लालकिले की प्राचीर से जनसंख्या नियंत्रण का संदेश
August 18, 2019 • डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
       (डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा)
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 73 वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से जो तीन प्रमुख मुद्दे उठाए हैं उनमें से जनसंख्या विस्फोट अपने आप में एक महत्वपूर्ण व समय की मांग है। आजादी के बाद से ही जनसंख्या वृद्धि को लेकर सरकार चिंतित रही है। एक समय था जब हम दो हमारे दो के स्लोगन की फिल्में गली मोहल्लों व सिनेमा गृहों में प्रमुखता से दिखाई जाती थी। इसमें कोई दो राय नहीं की जनसंख्या वृद्धि दर पर कुछ हद तक अंकुश लगा है। अब तो पढ़ा लिखा ही नहीं गांव का समझदार परिवार भी सीमित परिवार के महत्व को समझने लगा है पर परिणाम ज्यादा उत्साहित करने वाले नहीं लग रहे हैं। भारत ही नहीं दुनिया में आबादी की रफ्तार कुछ ज्यादा ही तेजी से बढ़ रही हैं। वैश्विक जनसंख्या वृद्धि पर संयुक्त राष्ट्र् संघ की हालिया रिपोर्ट ना केवल चिंतनीय है अपितु दुनिया के देशों को समय रहते ठोस प्रयास करने की और साफ इशारा भी कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार 2019 में दुनिया की आबादी 7.7 अरब है जो 2050 तक 9.7 और 2100 तक 11 अरब तक पहुंचने की संभावना व्यक्त की जा रही है। वहीं माना जा रहा है कि हमारे देश की आबादी 2027 तक चीन को पीछे छोड़ देगी। माना जा रहा है कि इस सदी के अंत तक हमारे देश की आबादी 150 करोड़ को पार कर जाएगी वहीं चीन द्वारा किए जा रहे ठोस प्रयासों के परिणाम स्वरुप चीन अपनी आबादी को 110 करोड़ की सीमा पर रखने में सफल हो जाएगा।
प्रधानमंत्री के उद्बोधन से साफ संकेत मिल रहा है कि जनसंख्यर नियंत्रण के लिए सरकार कोई ठोस कदम उठाने की तैयारी में है। इस बात का अहसार कांग्रेस सहित विरोधी दलों को भी होने लगा है। यह दूसरी बात है कि जनसंख्या नियंत्रण को लेकर आने वाले कदम कैसे होंगे यह भविष्य के गर्भ में है पर लगता है जनसंख्या नियंत्रण को लेकर सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदमों को समर्थन विपक्षी दलों का भी मिलेगा। इसके संकेत मिलने लगे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए पूर्वर्व्ती सरकारों द्वारा प्रयास किए जाते रहे हैं। छोटे परिवार की अहमियत समझाने के लिए देशव्यापी जागृति अभियान चलाए जाते रहे हैं। कई आयोग व समितियां ग़िठत हुए हैं। अच्छे सुझाव भी आए हैं पर उन पर ठोस क्रियान्वयन नहीं हो पाया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इमरजेंसी के दौरान स्व. संजय गांधी ने जो अभियान चलाया और परिवार नियोजन खासतौर से नसबंदी पर जिस तरह का जोर दिया गया, इमरजंेसी के तत्काल बाद जबरन नसबंदी को मुद्दा बनाया गया पर इसके परिणामों को देखने के बाद कांग्रेस इतर दलों ने भी इसे सराहा। क्योंकि जनसंख्या नियंत्रण तब भी आवश्यकता थी और आज भी आवश्यकता है। इसके साथ ही अब नागरिकों में समझ में आने लगा है कि बड़ा परिवार विकास में बाधक है। 1990 की जन्म दर 3.2 से घटकर आज 2.5 हो गई है और माना जा रहा है कि आने वाले समय में इसमें तेजी से कमी आएगी।  
जनसंख्या नियंत्रण के लिए सरकार को कार्य योजना बनाने के लिए किसी अध्ययन की भी आवश्यकता इस मायने में नहीं है कि पुरानी रिपोर्टों को ही सही तरीके से लागू कर दिया जाए तो उत्साहवर्द्धक परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। 1991 की करुणाकरण रिपोर्ट में सुझाए गए सुझावों में से एक जनप्रतिनिधियांे लिए अनिवार्यतः यह शर्त रखने का सुझाव था कि उनके दो से अधिक बच्चे ना हो। यह सिफारिश सिरे से नही चढ़ी, मात्र औपचारिकता के लिए राजस्थान सहित कुछ प्रदेशों में पंचायतों और स्थानिय निकाय के चुनावों में यह शर्त अवश्य लागू की गई। इसके परिणाम सामने हैं। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि पिछले दशक में जनसंख्या वृद्धि दर में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। दरअसल दुुनिया के देशों में गरीबी, अशिक्षा, भूखमरी, असमानता, स्वास्थ्य जैसी चुनौतियों का बड़ा कारण जनसंख्या में बढ़ोतरी है। जनसंख्या वृद्धि के साथ कई समस्याएं जुड़ी हुई है। प्राकृतिक संसाधनों की भी अपनी सीमा है। एक समय था जब शक्ति प्रदर्शन का प्रमुख माध्यम परिवार के सदस्यों की संख्या से मापा जाता था पर अब तेजी से बदलाव आया है। आज सरकार की प्राथमिकता सभी नागरिकों को गरीबी रेखा से उपर लाने, पूरा भोजन, पानी, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना प्राथमिकता है। यह सब सुविधाएं सीमित परिवार पर ही संभव है। ऐसे में सरकार के साथ ही आमनागरिकों को भी सोचना और ठोस निर्णय लेना होगा। जिस तरह से इमरजेंसी के दौरान सख्ती की गई वैसी स्थिति नहीं आनी चाहिए। बल्कि जनसंख्या नियंत्रण को धार्मिक दायरों से अलग हटकर देखना होगा नहीं तो जनसंख्या वृद्धि को रोकना संभव नहीं हो सकता। हांलाकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उद्बोधन में ठोस व कारगर कदम छिपे लगते हैं जो आने वाले समय में सबके सामने होंगे। जनसंख्या नियंत्रण समय की मांग है। क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों की एक सीमा है। आज देश के अधिकांश हिस्सों में पीने के पानी की समस्या जगजाहिर है। खेती के लिए भूमि कम होती जा रही है। छोटी जोत और कम आमदनी के कारण खेती से पलायन होने लगा है। सबको शिक्षा-सबको स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के लिए आबादी भी एक सीमा तक होना आवश्यक है। ऐसे में आमनागरिकों और गैरसरकारी संगठनों को खासतौर से आगे आना होगा और सरकार को भी निषेधात्मक कदम उठाने होंगे ताकि धर्म जाति और सबसे खास लेंगिक भेदभाव से उपर उठकर खासतौर से लड़के की चाह में आबादी में बढ़ोतरी रोकने का माहौल बनाना होगा। सरकार और समाज दोनों को ही इस दिशा में आगे आना होगा ताकि आने वाले समय में हमारा देश आबादी की समस्या से जूझता नहीं रहकर विकसित देशों की कतार में अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो सके।