मोदी की मारक कूटनीति
August 27, 2019 • राकेश रमण
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली को अगर गौर से देखें तो विरोधियों के खिलाफ वे अक्सर चिढ़ाने, उकसाने और गलतियां करने पर मजबूर कर देने की ही रणनीति अपनाते हैं। हालांकि इस सिलसिले में वे अपनी ओर से मर्यादा का पूरा ध्यान रखते हैं और गलतियों की शुरूआत कभी नहीं करते। लेकिन उनके बिछाए जाल में फंस कर विरोधी पक्ष का सब्र अगर चूका और उसने कोई गलती कर दी तो उसका अधिकतम लाभ उठाने के लिये मोदी किसी भी हद तक जाने से संकोच नहीं करते। अगर प्रधानमंत्री की इस कार्यशैली का उनके विरोधियों ने बारीकी से अध्ययन किया होता तो आज उन्हें इस कदर हताश, निराश और गलतियां सुधारने के बजाय न चाहते हुए भी गलतियों का सिलसिला जारी रखने के लिये मजबूर नहीं होना पड़ता। यह विरोधी भारत के भीतर भी हैं और भारत के बाहर भी। भीतर के विरोधियों का जिक्र करें तो आज मोदी विरोध की धारा में बहते हुए वे इतना आगे निकल चुके हैं कि उनके विरोध से भारत के हितों के विरोध का स्वर सुनाई पड़ने लगा है। यह अकारण नहीं है कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने विपक्ष के उन नेताओं को गलत ठहराया है जिन्होंने कश्मीर घाटी का दौरा करने की कोशिश की। वे जमीनी हालातों को बेहतर समझ रही हैं और चुंकि उन्होंने संसद के भीतर भी अनुच्छेद 370 की समाप्ति का समर्थन किया था लिहाजा उनके पास यह सहूलियत है कि वे आसानी से अपने उसी स्टैंड पर आगे बढ़ते हुए देश के जनमानस को राजनीतिक तौर पर अपने साथ जोड़ने के लिये विपक्ष की गलत हरकतों का विरोध कर सकती हैं। लेकिन मोदी की कूटनीति में फंसकर संसद के भीतर विरोध दर्ज करा चुके विपक्षियों के लिये अपनी गलती को सही साबित करने का प्रयास करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। उन्हें तो यह कहना ही होगा कि सरकार ने जो कदम उठाया उससे फायदा कम और नुकसान अधिक हो रहा है। हालांकि उन्हें भी पता है कि नुकसान के बजाय देश का फायदा ही फायदा हो रहा है लेकिन इस बात को अगर वे मान लें तो उनकी उस राजनीतिक समझ पर प्रश्नचिन्ह लग जायेगा जिसके तहत उन्होंने संसद में इसका विरोध किया था। लिहाजा अगर नुकसान होता हुआ नहीं दिख रहा है और कहीं से किसी बड़े विरोध की खबर नहीं आ रही है तो उनका अंतिम प्रयास यही रहेगा कि वे कश्मीर के लोगों के मन में आक्रोश की आग सुलगाने का भरसक प्रयास करें। इसी प्रयास के तहत विपक्षियों की टोली कश्मीर जाने की जिद पर अड़ी थी लेकिन कश्मीर के आम आवाम के हित की जब वे बात करते हैं तो उनके लहजे से भारत के विरोध की वही गंध निकलती है जो कश्मीरियों के हितों की आड़ लेकर भारत को धमका रहे इमरान खान की बातों से महसूस होती है। लेकिन मोदी की कूटनीति ने सरहद के दोनों तरफ के विरोधियों को एक ही जैसी परिस्थिति में ऐसा उलझाया है कि वे चाह कर भी उस लड़ाई से पीछे नहीं हट सकते जिसमें उन्हें अपनी हार और फजीहत स्पष्ट दिखाई पड़ रही