लोकतंत्र के महापर्व का शंखनाद
March 10, 2019 • राकेश रमण
लोकतंत्र के महापर्व का हो गया शंखनाद। बज गई रणभेरी। सत्ता प्राप्त करने के लिये होनेवाली सियासी दौड़ को चुनाव आयोग ने औपचारिक तौर पर दिखा दी हरी झंडी। इसके साथ ही तत्काल प्रभाव से लागू हो गया माॅडल कोड आॅफ कंडक्ट। चुनाव आयोग ने कर दिया ऐलान कि सात चरणों में होगे लोकसभा के चुनाव। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने की लोकसभा चुनाव के तारीखों की घोषणा। पहले चरण का मतदान 11 अप्रैल को, दूसरे चरण का 18 अप्रैल, तीसरे चरण का 23 अप्रैल को, चैथे चरण का 29 अप्रैल को, पांचवें चरण का छह मई को, छठे चरण का 12 मई को और सातवें व अंतिम चरण के लिये 19 मई को होगा मतदान। 23 मई को वोटों की गिनती के बाद सामने आ जाएंगे चुनावी नतीजे। हालांकि इस बार 20 साल के बाद ऐसा हुआ, जब मार्च के शुरुआती आठ दिनों में लोकसभा चुनाव का कार्यक्रम घोषित नहीं किया गया। इससे पूर्व 2004, 2009 और 2014 में 29 फरवरी से 5 मार्च के बीच ही चुनाव की तारीखें घोषित हो गई थीं। अगर चुनाव का ऐलान करने में हुई देरी की बात करें तो वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव का कार्यक्रम 4 मई को घोषित हुआ था। लेकिन इस बार जो देरी हुई उसकी वजह रही सरहद पर अशांति के बीच जम्मू-कश्मीर में निष्पक्ष व शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने की चुनौती। इस बार जम्मू-कश्मीर में चुनाव पांच चरणों में सम्पन्न होगा। उम्मीद की जानी चाहिये कि चुनाव आयोग की सफलता का इतिहास एक बार फिर दोहराया जाएगा। दूसरी ओर चुनाव आयोग द्वारा लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान किये जाने के साथ ही अब देश में चुनाव आचार संहिता भी लागू हो गई है। सही मायने में पूछा जाये तो आचार संहिता का सीधा मतलब नेताओं और राजनीतिक दलों पर नकेल डालना ही है। हालांकि आचार संहिता के नियम सभी राजनीतिक दलों पर एक समान ही लागू होते हैं लेकिन खास तौर से सत्तारुढ़ पार्टी के लिए चुनाव आचार संहिता लागू होने का साफ मतलब यही है कि अब वह सियासी लाभ के लिये सत्ता की शक्ति का उपयोग नहीं कर सकती है। भारतीय निर्वाचन आयोग की आदर्श चुनाव आचार संहिता यानि मॉडल कोड आफ कंडक्ट राजनीतिक दलों एवं प्रत्याशियों के लिये बनायी गयी एक नियमावली है जिसका पालन चुनाव के समय आवश्यक है। यह सरकार, राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों तथा जनता को दिये गये निर्देश हैं, जिसका पालन चुनाव के दौरान किया जाना जरूरी है। चुनाव आचार संहिता चुनाव की तिथि की घोषणा से लागू होता है और यह मतदान के अंतिम चरण के समाप्त होने के साथ समाप्त हो जाता है। हालांकि चुनाव आचार संहिता को संविधान में वर्णित नही किया गया है, लेकिन यह एक क्रमशः प्रक्रिया का परिणाम है। इसके सूत्रधार रहे हैं भारत के दसवें चुनाव आयुक्त टीएन शेषन। शेषन के कार्यकाल में स्वच्छ एवं निष्पक्ष चुनाव सम्पन्न कराने के लिये नियमों का कड़ाई से पालन किया गया जिसके कारण तत्कालीन केन्द्रीय सरकार के संचालकों एवं कई ढीठ नेताओं के साथ इनके काफी विवाद भी हुए। वर्ष 1990 में टीएन शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के पहले तक निर्वाचन आयोग की भूमिका से आम आदमी काफी हद तक अपरिचित था लेकिन शेषन ने इसे जनता के दरवाजे पर ला खड़ा किया। इससे जनता की उम्मीदें और बढ़ीं। इसे और गतिशील और पारदर्शी बनाने के लिए इसका स्वरूप बदलने की जरूरत महसूस की गई और इसे बदला भी गया। अब आचार संहिता लागू हो जाने के बाद चुनाव के दौरान कोई भी मंत्री सरकारी दौरे को चुनाव के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता। सरकारी संसाधनों का किसी भी तरह चुनाव के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यहां तक कि कोई भी सत्ताधारी नेता सरकारी वाहनों और भवनों का भी चुनाव के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता। केंद्र सरकार हो या किसी भी प्रदेश की सरकार, वह न तो कोई घोषणा कर सकती है, न शिलान्यास, न लोकार्पण और ना ही भूमिपूजन। सरकारी खर्च से ऐसा कोई भी आयोजन नहीं हो सकता, जिससे किसी दल विशेष को लाभ पहुंचने की संभावना हो। इस पर नजर रखने के लिए चुनाव आयोग पर्यवेक्षक नियुक्त करता है। साथ ही मत पाने के लिए रिश्वत देना अथवा मतदाताओं को परेशान करना पूरी तरह मना है। यहां तक कि व्यक्ति टिप्पणियां करने पर भी चुनाव आयोग कार्रवाई कर सकता है। किसी की अनुमति के बिना उसकी दीवार या भूमि का किसी भी तरह से उपयोग नहीं किया जा सकता। इसके अलावा मतदान के दिन मतदान केंद्र से सौ मीटर के दायरे में चुनाव प्रचार पर और मतदान से एक दिन पहले किसी भी बैठक पर रोक लग जाती है। वास्तव में देखा जाए तो चुनाव आचार संहिता चुनाव आयोग के बनाए वो नियम हैं, जिनका पालन हर पार्टी और हर उम्मीदवार के लिए जरूरी है। इनका उल्लंघन करने पर सख्त सजा हो सकती है। चुनाव लड़ने पर रोक लग सकती है। एफआईआर हो सकती है और उम्मीदवार को जेल जाना पड़ सकता है। आम तौर पर आचार संहिता का पहली बार उल्लंघन करने पर चेतावनी दी जाती है,  दूसरी आर नियम तोड़ने पर चुनाव प्रचार से बाहर किया जा सकता है और अगर फिर भी आचरण में सुधार नहीं आया और आचार संहिता की अनदेखी जारी रही तो उम्मीदवारी रदद् होने के अलावा जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है। लिहाजा आवश्यक है कि सभी सतर्क रहें और व्यवस्था का सम्मान करते हुए इसमें सहभागी बनें। चुनाव सिर्फ सत्ता हस्तांतरण का सामान्य जरिया ही नहीं है। यह लोकतंत्र का महापर्व है। यह हर खासोआम को एक समान होने का एहसास कराता है और यह भी महसूस कराता है कि उसके वोट से ही देश और समाज की भावी दशा-दिशा तय होगी। लिहाजा आवश्यक है कि पूरी पवित्रता, शुचिता और इमानदारी के साथ सभी इसमें सहभागी बने और अपनी भूमिका निभाएं। मतदान सिर्फ अधिकार ही नहीं है बल्कि बहुत बड़ा दायित्व भी है। हर वोट बहुत कीमती है और सबके वोटों का वजन भी एक समान ही है। चाहे प्रधानमंत्री का हो या आम आदमी का। सबके मत का मान एक समान है। यह मौका है अपने हिस्से के भारत को अपने मुताबिक गढ़ने की दिशा में सोच समझकर कदम को आगे बढ़ाने का। इस महापर्व का महाउत्सव मनाने की आज से शुरूआत हो गई है और अब अगले पौने दो महीने तक लोकतंत्र का यह महोत्सव अनवरत चलनेवाला है।