भाजपा में बड़े बदलावों का सूत्रपात
July 14, 2019 • राकेश रमण
सत्रहवीं लोकसभा का गठन होने के बाद नेतृत्व का संकट सिर्फ कांग्रेस में ही नहीं उभरा है बल्कि भाजपा भी अपनी भावी दशा-दिशा और तेवर व कलेवर के संक्रमण से गुजर रही है। पिछली बार के मुकाबले भले ही भाजपा को इस बार कहीं अधिक बडा जनादेश हासिल हुआ हो और नरेन्द्र मोदी के चेहरे और अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी लगातार सफलताओं की गाथाएं लिखती दिखाई पड रही हो लेकिन अंदरूनी तौर पर भाजपा को बेहतर एहसास है कि जिस अभेद्य दुर्ग के कंगूरे पर चढकर वह अपनी विजय पताका लहरा रही है उसकी नींव की मिट्टी बेहद पोली है और समय की धार का वार लंबे समय तक सहन कर पाने की उसकी क्षमता ही नहीं है। जिस मोदी के चेहरे को आगे करने के लिये तमाम स्थापित नीतियों, सिद्धांतों व विचारों को पीछे कर दिया गया है उस लोकप्रिय व विश्वसनीय चेहरे का कोई विकल्प समय रहते नहीं तलाशा गया तो वक्त के साथ पार्टी का भी आउट डेटेड हो जाना तय है। लिहाजा आगामी लोकसभा चुनाव यानी 2024 से पहले ही भाजपा को अपनी कोख से ऐसे चेहरे को उत्पन्न करना है जिसे मोदी के उत्तराधिकारी के तौर पर प्रस्तुत किया जा सके। जाहिर तौर पर यह काम हवा में तो होने से रहा। इसके लिये अपनी उसी पुरानी जमीन को मथना होगा जिसके कारण अब तक इसकी पहचान पार्टी विद डिफरेंस की बनी हुई है। इसके लिये पहली अनिवार्यता है कि मोदी मतलब भाजपा और भाजपा मतलब मोदी के उस मिथक को तोडा जाये जिसकी स्थापना के लिये पार्टी की तमाम नीतियांे, सिद्धांतों व विचारधारा को बीते कई सालों में बेहद सोची समझी रणनीति के तहत हाशिये पर डालकर व्यक्तिवादी राजनीति को आगे बढाया गया है। इस रणनति को अमली जामा पहनाने में जिन लोगों की निर्णायक भूमिका रही उनमें भाजपा अध्यक्ष के तौर पर अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पार्टी में प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन महामंत्री रामलाल का नाम सबसे ऊपर है। लिहाजा अब जबकि भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिये मौजूदा व्यक्तिवाद से आगे बढकर पुरानी जमीन की ओर लौटना अनिवार्य हो गया है तो स्वाभाविक है कि पुरानी व्यवस्था से संस्थापकों व संचालकों को भी बदलना होगा। यानी या तो उन दोनों को अपने बदलाव लाना था अथवा उन दोनों को बदलना ही था। चुंकि ब्रांड मोदी के सबसे बडे सेल्समैन कहे जाने वाले अमित शाह की आस्था व निष्ठा में बदलाव आने की कल्पना करना भी मूर्खता ही होगी लिहाजा उनके उनके उत्तराधिकारी का चयन सबसे पहले किया गया। शाह को संगठन से हटाकर सरकार में भेजे जाने के पीछे सोच यही थी कि पार्टी को यथाशीघ्र नए संचालक के हाथों में सौंप दिया जाए। इसके लिये जेपी नड्डा के चेहरे का चयन भी कर लिया गया और पार्टी के संचालकों को इसके बारे में सूचित करते हुए स्पष्ट शब्दों में निर्देश भी दे दिया गया कि वे नेतृत्व के स्तर पर बदलावों की औपचारिकताओं को जल्दी से जल्दी पूरा करें। चुंकि संघ के प्रतिनिधि के तौर पर इस फैसले को पूरी तरह लागू कराने की जिम्मेवारी रामलाल की थी लिहाजा उनसे अपेक्षा थी कि वे नड्डा की ताजपोशी के निर्णय को अमल में लाने में कोई कसर नहीं छोडेंगे। लेकिन अव्वल तो सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल के लिये मोदी-शाह की जोडी को नड्डा के नाम पर सहमत नहीं किया जा सका और दूसरे भाजपा को सफलता के शिखर के पर पहुंचाने के बाद अपनी