है। यह मोदी की कूटनीति ही थी कि उन्होंने जम्मू कश्मीर में दलितों व आदिवासियों को आरक्षण का लाभ देने के लिये विधेयक लाने के बहाने राज्यसभा में चर्चा का समय मुकर्रर करा लिया और ऐन मौके पर उस विधेयक के साथ ही अनुच्छेद 370 को समाप्त किये जाने और प्रदेश को दो अलग केन्द्र शासित सूबे के तौर पर नया अस्तित्व प्रदान करने का विधेयक प्रस्तुत करते हुए एक साथ ही सब पर चर्चा आरंभ करा दी। विपक्ष को इसका समर्थन और विरोध करने का मौका ही नहीं दिया और उससे पहले कश्मीर में फौज व सुरक्षा का भारी बंदोबस्त करते हुए धारा 144 के नाम पर कर्फ्यू लगाकर विरोधियों को खुद पर जोरदार हमला करने का बहाना थमा दिया। इसका जवाब मांगने के लिये जब विपक्ष ने सदन में सरकार पर हमला बोला तब सरकार ने जवाब देने के क्रम में चार विधेयकों का बंडल पेश करते हुए उस पर ना सिर्फ चर्चा आरंभ करा दी बल्कि हाथों हाथ मत विभाजन भी करा दिया। सरकार के ऐसे रवैये का विरोध करना स्वाभाविक ही था और ऐसा करके विपक्ष मोदी की कूटनीति में इस कदर फंस गया कि अब उसे इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता ही नहीं सूझ रहा। ऐसी ही गलती इमरान खान ने कर दी जब सरहद के इस पार के घटनाक्रमों को तूल देकर उन्होंने अपने देश के भीतर बेवजह कश्मीर को लेकर संवेदना की आग सुलगा दी। दरअसल पाक में महंगाई, मंदी और बेरोजगारी को लेकर उनकी सरकार की जो चैतरफा आलोचना हो रही थी उससे बचने के लिये उन्होंने राष्ट्रीय बहस को कश्मीर के संवेदनशील मसले की ओर मोड़ने के लिये कश्मीर में सुरक्षा बढ़ाने के भारत के कदम का इतना विरोध किया कि धारा 370 हटाने की खबर पर चुप्पी साधने का विकल्प ही उनके पास नहीं बचा। जबकि भारत के हिस्से में कुछ भी हो रहा हो उससे पाक का लेना एक ना देना दो। लेकिन मोदी की कूटनीति ने उन्हें भी ऐसा उलझाया कि अब इस मसले को अंजाम तक ले जाते हुए दिखने के अलावा उनके पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। जबकि भारत की ओर से शांति, भाईचारे और बातचीत की बात मोदी ने ट्रम्प के समक्ष सारी दुनिया को बताई है। लेकिन मोदी की यह बातें पाक पर उल्टा ही असर करेंगी यह तय है। तभी तो मोदी-ट्रम्प की मुलाकात के बाद इमरान ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए परमाणु युद्ध छिड़ने की चेतावनी जारी करने की गलती कर दी है। जबकि वह भी जानते हैं कि युद्ध का नतीजा क्या होगा लेकिन वे मोदी की फिरकी में फंसकर पिच पर इतने आगे बढ़ चुके हैं कि सुरक्षित वापसी कर पाना नामुमकिन है। लिहाजा वे उन्मादी बातें करके और युद्ध की खुली धमकी देकर भारत के लिये उस लक्ष्य को हासिल करना आसान बनाते जा रहे हैं जिसके तहत गृहमंत्री ने सदन में सीना ठोंककर पाक अधिकृत कश्मीर को शीघ्र हासिल करने का दावा किया था। इमरान जिस राह पर आगे बढ़ रहे हैं उसमें पाक को फायदा तो कुछ नहीं होगा उल्टा समूचे विश्व की फजीहत भी झेलनी पड़ेगी और भौगोलिक तौर पर अकल्पनीय नुकसान भी उठाना होगा।