मी-लार्ड की मनमानियां
July 17, 2019 • राकेश रमण
भारत में समाज के हर क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव देखा जा रहा है। हर तरफ खुलापन आ रहा है और पर्देदारी की परंपरा समाप्त हो रही है। लेकिन जिस क्षेत्र में पारदर्शिता का पूरी तरह अभाव बदस्तूर बरकरार है वह निर्विवाद तौर पर न्यायपालिका ही है। वह अपने पुराने ढ़र्रे पर ही लगातार चल रहा है और बदलाव की ओर बढ़ने के लिये कतई तैयार नहीं है। न्याय सस्ता हो, सर्वव्यापी हो, समावेशी हो, सर्वसुलभ और संपूर्णता में हो इसकी बातें तो दशकों से कही और सुनी जा रही है, लेकिन इस दिशा में पहलकदमी करना न्यायपालिका को कतई स्वीकार्य नहीं है। बेशक किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिये स्वतंत्र, निष्पक्ष, तटस्थ, स्वायत्त और खुदमुख्तार न्यायप्रणाली की मौजूदगी सर्वोच्च अनिवार्यता है। लेकिन यह खुदमुख्तारी अगर निरंकुशता, तानाशाही और मनमानी में तब्दील हो जाये तो इसे कतई आदर्श स्थिति नहीं कहीं जा सकती है। बात चाहे अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की करें या न्याय देने के तौर तरीकों की अथवा अदालती आदेशों की। किसी भी मामले में पारदर्शिता का दावा नहीं किया जा सकता। अक्सर हर मामले में मनमानी का माहौल ही देखा जाता है। ऐसा ही मामला रांची से सामने आया जहां झारखंड में साम्प्रदायिक पोस्ट शेयर करने के आरोप में ऋचा पटेल नाम की एक युवती को गिरफ्तार किया गया तो सिविल कोर्ट ने उसकी जमानत के लिये अजीबोगरीब शर्त सामने रख दी। उसे अदालत ने पांच कुरान बांटने का निर्देश दे दिया। निश्चित ही यह ऐसी शर्त थी जिसके अनुपालन पर अगर अदालत अड़ी रहती तो दूरे देश में भारी बखेड़ा होना लाजिमी था। अदालत का फैसला सामने आने के बाद बवाल आरंभ भी हो गया। जहां एक ओर सोशल मीडिया पर अदालत के इस फैसले का मजाक बनाया जाने लगा वहीं दूसरी ओर हिन्दूवादी संगठनों ने भी सड़क पर मोर्चा खोलने की तैयारी कर ली। लगे हाथों ऋचा ने भी निचली अदालत के इस फैसले को मानने से इनकार करते हुए इसके खिलाफ ऊपरी अदालत में गुहार लगाने की बात कह दी वहीं दूसरी ओर स्थानीय वकीलों ने इस ऊटपटांग फैसले के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराते हुए 48 घंटे की हड़ताल पर जाने का फैसला कर लिया। वह तो गनीमत रही कि अदालत ने अपना फैसला वापस ले लिया है लिहाजा अब इस बेमानी बवाल का खतरा खत्म हो गया है। लेकिन सवाल है कि ऐसा फैसला सुनानेवाले जजों की जिम्मेवारी आखिर कैसे तय होगी। वैसे भी यह कोई पहला मौका नहीं है जब अदालतों ने मनमाने, ऊटपटांग व मजाकिया फैसले सुनाए हों। इससे पहले भी कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जब अदालत का फैसला मजाक का विषय बन कर रहा गया। मसलन इसी साल मार्च में राजस्थान के प्रतापगढ़ जिला स्थित बजरंगगढ़ के रहने वाले चार लोगों ने 27 पेड़ काट दिए तो वन विभाग के अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर दर्ज किये गये एक मुकदमे का निष्तारण करते हुए मी-लार्ड ने चारों को 270 पौधे लगाने की सजा दे दी। साथ ही यह भी फरमा दिया कि लगाये जाने वाले सभी पौधे आंवले के के ही होने चाहिये। इसी प्रकार पिछले साल असम की एक निचली अदालत ने अपने उस अजब-गजब फैसले से लोगों को हैरान कर दिया जिसमें एक महिला को सिर्फ इसलिए उम्र कैद की सजा सुना दी गई, क्योंकि वो अपने पति की आप्राकृतिक मौत पर नहीं रोई थी। महिला के नहीं रोने को आधार बनाकर निचल अदालत ने उसे ही पति की हत्या के लिए दोषी मान लिया। इसमें अजीब बात तो यह हुई कि जब महिला ने इस हैरतअंगेज फैसले के खिलाफ गुवाहटी हाई कोर्ट में गुहार लगाई तो उसने भी निचली अदालत के इस फैसले को बरकरार रखना ही बेहतर समझा। वह तो गनीमत रही कि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ इस फैसले को पटल दिया बल्कि इस पर कठोर टिप्पणी करने से भी गुरेज नहीं किया। इसी प्रकार साल 2012 में दिल्ली में छेड़छाड़ के एक आरोपी ने जब कोर्ट में अपना जुर्म कबूल कर लिया तो मी-लार्ड ने पहले उससे कोर्ट में ही उठक बैठक कराई और उसके बाद न्यायिक हिरासत में बिताए गए उसके समय को सजा मनाते उसे रिहा किये जाने का आदेश देकर मामले को समाप्त कर दिया। मी-लार्ड की मनमानी 2015 में हरियाणा के झज्जर की कोर्ट में भी देखी गई जहां एक दरोगा को ऊंची आवाज में बात करना काफी महंगा पड़ गया। उसकी इस खता को नाकाबिले माफी करार देते हुए उसे कोर्ट रूम में ही तत्काल मुर्गा बनने की सजा सुना दी गई। दरोगा के काफी मिन्नत करने के बाद भी मी-लार्ड का दिल नहीं पिघला, जिसके बाद उसे वहीं पर तब तक सर झुकाकर खड़ा रहना पड़ा जब तक कोर्ट की पूरी कार्रवाई निपटाकर मी-लार्ड चले नहीं गए। ऐसे कई किस्से अक्सर सामने आते रहते हैं जिसमें मी-लार्ड की मनमानी साफ दिखाई पड़ती है। यहां तक कि निचली अदालतों की बात छोड भी दें तो सर्वोच्च न्यायालय के जज भी कई बार ऐसे बेतुके फैसले सुना देते हंै जिसे सुनकर किसी का भी मन अपना माथा पीटने का करने लगे। मिसाल के तौर पर जिन दिनों सरकारी विज्ञापन में किसी भी नेता का चेहरा नहीं दिये जाने के मसले का विवाद खडा हुआ तो फैसला आया कि तीन ही चेहरे सरकारी विज्ञापनों में दिखाने की अनुमति दी जा सकती है जिसमें राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के अलावा तीसरा चेहरा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का ही होगा। इसी प्रकार बीते दिनों सर्वोच्च न्यायालय के एक मी-लार्ड को सडक जाम का सामना करना इतना दुखदायी लगा कि उन्होंने जजों के लिये टोल व सडक पर अलग लेन तक के इंतजाम की बात कह दी। कहने का तात्पर्य यह कि कहीं ना कहीं अदालतों के कामकाज व निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता की भी जरूरत है और जवाबदेही तय करने की भी आवश्यकता है। वर्ना न्याय की देवी पर बचा-खुचा विश्वास और भरोसा भी सिरे से तिरोहित होने में अब अधिक समय नहीं लगेगा।