तक शिक्षाका स्वरुप बदलता चला गया। अंग्रेजों के काल में शिक्षा की जिस आधुनिक प्रणाली की शुरूवात हुईए उस प्रणाली ने शिक्षा को आम जन से दूर करने का काम किया। भारत को जब स्वतंत्रता मिली तोदेश की सरकारों ने शिक्षा के लिए काम तो कियाए लेकिन शिक्षा से आम जनमानस को जोड़ पाने में असफल ही रहे। उनकी असफलता के कारण गरीबए दलित और वंचित समाज शिक्षा से दूर होताचला गया। राजनीति और वोट बैंक की मानसिकता ने सरकारी स्कूलों में मिलने वाली शिक्षा की गुणवत्ता लगातार कम होती गयीए परिणाम निजी शिक्षा केंद्रों और धन आधारित शिक्षा के रूप में देखागया। सभी को शिक्षा देने के लिए कानून भी बनाया गयाए लेकिन आम जनमानस के बच्चे गुणवत्तायुक्त शिक्षा से दूर ही रहे।
देश की नयी मोदी सरकार के सामने शिक्षा क्षेत्र के आमूलचूल परिवर्तन की चुनौती भी है। खासतौर पर गरीबए दलित और वंचित समाज के बच्चों के लिए गुणवत्तायुक्त और रोजगारपरक शिक्षा देने केलिए बड़े कदम उठाने की आवश्यकता है। इसके लिए सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर को तो सही करना ही होगाए साथ ही उन निजी और महंगे स्कूलों पर भी नकेल कसनी होगीए जिनके लिए शिक्षासिर्फ धन कमाने के साधन से ज्यादा और कुछ नहीं है। गुणवत्तायुक्त और रोजगारपरक शिक्षा को उच्च वर्गों के माध्यम से निम्न वर्गों तक पहुंचना होगा। देश में जब शिक्षा का अधिकार अधिनियमलागू हुआ तो 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिये यह मौलिक अधिकार बन गया। इसके बावजूद शिक्षा के क्षेत्र में चुनौतियों का अंबार लगा है तथा ऐसे उपायों की तलाश लगातार जारी हैए जिनसे इस क्षेत्र मेंक्रांतिकारी परिवर्तन लाए जा सकें। मानव संसाधन के विकास का मूल शिक्षा है जो देश के सामाजिक.आर्थिक तंत्र के संतुलन में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हमारे देश का शिक्षा क्षेत्र शिक्षकों कीकमी से सर्वाधिक प्रभावित है। साथ ही राज्यों द्वारा चलाए जाने वाले शिक्षा सुधार कार्यक्रम भी कोई खास उम्मीद नहीं जगा पाए हैं। वर्तमान में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रोफेसरों की जवाबदेहीऔर प्रदर्शन सुनिश्चित करने का कोई फॉर्मूला नहीं है। देश के शिक्षा संबंधी सभी अध्ययन इंगित करते हैं कि शिक्षा के साथ विद्यार्थियों का स्तर भी अपेक्षा से नीचे है। इसके लिये सीधे शिक्षकों को दोषीठहरा दिया जाता है और इस वास्तविकता से आंख बंद कर ली जाती है कि शिक्षा का बुनियादी ढाँचा और शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था बेहद कमजोर है। देश में एक लाख से अधिक विद्यालय ऐसेहैंए जहाँ केवल एक शिक्षक है। आजादी के 72 वर्ष बाद भी यदि देश में शिक्षा की यह दशा और दिशा है तो स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के सकारात्मक अभियान में सभी का सक्रिय सहयोग लेनाआवश्यक होगा। आर्थिक असमानता की बड़ी वजह मैकाले की शिक्षा नीति हैए जो आम लोगों और संभ्रांत वर्ग के बीच फासले को बरकरार रखने के लिए तैयार की गयी थीण् मौजूदा शिक्षा व्यवस्था मेंक्या खामी है और नयी शिक्षा व्यवस्था कैसी होनी चाहिएघ् मैकाले ने अंग्रेजी शासन को कायम रखने के लिए संभ्रांत वर्ग तैयार करनेवाली शिक्षा नीति को बढ़ावा दिया। स्वतंत्रता के बाद भीआधुनिकता के नाम पर यही नीतियां अपनायी गयीं। इससे समाज में शिक्षा के स्तर पर असमानता बढ़ी। अमीर अच्छी शिक्षा हासिल कर आर्थिक तौर पर संपन्न होने लगे और गरीब पैसे के अभावमें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करने से वंचित होने लगे। इससे समाज में आर्थिक असमानता बढ़ी है। अब समय आ गया है जब स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के इस मुद्दे पर एक टीम इंडिया कागठन किया जाना चाहियेए जिससे देश का हर नागरिक का बच्चा ऐसी शिक्षा ग्रहण कर सकेए जो उसमें संस्कार भी विकसित करने में सक्षम हो साथ ही देश के हर नागरिक के समग्र विकास का सपनापूरा हो सकेगा।
भारतीय भविष्य का आर्थिक क्षेत्र
भारत तेजी से विकास कर रही अर्थव्यवस्था है। लेकिन अर्थव्यवस्था के सामने कई चुनौतियां भी हैं। स्वतंत्रता के बाद खास कर आर्थिक उदारीकरण के बादए भारतीय अर्थव्यवस्था ने देश के गरीबोंएदलितों और वंचित समाज के लोगों पर नकारात्मक असर डाला है। स्वतंत्रता के बाद शासन.सत्ता की जिम्मेदारी संभालने वालों ने अपने निजी हितों को जिस तरह से महत्व दियाए वह समय के साथबढ़ता गया। इससे राष्ट्रीय आंदोलन की सोच पीछे छूट गयी। कई सफलताओं के बावजूद कई असफलताएंए मसलन गरीबीए कुपोषणए अशिक्षाए बढ़ता प्रदूषण अब भी चिंता के विषय बनी हुई हैं। किसीभी देश के विकास में नेतृत्व का अहम योगदान होता हैए क्योंकि इसका असर सभी संस्थाओं पर पड़ता है। नेतृत्व की कमजोरी का असर हर ओर दिखायी देता है। भारतीय नेतृत्व की कमजोरी की जड़ेंऔपनिवेशिक काल से जुड़ी हुई हैं और यही वजह है कि स्वतंत्रता के बाद इसकी गुणवत्ता में तेजी से गिरावट आयी। कांग्रेस की गलत नीतियों के कारण समस्याएं गंभीर होती चली गयी।
