मध्यस्थता की कवायद
March 9, 2019 • राकेश रमण
अयोध्या विवाद का हल शीघ्र निकलने की उम्मीदें एक बार फिर दम तोड़ गई हैं। अब सर्वोच्च न्यायालय ने इस मसले को आपसी सहमति से सुलझाने की राह निकालने के लिये मध्यस्थों की नियुक्ति कर दी है। मामले को अब मध्यस्थता से सुलझाने के लिए कोर्ट ने तीन जिन तीन लोगों का नाम तय किया है उसमें आर्ट ऑफ लीविंग के संस्थापक धर्मगुरू श्रीश्री रविशंकर, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मोहम्मद इब्राहिम खुलीफुल्लाह और वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू का नाम शामिल है। न्यायालय ने व्यवस्था दी कि मध्यस्थता प्रक्रिया फैजाबाद में होगी और यह एक सप्ताह के भीतर शुरू हो जाएगी। साथ ही न्यायालय ने निर्देश दिया है कि मध्यस्थता पैनल चार सप्ताह में प्रगति रिपोर्ट दायर करेगा और समूची प्रक्रिया आठ सप्ताह के भीतर पूरी हो जानी चाहिए। यानि सुप्रीम कोर्ट भी यही चाह रहा है कि इस विवाद को अदालत की चैखट के बाहर ही सुलझा लिया जाए और किसी निर्णायक फैसले पर सबको सहमत करके मामले का निपटारा कर दिया जाए। लेकिन सवाल है कि मध्यस्थता की इस पहल को कितनी सफलता मिल पाएगी। सच तो यह है कि राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद का विवाद सदियों से चला आ रहा है और इसे सुलझाने की तमाम तरकीबें आजमाई जा चुकी हैं। लेकिन तरकीबें नाकाम रहीं और विवाद बदस्तूर कायम रहा। विवाद यह कि विवादित जमीन पर मंदिर होना चाहिये अथवा मस्जिद। आखिरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक फैसला दिया जिसे निश्चित ही पंचायत का तुगलकी फरमान ही कहा जाएगा। उसने विवादित जमीन के तीन हिस्से कर दिये जिसमें से एक हिस्सा बाबरी एक्शन कमेटी को देने का फैसला सुना दिया। वह भी तब जबकि अदालत ने अपने फैसले में साफ तौर पर माना कि विवादित जमीन ही रामलला की जन्मभूमि है और वहां मंदिर को तोड़ कर बाबरी मस्जिद तामीर की गई थी। जाहिर तौर पर अदालत का यह फैसला किसी भी पक्षकार को रास नहीं आया और सबने सर्वोच्च न्यायालय में इसके खिलाफ अपील दायर कर दी। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसके तमाम पहलुओं को खंगाला और आखिरकार पूरे विवाद को सामान्य जमीनी विवाद के तौर पर सुलझाने का फैसला किया जिसमें उसे यह तय करना था कि पूरी जमीन पर किसका हक होना चाहिये। रामजन्मभूमि के नाते रामलला को वह जमीन मिलनी चाहिये अथवा मंदिर की नींव पर मस्जिद का कंगूरा खड़ा करके उस पर सदियों से कब्जा जमानेवालों को वह जमीन दे दी जानी चाहिये। इस विवाद को सुलझाने में सुप्रीम कोर्ट को भी पसीना आ रहा है और वह भी इस पेंचीदा मसले को एक निर्णय से हल करने के बजाय आम सहमति से विवाद का निपटारा कराने का प्रयास कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट की इस कोशिश को जायज मानना ही सही होगा क्योंकि उसकी ओर से जो भी फैसला आएगा वह भविष्य के लिये कानून की तरह अमल में लाया जाएगा। अगर उसने विवादित जमीन को रामलला की जन्मभूमि के तौर पर इलाहाबाद हाईकोई द्वारा दी गई मान्यता को स्वीकार करते हुए बाबरी के पक्षकारों के खिलाफ फैसला दिया तो देश भर में कब्जेदारी के तहत आनेवाली तमाम संपत्तियों के मालिकाना हक का सवाल उठ खड़ा होगा। लेकिन अगर उसने सदियों से चले आ रहे कब्जे को मालिकाना हक के लिये पर्याप्त माना तो मूल मालिकों का हित तमाम विवादों में प्रभावित होगा और यह फैसला सभी विवादों में नजीर के तौर पर प्रस्तुत किया जाएगा। