राष्ट्रपति शासन की ओर बंगाल
June 10, 2019 • देवानंद राय
(देवानंद राय)
चुनाव के आरंभ से लेकर चुनाव के बाद तक हिंसा में बंगाल अभी भी जल रहा है। वर्तमान में बंगाल में जो कुछ हो रहा है इसे देख कर तो लगता है कि बंगाल धीरे-धीरे राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है। बेलगाम हिंंसा,बमबाजी चुनाव जीतने के बाद भी चुनावी झड़प से ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को खुली छूट दे रखी है। बंगाल में अराजकता फैलाने की।इन सब के बावजूद भी ममता जी केंद्र से भी तनाव भरे रवैया जारी रख रही है।हाल ही में ममता जी ने नीति आयोग के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया। 15 जून को नई दिल्ली में नीति आयोग की बैठक होनी है जिसमें केंद्र ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्री तथा नीति आयोग के सदस्य व केंद्रीय मंत्रियों को बुलाया है।नीति आयोग की स्थापना 1 जनवरी 2015 को हुई थी। हाल ही में प्रधानमंत्री ने नीति आयोग का पुनर्गठन किया और राजीव कुमार को नीति आयोग के उपाध्यक्ष पद पर बनाए रखा है। शपथ ग्रहण समारोह में ना आना फिर देश के सबसे बड़े थिंक टैंक नीति आयोग के आमंत्रण को इस प्रकार से तिरस्कृत करना,ममता जी ने तो मानो केंद्र और राज्य संबंधों में एक नया घमासान छेड़ रखा है ।इन सब के पीछे कारण यह है कि चुनाव से पहले ममता जी को लगता था कि भाजपा बंगाल में पैठ बना रही है। पर चुनावी नतीजों ने उनके सारे समीकरण ध्वस्त करते हुए यह बताने की पुरजोर कोशिश की है कि अब जल्द ही पूरा बंगाल बोलेगा राजतिलक की करो, तैयारी आ रहे हैं भगवाधारी ।2014 में बीजेपी को बंगाल में मात्र 2 सीट ही मिली थी जो 2019 में बढ़कर 18 हो गई 2014 में बीजेपी का वोट शेयर मात्र 9% था जो 2019 में बढ़कर 40.5% हो चुका है| यह आंकड़े बताते हैं की असली दिक्कत कहाँ हो रही है ? तो वहीं तृणमूल कांग्रेस की 2014 में 34 लोकसभा सीटें थी जो अब घटकर 22 हो चुकी है| बीजेपी का इस तरीके से राज्य में बढ़ना ममता जी को परेशान कर रखा है जिसकी बौखलाहट उनके हर निर्णय में दिख रही है।पहले चुनावी सभा पर रोक फिर अब चुनाव बाद विजय जलूस निकालने पर भी रोक लगाकर।ममता जी लोकतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सीधे तौर पर गला घोट रही है। इन सब मुद्दों पर विपक्ष की चुप्पी भी काफी संदेह उत्पन्न कर रही है।परंतु यह सब अब ज्यादा दिन नहीं चलने वाला जिस प्रकार से डूबते जहाज में भगदड़ मचती है ठीक उसी प्रकार तृणमूल कांग्रेस में भगदड़ मच चुकी है। चुनाव से पहले 40 विधायक बीजेपी के संपर्क में थे चुनाव परिणाम बात तो विधायक से लेकर पार्षद तक बीजेपी में शामिल होने का सिलसिला शुरू कर चुके हैं यहां तक कि नगरपालिका में भी बीजेपी आने लगी है वर्तमान स्थिति यह है कि दार्जिलिंग नगर निगम के 30 में से 17 पार्षद भाजपा में आ चुके हैं। भाटपाड़ा पश्चिम बंगाल की पहली नगर निगम थी जहां पर बीजेपी ने अपना कब्जा जमाया था उसके बाद नैईहाटी और अब दार्जिलिंग। यह हालात बता रहे हैं कि हवा का रुख किधर है और बंगाल क्या चाहता है ?