रक्षाबन्धन और जनजागृति
August 12, 2019 •  डॉ दीपा शुक्ला 
( डॉ दीपा शुक्ला)
हमारी भारतीय संस्कृति इतनी विशाल है कि इसमें सैकड़ों, हज़ारों रीति-रिवाज, उत्सव और पर्व हैं जो एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से जोड़ने वाली कड़ी का कार्य करते हैं। यही त्योहार और उत्सव हमें कहीं न कहीं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आपसी संबंध बनाए रखने में सहायक होते हैं चाहे वो मनुष्य से मनुष्य के बीच हों अथवा मनुष्य और प्रकृति के बीच। ये रीति-रिवाज और त्योहार मनुष्य को नैतिकता और मानवता की सीख देते हैं और संबंधों को प्रगाढ़ बनाते हैं। ऐसी हमारी भारतीय संस्कृति पर हमें गर्व है।
इसी संस्कृति के अनेक त्योहारों में से एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण त्योहार है- रक्षाबन्धन। 'रक्षाबन्धन 'का अर्थ है- 'रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध होना।' रक्षाबन्धन हेतु प्रयुक्त सूत्र अर्थात 'धागे' प्रतीक हैं - पवित्र प्रेम की पहचान का, अटूट विश्वास का और समर्पण के संकल्प का । यूँ तो इस त्योहार की महत्ता विशेष रूप से भाई- बहन के पवित्र - रिश्ते को मान- सम्मान दिलाने में है; परंतु इस त्योहार को मनाने  के पीछे कई प्रचलित कथाएं हैं।
कहा जाता है कि जब देव और दानवों में युद्ध चल रहा था तब दानव देवताओं पर भारी पड़ने लगे। इससे इंद्र देवता घबराकर बृहस्पति देवता के पास गए और उन्होंने सारी बात विष्णु जी को बताई।  वहाँ उपस्थित इंद्र की पत्नी शचि ने भी सारी बात सुनी और उन्होंने रेशम के धागों से बने रक्षासूत्र को मंत्रों की शक्ति से पवित्र करके अपनी पति की कलाई पर बाँधा। उस दिन श्रावण-पूर्णिमा थी। उसी मंत्र की शक्ति के कारण इंद्र विजयी हुए। तभी से रक्षाबन्धन पर्व को 'श्रावणी' के नाम से भी जाना जाता है।
पुराणों में प्रचलित एक अन्य कथानुसार , भगवान वामन ने राजा बलि को इसी दिन रक्षा हेतु रक्षासूत्र बांधकर दक्षिणा में तीन पग भूमि मांग ली थी । भगवान वामन ने तीन पग में सारा आकाश , पाताल और धरती नापकर, राजा बलि को रसातल में भेज दिया । इस प्रकार विष्णु भगवान द्वारा राजा बलि के अभिमान को चकनाचूर कर देने के कारण यह त्योहार ' बलेव' नाम  से भी जाना जाता है । वस्तुतः राखी के इसी कच्चे धागे के बदले भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी की साड़ी को अक्षय और असीमित कर लाज बचायी थी ।अतः यहीं से इसे भाई - बहन के पवित्र संबंधों वाली परम्परा रक्षाबंधन का सूत्रपात कहा जा सकता  है ।
            अनेक पुराणों में श्रावणी पूर्णिमा को पुरोहितों द्वारा किया जाने वाला आशीर्वाद कर्म भी माना जाता है । ये पुरोहित एक श्लोक का उच्चारण करते हुए यजमान की दाहिनी कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर रक्षा की कामना करते हैं और आशीर्वाद देते हैं  । श्लोक है -- 
      
         "येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः ।
     तेन त्वामपि बद्धनामि रक्षे मा चल मा चल ।।"
         अर्थात जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था , उसी सूत्र से मैँ तुम्हें बांधता हूँ। हे ! रक्षासूत्र तुम अडिग रहना ।
प्राचीन काल मे योद्धाओं की पत्नियां रक्षासूत्र बांधकर उन्हें  युद्ध में भेजती थीं , ताकि वे विजयी होकर ही लौटें । मध्ययुगीन भारत मे हमलावरों की वजह से महिलाओं की रक्षा हेतु भी रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता था । यह एक धर्म बंधन था । तभी से महिलाएँ सगे भाइयों या मुँहबोले भाइयों को रक्षासूत्र बांधने लगीं । इस दिन बहने  तिलक - अक्षत लगाकर भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और फल - मिठाई खिलाती हैं । भाई भी श्रद्धा से अपने सामर्थ्य के अनुसार बहन को वस्त्र , आभूषण , द्रव्य और अन्य वस्तुएं भेंट करता है ।
निष्कर्षतः  स्पष्ट है कि यह रक्षासूत्र जो मात्र कुछ रेशम या सूत के धागों की बनी डोरी है जो मनुष्य को एक दृढ़ विश्वास और संकल्प में बांधती है ।
 इन रक्षासूत्रों का हमारे भारतीय समाज मे बड़ा महत्त्व है लेकिन वर्तमान में आवश्यकता है कि हम इसके महत्त्व को विस्तृत रूप में लें समझें  और  जागृति फैलाएं कि हम सिर्फ एक ही दिन विशेष पर इन रक्षासूत्रों की संवेदना न जगायें बल्कि हमें सदैव संवेदना जागृत रखनी चाहिए । अपने देश के पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति संवेदित होकर रक्षासूत्र बांधकर अपने पर्यावरण , पेड़ - पौधों, वन्य - जीवों , जल - संसाधनों , वायु  के प्रति संकल्प लेकर उनको सुरक्षित , संरक्षित और संवर्धित करने हेतु जन - जागृति फैलाएं । अपने बहन - बेटियों की सुरक्षा का संकल्प सिर्फ एक ही दिन क्यों ? हमें हर रोज़ अपनी बेटी और दूसरे की बेटियों की अस्मिता की लाज रखने का संकल्प लेना चाहिए । आज आवश्यकता है संकल्प लेने  की उन अजन्मी अबोध कन्या - भ्रूणों को बचाने हेतु । आओ हम संकल्प ले उन वृद्ध माता  - पिता की सेवा ,सुरक्षा की जिन्हें घर से निकाल वृद्धाश्रम में डाल दिया जाता है  । रक्षासूत्र बांधना तो महज एक रीति है , परम्परा है ; परंतु इसमें दृढ़ संकल्प की भावना ही महत्त्वपूर्ण है । क्यों न आज हम संकल्प उठाएं मानव से  मानव के परित्राण का , प्रकृति के संरक्षण और परिवर्धन का । आओ इस रक्षाबंधन पर  विशेष जनजागृति का संदेश फैलाएं ,  पर्व मनाएं , खुशियां बिखराएं ।