भूमिका को समेटकर पकी पकाई खिचडी की थाली किसी और के आगे परोस देने के लिये जितने बडे हृदय की जरूरत होती है उसका मुजाहिरा कर पाना किसी के भी बूते के बाहर की बात है। लेकिन नड्डा को पार्टी की कमान सौंपने के निर्देश की अवहेलना करना भी संभव नहीं था। ऐसे में बीच की राह निकालते हुए उन्हें फौरी तौर पर पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष घोषित कर दिया गया। इसमें ना पार्टी के संविधान की परवाह की गई की और ना ही उन स्थापित परंपराओं की जिसके तहत एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत को पूरी कठोरता से लागू करने में अब तक कभी कोताही नहीं बरती गई थी। बल्कि नड्डा को संगठन के संचालन की बागडोर थमाने के निर्देश का अनुपालन करने का दिखावा करते हुए यह बताने की कोशिश की गई कि चुंकि सांगठनिक चुनावों की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है लिहाजा कम से कम 50 फीसदी ब्लाक व मंडलों का चुनाव होने के बाद जिले का, कम से कम 50 फीसदी जिले का चुनाव होने के बाद राज्य का और 50 फीसदी राज्यों में सांगठनिक चुनाव निपटने के बाद ही केन्द्र का चुनाव हो सकता है। लेकिन तब तक के लिये नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष के उस पद पर बिठा दिया गया जिसका जिक्र ना तो पार्टी के संविधान में है और ना ही ऐसे किसी पद के सृजन की कोई नजीर उपलब्ध है। यानी सीधे शब्दों में कहें तो ऐसा करके संघ की आंखों में धूल झोंकने की ही कोशिश की गई ताकि आगामी दिसंबर माह में जब औपचारिक तौर पर पार्टी के नये मुखिया के चयन की प्रक्रिया आरंभ हो तब किसी बहाने से नड्डा को किनारे लगाकर अपने किसी खडाऊं को संगठन के संचालन की कमान दिलाने के लिये पर्याप्त समय मिल जाए। निश्चित तौर पर इस कूटनीति को सफल होने से रोकने और संघ के आदेश का अक्षरशः अनुपालन कराने की जिम्मेवारी रामलाल की ही थी। लेकिन उन्होंने मोदी-शाह की योजना को रोकने के बजाय उसे सफल बनाने में ही सहभागिता निभाई और उनका सहयोग लेकर संघ की आखों में धूल झोंकने की जो कोशिश की गई वह पूरे भगवा खेमे को बेहद नागवार गुजरना लाजिमी ही था। वह भी तब जबकि रामलाल पर संघ ने इतना भरोसा जताया था कि आडवाणी, राजनाथ व गडकरी से लेकर शाह तक के कार्यकाल में उनको ही पार्टी में अपने शीर्ष प्रतिनिधि के तौर पर स्थापित रखा। लेकिन उन्होंने इस भरोसे का कत्ल करते हुए जिस तरह से मोदी-शाह के प्रति अपनी स्वामीभक्ति का मुजाहिरा किया उसी का नतीजा रहा कि संघ ने पहली फुर्सत में उन्हें भाजपा से हटा दिया है। हालांकि इस तरह के फैसले सामान्य तौर पर संघ की प्रतिनिधि सभा की बैठक में लिये जाते हैं जो आगामी नवंबर माह में प्रस्तावित है। लेकिन उनकी कार्यशैली से नाराजगी का ही नतीजा है कि नवंबर की बैठक का इंतजार करना भी जरूरी नहीं समझा और विजयवाडा में हुई प्रांत प्रचारकों की दो दिवसीय बैठक में ही आनन-फानन में उन्हें भाजपा की जिम्मेवारी से मुक्त करते हुए तत्काल ही संघ के अखिल भारतीय सह संपर्क प्रमुख की बागडोर थमा दी गई और सक्रिय राजनीति से एक ही झटके में अलग कर दिया गया। यह पूरा घटनाक्रम यह बताने के लिये काफी है कि अब संघ ने भाजपा का भविष्य संवारने और मौजूदा व्यक्तिवादी कलेवर से पार्टी को निजात दिलाने के लिये सख्त तेवर अख्तियार कर लिया है और इसके लिये आवश्यक बदलावों के लिये वह ना तो इंतजार करने के मूड में है और ना ही इसमें किसी के साथ किसी भी तरह की रियायत बरतने के पक्ष में है।