ममता जी ने अपने डूबती हुई राजनीतिक नया को बचाने के लिए अब प्रसिद्ध राजनैतिक सलाहकार तथा रणनीतिकार के रूप में प्रसिद्ध प्रशांत किशोर का सहारा लिया है। ममता जी यह भली-भांति समझ चुकी है कि बीजेपी की असली ताकत संघ है। संघ ने बीते कुछ वर्षों में अपने भीतर उल्लेखनीय परिवर्तन लाया है और वह भारतीय संस्कृति का रक्षक और भारतीय परंपरा का ध्वजवाहक बनकर उभरा है।यही भारतीय जनता पार्टी को असली शक्ति देते हैं।यही कारण है कि ममता जी ने हाल ही में दो नए संगठन  बनाएं जय हिंद वाहिनी और बंग जनानी वाहिनी। जय हिंद वाहिनी जैसा कि नाम से ही जय हिंद का संबंध सुभाष चंद्र बोस से है और इस वाहिनी का बनाने का मुख्य उद्देश्य पश्चिम बंगाल के लोगों को सुभाष चंद्र बोस स्वामी और विवेकानंद से फिर से जोड़ना है। परंतु ममता जी मुस्लिम तुष्टीकरण के चक्कर में न पड़कर। यह काम अगर आप पहले कर देती तो बेहतर होता अब अपनी राजनीतिक साख में गिरावट देखकर बंगाल की अस्मिता याद आ रही है। जनता भी आपके इस दोहरे चाल को ठीक से समझ रही है। हाल ही में हुई उत्तर 24 परगना में हिंसा जिसमें 8 लोगों के मारे जाने और 18 लोगों के लापता होने की खबर आई है जो बतलाती है कि राज्य में कानून व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त होने के कगार पर हैं। लोकतंत्र में वैचारिक टकराव सामान्य बात है परंतु विचारों की लड़ाई का हिंसा में बदल जाना बिलकुल ही असामान्य और अमान्य है। ममता जी ने बीजेपी के लड़ाई के चक्कर में देश के संवैधानिक संस्थाओं और परंपराओं को तिरस्कृत करने से लेकर राजनीतिक शिष्टाचार में अमर्यादित बोल भी बोलने लगी है। गृह मंत्रालय की एडवाइजरी बता रही है कि अब सब कुछ राज्य में ठीक नहीं है। राज्य में संवैधानिक व्यवस्था विफल होने की ओर बढ़ रही है।जहां मुख्यमंत्री खुद ही अपने पार्टी के लोगों को अराजकता के लिए प्रेरित करते हैं उन्हें सही ठहराते हो बजाय इसके कि वे अपने बेलगाम कार्यकर्ताओं को अनुशासन का पाठ पढ़ाएं। ऐसे हालात में राष्ट्रपति अगर अनुच्छेद 356 का प्रयोग करें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा ? क्योंकि पूरा देश देख रहा है किस प्रकार बंगाल के हालात बेकाबू होते जा रहे हैं| अभी भी समय है ममता जी अपने कार्यकर्ताओं को अनुशासित करें ना कि हर बार हिंंसा की तैयारी में लगे रहें अन्यथा जनता अगले चुनाव में उन्हें अनुशासन में रहना सिखा देगी। "पोरिबोरतन चाई"इस नारे के दम पर ममता जी आपने 33 वर्षो से एकछत्र शासन करते आ रहे वामपंथी को बंगाल की सत्ता से उखाड़ फेंका था। अब अगर आप और आपकी पार्टी के कार्यकर्ता अपने भीतर परिवर्तन नहीं लाते हैं। तो पूरा बंगाल नए परिवर्तन की चाह में जनता बीजेपी के साथ होकर सत्ता में परिवर्तन ला देगी