राक्षसी मनोवृति के तानाशाहों की वीभत्स कहानियां
July 26, 2019 • विष्णुगुप्त

(विष्णुगुप्त)

आम तौर पर मृत्यु के प्राप्त के प्रति आलोचनात्मक और अपमान तथा खिल्ली पूर्ण भाव प्रदर्शित नहीं किया जाता है, सहानुभूति व दुख ही व्यक्त किया जाता है। भारतीय परिपेक्ष्य में तो मृत्यु के प्राप्त के खिलाफ बोलना एक घृणात्मक प्रवृति मानी जाती है। पर दुनिया में ऐसे कई उदाहरण भी प्रकट हैं जिसमें मृत्यु के प्राप्त पर आलोचना, अपमान और घृणात्मक प्रवृतियां न केवल हावी रहती हैं बल्कि दुनिया को उनके गुनाहों के प्रति आगाह भी करती हैं। दुनिया का इतिहास राक्षसी और कसाई पूर्ण करतूतों से भरी पडी है, शासकों और स्वयं भू सरगनाओं ने मानवता के प्रति ऐसे अपराध किये हैं,ऐसी खूनी वहशीपन दिखायें हैं जिसे पढ कर, जिसे याद कर आज भी रोंगटें खडे हो जाते हैं और ऐसे शासकों और स्वयं भू सरगनाआं के प्रति नफरत, आक्रोश और धृणा भी फैलती है।

 हिटलर का प्रकरण हम देख सकते हैं। हिटलर की मौत का वर्षो-बर्षो के बाद भी एक घृणात्मक प्रवृति के रूप में देखा जाता है और हिटलर के प्रकरण से दुनिया को सबक और सीख लेने की शिक्षा दी जाती है। हिटलर ने दुनिया को द्वितीय विश्व युद्ध के लिए न केवल बाध्य किया था बल्कि लाखों लोगों के नरसंहार का दोषी भी था। हिटलर के नाम पर आज भी घृणात्मक बातें कही जाती हैं। दूसरा उदाहरण ओसामा बिन लादेन का है। आतंकवादी संगठन अलकायदा का सरगना ओसामा बिन लादेन जब मारा गया तब दुनिया भर में खुशियां मनायी गयी थी, यह कहा गया था कि वह घृणा और हिंसा का पात्र था, उसका मारा जाना निश्चित तौर पर शांति और सदभाव का प्रतीक है। ओसामा बिन लादेन ने मजहब के नाम पर कैसी अंधेरगर्दी फैला रखी थी, मजहब के नाम पर कैसी हिंसा फैला रखी थी, मजहब के नाम पर दुनिया भर कैसा आतंकवाद फैला रखा था, किस प्रकार से उसने मजहब के नाम आत्मघाती दस्ते बना रखे थे,  उसके एक आदेश पर मजहबी लोग बम बन कर उठते थे और खुद को उड़ाने के साथ ही साथ लक्षित लोगों को भी उड़ा देते थे , यह सब कौन नहीं जानता है। उत्तर कोरिया का तानाशाह किम अपने विरोधियों को खूंखार कुतो, मगरमच्छों के बीच छोड देता है। 
      ईदी अमीन का प्रसंग तो और भी खतरनाक है, बर्बर और रोंगटे खडा करने वाला है, यह भी सोचने के लिए बाध्य करता है कि मानव इतना जहरीला और हिंसक कैसे हो सकता है, जो मानव भक्षी बन बैठता है, मानव का खून पीने जैसी करतूत कर सकता है? ईदी अमीन युगांडा का राष्टपति था, वह कम्युनिस्ट मानसिकता का तानाशाह था। ईदी अमीन के संबंध में दुनिया का मानना है कि वह मानवता का दुश्मन था, वह साक्षात राक्षस था, उसकी कम्युनिस्ट तानाशाही आठ साल ही चली थी पर इन आठ सालों में उसने लाखों लोगों को मरवा दिया था। करीब एक लाख भारतीय मूल के लोगों को उसने युगांडा छोडने के लिए विवश कर दिया था। उल्लेखनीय है कि युगाडा में उस समय भारतीय मूल के लोगों का व्यापार पर आधिपत्य था। ईदी अमीन सिर्फ भारतीय ही नहीं बल्कि अन्य विदेशी मूल के लोगों से भी घृणा करता था। ईदी अमीन के संबंध में दुनिया में कई तरह के चर्चे आज भी होते हैं। दुनिया का मानना है कि ईदी अमीन मानव भक्षी था, वह आदमी का खून पीता था। जब उसकी आठ साल की तानाशाही समाप्त हुई थी और जब उसका पतन हुआ था तब दुनिया की जनमत युगाडा का हाल जानने के लिए पहुंची थी। दुनिया भर से गयी जांच और अध्ययण टीम को ईदी अमीन के अत्याचार और खूनी शासन के अवशेष देख कर बहुत बडी पीडा हुई थी, उनके होश उड गये थे, उनके शरीर में कपंकपी आती गयी थी। जगह-जगह पर सडी-गली राशों से दुर्गंध आ रही थी, लाशें देख कर लोग डर जाते थे। इसके अलावा जगह-जगह पर सामूहिक कबें मिली हुई थी। ईदी अमीन के राज में युगांडा की पुलिस और सेना विदेशी मूल के लोगों की हत्याएं कर सामूहिक कब्रों में जमींदोज कर देती थी। कितुं-परंतु से परे दुनिया यह मानती है कि ईदी अमीन वास्तव में एक राक्षस था, कसाई था, वह मानव भक्षी था और मानव का खून पीता था। ईदी अमीन ने अपने ही देश के लाखो लोगों का खून किया था। 
अभी-अभी एक राक्षस और कसाई की पदवी  धारण किये हुए तानाशाह की खूब चर्चा हो रही है, लोकतांत्रिक नायकों ने उस तानाशाह की मौत पर खूब खुशियां मनायी है, उसकी राक्षस और कसाई मनोवृति की दुनिया में खूब चर्चा हुई है, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि तानाशाहों और शासकों की ऐसी मनोवृति को सबक और सीख के तौर पर लेने की अपील की गयी है। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि वह राक्षस और कसाई मनोवृति का तानाशाह कौन था, जिसकी मौत पर लोकतांत्रिक सेनानियों ने खुशियां मनायी है। वह राक्षस और कसाई मनोवृति का तानाशाह और कोई नहीं बल्कि चीन का पूर्व प्रधानमंत्री ली पेंग था जिसकी अभी-अभी चीन में मौत हुई हुई है। 90 साल की उम्र में ली पेंग की मौत हुई है, कई साल से वह गंभीर बीमारियों का दंड भोग रहा था। उसकी राक्षसी और कसाई मनोवृति से दुनिया कांप उठी थी। खास कर लोकतांत्रिक समूह उसकी राक्षस और कसाई मनोवृति को याद कर आज भी कांप जाते हैं। हालोंकि उसकी राक्षसी-कसाई मनोवृति से जुडी घटना के वर्षो-वर्ष गुजर गये हैं। फिर उसकी राक्षसी मनोवृति दुनिया की नजरों से ओझल नहीं हुई है।
ली पेंग को '' बुचर और बीजिंग '' कहा जाता था। यानी बीजिंग के कसाई के नाम से ली पेंग कुख्यात था। वह चीन का प्रधान मंत्री था। 1989 में उस पर राक्षसी और कसाई मनोवृति से छात्रों के लोकतांत्रिक आंदोलन को कुचलने का आरोप था। चीन में लोकतंत्र की मांग करने को लेकर लाखों छात्र बीजिंग में सडक पर बैठे थे। ये छात्र निहत्थे थे। इनकी मांग कम्युनिस्ट शासन से मुक्ति और लोकतांत्रिक शासन की स्थापना थी। कम्युनिस्ट तानाशाही जहां भी होती है वहां पर जन का अर्थ गौण हो जाता है। धरणा-प्रदर्शन दंड और जेल के पर्याय बन जाते हैं। जनता का मौलिक अधिकार जो दुनिया के लोकतंत्र में सुरक्षित होता है वह मौलिक अधिकार