लिव इन रिलेशन खुशियों का खजाना या विनाश का आमंत्रण
September 26, 2019 • बाल मुकुंद ओझा

(बाल मुकुंद ओझा)

लिव इन रिलेशनशिप का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आरहा है। विभिन्न सर्वे रिपोर्ट और अध्ययन के आंकड़े बेबाकी से जाहिर कर रहे है सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी। ताजा प्रकरण राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक अनुषांगिक संगठन की सर्वे रिपोर्ट से उठा है। संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत ने देश की राजधानी दिल्ली में मंगलवार को 29 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों के 465 जिलों की महिलाओं पर एक सर्वे रिपोर्ट जारी की है। सर्वे रिपोर्ट में लिव-इन की तुलना में शादी कर घर बसाने वालीं महिलाओं को ज्यादा खुश बताया गया है। यह सर्वे पुणे स्थित दृष्टि प्रबोधन अध्ययन केंद्र ने कराया है। सर्वे के अनुसार विवाहित महिलाओं में खुशी का स्तर जहां बहुत अधिक था, वहीं लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं में खुशी का स्तर सबसे कम था। इस रिपोर्ट से मत भिन्नता हो सकती है मगर मीडिया में आये दिन नाना प्रकार की बातें उछल कर सामने आ रही है जो लिव इन रिलेशन की धज्जियाँ उड़ाने के लिए काफी है। 
  एक अन्य मीडिया रिपोर्ट में चैंकाने वाला खुलाशा किया गया है की लिव इन रिलेशनशिप की कहानी शारीरिक शोषण से बलात्कार पर जाकर खत्म हो रही है। राष्ट्रीय राजधानी में बलात्कार के जो मामले दर्ज हो रहे हैं उनमें करीब 40 फीसदी ऐसे हैं जो सीधे लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े हैं। साल 2018 में 15 सितंबर तक दुष्कर्म के 1557 मामले दर्ज हुए, वहीं 2019 में इनकी संख्या 1609 तक पहुंच गई है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले पांच साल के आंकड़े जाहिर करते है कि दुष्कर्म के प्रकरणों में ज्यादातर परिचित ही आरोपी होते हैं। करीब 97 फीसदी मामले ऐसे हैं, जिनमें आरोपी, पीड़िता का करीबी जानकार या रिश्तेदार होता है। ऐसे केसों में दोस्त, पिता, परिचित, सहकर्मी, नजदीकी पडोसी और सहपाठी दुष्कर्म के आरोप में गिरफ्तार हुए हैं। ये सभी किसी न किसी रुप में पीड़ित महिलाओं के परिचित होते हैं। दुष्कर्म के सबसे ज्यादा मामले लिव-इन रिलेशनशिप एवं शादी से इनकार करने के चलते दर्ज किए जा रहे हैं। इस साल अभी तक दर्ज हुए दुष्कर्म के मामलों में 35-40 फीसदी तो ऐसे हैं, जिनका सीधा जुड़ाव लिव-इन रिलेशनशिप से रहा है। इन मामलों के दर्ज करने के पीछे बड़ा कारण यह रहा है कि आरोपी युवक द्वारा युवती के साथ विवाह करने से मना कर दिया जाता है। एक बड़ा सच यह भी सामने आ रहा है कि आज विवाह के पवित्र बंधन का झांसा देकर लिव इन रिलेशनशिप दुष्कर्म का जरिया बन रहा है, जिसकी चंगुल में बड़ी संख्या में युवतियां और किशोरियां  फंस रही हैं।
लिव-इन रिलेशन जायज है या नाजायज इस पर लंबे समय से बहस चल रही है। लिव-इन रिलेशन को लेकर भारत में अलग से कोई कानून नहीं हैं। इसलिए आपसी समझ से बने बालिग स्त्री-पुरुष के बीच लिव-इन रिलेशन को नाजायज नहीं ठहराया जा सकता। ये बात कई बार देश की अदालतें साफ कर चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप के हक में एक फैसला सुनाते हुए कहा है कि अगर दो वयस्क व्यक्ति आपसी रजामंदी से शादी के बगैर साथ रहते हैं तो इसमें कुछ गलत नहीं है। यह अपराध नहीं है। साथ रहना जीवन का अधिकार है।
लिव इन रिलेशनशिप का मतलब है बिना विवाह के महिला और पुरुष का एक साथ रहना। पाश्चात्य देशों की नकल पर बना एक विवादास्पद लेकिन आधुनिक लाइफ जीने के लिए यह एक अनूठा और दिलचस्प रिश्ता है जिसमें शादी की पुरानी मान्यता को दरकिनार करते हुए जोड़े साथ रहते है।  लिव-इन रिलेशनशिप की शुरुआत महानगरों के शिक्षित और आर्थिक तौर पर स्वतंत्र ऐसे लोगों ने की थी जो विवाह संस्था की जकड़ से छुटकारा चाहते थे और उसी तरह से अपनी जिम्मेदारी एक दूसरे के लिए निभाते है जैसे वो शादी करने के बाद करते। इन संबंधों में खास बात यह है की वे किसी नैतिक दवाब का सामना नहीं करते। ऐसे लोग जब चाहे तभी एक दुसरे से अलग हो सकते है।
विवाह को हमारे देश भारत में धार्मिक भावना से जोड़कर देखते है जिसमे अपने जीवनसाथी के साथ जीवनभर के लिए वफादार रहने का प्रण लेते है और इसे इतना पवित्र और खास समझे जाने के पीछे महिला की सुरक्षा निहित है। लिव इन की खिलाफत करने वाले कहते है  ज्यादातर लिविंग रिलेशन उन युवाओं में पाए गए हैं जो घर से दूर रह रहे हैं। उनके परिवार वालों को इस रिश्ते की कोई खबर नहीं होती। लिविंग रिलेशन में रह रहे लड़के-लड़कियां अपने मां-बाप या घरवालों से अपने रिश्ते को छुपाकर रखते हैं। जब रिश्ता बिगाड़ की श्रेणी में आजाता है तब इसका भांडा फूटता है। भारत का समाज रिश्तों के कई डोर में बंधा हुआ है जो ऐसे रिश्तों को जायज नहीं मानता। 
संघ की सर्वे रिपोर्ट से जाहिर है विवाह की डोर से बंधी महिला ज्यादा खुश है बनिस्पत लिविंग रिलेशन के। बहरहाल जिस तेजी से जमाना बदल रहा है वह हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक व्यवस्था पर चोट पहुँचाने वाला तो है मगर देखने वाली बात  यह है हमारे युवा अपनी खुशियों को कैसे एक दूसरे में बाँट कर समाज के साथ साथ अपने रहन सहन को सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक तौर मजबूती प्रदान करते है।