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय की ओर से कोई भी फैसला इस टिप्पणी के साथ भी आ सकता है कि यह विशेष मामले पर विशेष परिस्थिति में दिया गया फैसला है जो किसी अन्य मामले को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं कर सकता और किसी भी विवाद में इसकी नजीर भी नहीं दी जा सकी। लेकिन ऐसा करना अपने आप में ऐतिहासिक हो जाएगा। फिर सर्वाच्च न्यायालय द्वारा खींची जानेवाली सबसे बड़ी, सर्वव्यापी व सर्वमान्य लकीर की परंपरा आगे भी टूटने की राह खुल जाएगी। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी उलझनों को भी दरकिनार नहीं किया है और उसने मध्यस्थता से मामले को सुलझाने का प्रयास कर लेना ही बेहतर समझा है। लेकिन मसला है कि अगर मध्यस्थता से मामला हल होने की कोई गुंजाइश होती तो यह विवाद इतना लंबा चलता ही नहीं। यहां तक कि इलाहाबाद हाईकोई का भी जो फैसला है वह अपने आप में गांव की पंचायत में होनेवाली मध्यस्थता के जैसा ही है। उसे साफ, सपाट व सटीक निर्णय तो हर्गिज नहीं कहा जा सकता है। मध्यस्थता का मतलब ही होता है कि सभी पक्षों के हितों का ध्यान रखा जाए और ऐसा कोई हल निकाला जाए जिसमें किसी के साथ कोई अन्याय ना हो। आखिर यही तो किया था इलाहाबाद हाईकोर्ट ने। तीनों पक्षों को उसने विवादित जमीन का एक तिहाई हिस्सा दे दिया और अपनी जान छुड़ा ली। ऐसे में अब जिन मध्यस्थों की नियुक्ति हुई है उनके पास अगर कोई ऐसा फार्मूला हो जिसे स्वीकार करके कोई भी पक्ष विवादित जमीन से अपनी दावेदारी छोड़ने पर सहमत हो जाए तब तो बात बनने की कोई उम्मीद भी की जा सकती है। लेकिन ऐसा होने की कोई संभावना फिलहाल तो नहीं दिख रही। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मध्यस्थ बनाए गए श्रीश्री ने तो पहले भी निजी स्तर पर मध्यस्थता की कोशिश करते हुए फार्मूला दिया था कि मस्जिद के लिये मनचाही जमीन के एवज में बाबरी के पक्षकार विवादित जमीन पर से अपना दावा छोड़ दें लेकिन वह फार्मूला पहले ही फेल हो चुका है। तीनों ही पक्ष इस बात पर बदस्तूर डटे हुए हैं कि विवादित जमीन पर से वे हर्गिज अपना दावा तब तक नहीं छोड़ेंगे जब तक दावा छोड़ने के अलावा कोई विकल्प ही ना बचे। ऐसा तभी हो सकता है जब अदालत अपनी ओर से यह तय कर दे कि पूरी जमीन किसे मिलनी चाहिये। यानि घूम-फिर कर विवाद का अपने मूल पर ही वापस लौटना तय है। लेकिन जब समस्या ऐतिहासिक है तो समाधान भी ना तो सामान्य हो सकता है और ना ही सामान्य तरीके से सामने आने की उम्मीद की जा सकती है। लिहाजा तमाम कोशिशों के बीच एक कोशिश यह भी सही। जब सदियों से विवाद चल ही रहा है तो आठ हफ्ते और सही। देखें आखिर क्या परिणाम निकलता है इस मध्यस्थता की कवायद का।