कम्युनिस्ट तानाशाही में होता नहीं। चीन मे माओत्से तुंग ने कम्युनिस्ट तानाशाही की नींव डाली थी। माओत्से तुग ने अपनी तानाशाही में अपनी जनता को ही भूख से मरने के लिए विवश किया था। माओत्से तुंग की तानाशाही का अध्ययण करने वाले विचारकों का मानना है कि माओत्से तुग ने चीन के अंदर में 10 करोड लोगों का खून किया था। ताओत्से तुंग का कहना था कि सत्ता बन्दूक की गोली से निकलती है। 
ली पेंग भी माओत्से तुंग की तानाशही के सहचर थे। ली पेंग पर भी माओत्से तुंग की खूनी मनोवृति हावी रहती थी। ली पेंग ने शांति पूर्ण छात्रों के आंदोलन को कुचलने के लिए 20 मई 1989 को मार्शल लाॅ की घोषणा की थी।  छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलन को क्रांति  विरोधी बगावत करार दिया था। शांति पूर्ण ढंग से आंदोलन कर रहे छात्रों पर मिसाइलों से हमला किये गये थे, चीन की रेड आर्मी टैंकों से हमला की थी, रेल लाइनों पर धरणा दे रहे छात्रों पर रेलें चलायी गयी थी और रेलों से कुचला गया था। दुनिया के इतिहास में ऐसा और कोई उदाहरण नहीं है जब शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन कर रहे छात्रों पर शासकों ने मिसाइलों से हमले किये हों, टेंकों से हमले किये थे। कहा जाता है कि इस कार्रवाई में करीब 20 हजार से अधिक छात्रों को मौत का घात उतार दिया गया था। हजारों छात्रों को गायब कर दिया गया था। सिर्फ इतना ही नही बल्कि लाखों छात्रों को गिरफ्तार कर जेलों में डाला गया था। यह भी कहा जाता है कि जेलों के अंदर ही अन्य हजारों छात्रों को बर्बर यातनाएं देकर मारा गया था। मारे गये छात्रों के परिजनों को भी कई वर्षो तक चीन ने प्रताडित कया था। ध्यान रखने योग्य बातें यह है कि ली पेंग 1998 तक चीन का प्रधान मंत्री था। इस बर्बर, राक्षसी और कसाई पूर्ण कार्रवाई के लिए ली पेंग की हिसक, राक्षसी और कसाई मनोवृति को जिम्मदार माना गया था। सबसे बडी बात यह थी कि अपनी करतूत को लेकर ली पेंग हमेशा अपने आप को सही ठहराते रहा था, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी भी इस नरसंहार को हमेशा जायद ठहराते रही है। चीन में आज भी कम्युनिस्ट तानाशाही पसरी हुई है। अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है, कम्युनिस्ट तानाशाही के खिलाफ करने पर सीधे जेल और जेल में सडा कर मृृृत्यु का दंड दिया जाता है।
दुनिया में अभी भी ऐसे शासकों की कमी नहीं है जो अपनी तानाशाही के नाम पर न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करते हैं बल्कि राक्षसी मनोवृति भी अपनाते हैं। दुनिया के एक तिहाइ्र्र देशों में आज भी तानाशाही पसरी हुई है, जहां पर लोकतंत्र की संभावना अभी नहीं है। राक्षसी मनोवृति के तानाशाहों की करतूतों के खिलाफ दुनिया के जनमत को और भी समर्पण दिखाने की जरूरत है। ईदी अमीन ओर लीं पेंग जैसे तानाशाहों की राक्षसी प्रवृतियां दुनिया में फिर सामने न आये, इसकी गारंटी कौन दे सकता है?