गांधी जी का मानना था कि आर्थिक नीति के केंद्र में सबसे निचला व्यक्ति होना चाहिए। लेकिन 1991 से पहले और उसके बाद भी आर्थिक नीतियों में आम आदमी की बुनियादी जरूरतों को हल करनेपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। 1950 से ही आर्थिक नीतियों का मुख्य मकसद निवेश बढ़ाना रहा हैए न कि रोजगार। होना यह चाहिए था कि हम रोजगार और पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देते।लेकिन ऐसा नहीं हुआ। लेकिन अब देश में एक मजबूत नेतृत्व है। इसलिए अब ऐसी विकास प्रक्रिया को गति देनी होगीए जिसका लाभ देश के हर नागरिक को प्राप्त हो सके। गरीबी का उन्मूलन होएरोजगार के अवसर बढ़ेंए देश का हर व्यक्ति उत्पादक बन सके और शिक्षाए स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधा सभी को समान रूप से उपलब्ध होए तभी समाज में बराबरी आयेगी और देश आर्थिक रूप सेपूर्ण विकसित हो सकेगा।
गांधी जी ने कहा था कि आम लोगों की जरूरत के लिए संसाधन पर्याप्त हैंए लेकिन उनके लालच के लिए नहीं। मौजूदा अर्थव्यवस्था उपभोग पर आधारित है लोग सोचते हैं कि और अच्छा जीवन होएसारी सुख.सुविधाएं मिलेंए भले ही पर्यावरण पर और दूसरों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ता होण् ऐसे हालात को बदलने के लिए ही एक वैकल्पिक मॉडल की जरूरत हैए जिसमें उपभोक्तावाद न हो।भारत ही ऐसा देश हैए जो यह मॉडल दे सकता है। भारतए चीनए ब्राजील जैसे बड़े देशों में सिर्फ भारत के पास ही वैकल्पिक आर्थिक मॉडल देने की क्षमता है। भारत में इतने संसाधन हैं कि यहां सभी कोबुनियादी सुविधा मिल सकती है और हर नागरिक आर्थिक रूप से सशक्त हो सकता है।
1991 के बाद का मॉडल बाजार केंद्रित है। आज बाजार सब कुछ में प्रवेश कर गया है। बाजार की सोच हावी होने से राष्ट्रीय नीति कमजोर होती चली गयी है। मौजूदा आर्थिक संकट की प्रमुख वजह यहीहै। किसी देश की नीति दूसरे देश में भी सफल नहीं हो सकतीए क्योंकि सबके भौगोलिक हालात और समस्याएं अलग.अलग होती है। इसलिए मौजूदा आर्थिक हालात से पार पाने के लिए भारत कोअपने हितों वाली नीतियों को लागू करना होगा। उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बनी नयी सरकार आर्थिक क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव की राह प्रशस्त करेगी। नयी सरकार की नीतियांएयोजनाएं एवं कार्यक्रम ऐसे होने चाहिएए जो देश के हर नागरिक को विकास की राह में साथ लेकर चल सके।
भारत के आम आदमी की खुशहाली में कमी होने का बड़ा कारण यह है कि सरकार ने गरीबों के लिये योजनाएं बनायीए लेकिन वह योजनाएं राजनीतिक लाभ लेने तक सीमित रही। यही कारण है किदेश में अब तक गरीबी नहीं खत्म हुई। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने बदलाव की जो शुरूआत की हैए उसका सकारात्मक असर दिखने लगा है। विकास की सार्थकता इस बात में है कि देश का आमनागरिक खुद को संतुष्ट और आशावान महसूस करे। स्वयं आर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ बनेएतभी वह खुशहाल हो सकेगा। एक महान विद्वान ने कहा था कि जब हम स्वार्थ से उठकर अपने समय को देखते हुएदूसरों के लिए कुछ करने को तैयार होते हैं तो हम सकारात्मक हो जाते हैं। सरकार एवं सत्ताशीर्ष पर बैठे लोगों को निस्वार्थ होना जरूरी है। उनके निस्वार्थ होने पर ही आम आदमी के खुशहाली के रास्तेउद्घाटित हो सकते हैं। तभी आम आदमी को ऊर्जा एवं सकारात्मकता से समृद्ध किया जा सकता है। और प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसा करके दिखाया है। खुशहाल और विकसित भारत को निर्मित करने केलिये अतीत से सीखना होगा। एक सार्थक एवं सफल कोशिश पूरे भारत को एक नयी दिशा देगी और गरीबए दलित और वंचित समाज को मुख्यधारा में लेकर आएगीए इसमें कोई संदेह नहीं है। यहीवजह है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व पर देश के सभी वर्ग की जनता ने अपना भरोसा दिखाया है और यह भरोसा उनमें नया विश्वास पैदा करेगाए जो देश को फिर से उस ऊंचाई तक लेकर जायेगाएजिस ऊंचाई पर देश को ले जाने का सपना प्रधानमंत्री मोदी से लेकर भाजपा के हर कार्यकर्ता ने देखा है ।