लोकतंत्र पर गहराया कालेधन का साया
March 27, 2019 • बाल मुकुन्द ओझा

(बाल मुकुन्द ओझा)

भारत दुनियां का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है। हमें अपने लोकतंत्र पर गर्व की अनुभूति होती है। मगर लोकतान्त्रिक संस्थाओं के चुनावों ने हमारे इस गर्व को चूर चूर करके रख दिया है। इसका एक बड़ा कारण इन चुनाव में काले धन के बेहताशा खर्च पर है। भारत चुनाव आयोग की लाख चेष्टाओं के बाद भी चुनावों में बेहिसाबी धन के खर्चे पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है। यह धन सफेद और काला दोनों है। चुनाव सुधार की बातें हम एक अरसे से सुनते आये है मगर यह सुधार कागजों से आगे नहीं बढ़ पाया है। चुनाव में काला धन खर्च कर जीतने वाला प्रत्याशी अपने धन की उगाही में सदा सर्वदा जुटा रहता है। उसे अपने अगले चुनाव की चिंता सताए रहती है। भारत में गैरकानूनी तरीके से कमाए गए काले धन को कई तरह से ठिकाने लगाया जाता है जिसमें जमीन जायदाद का कारोबार और चुनाव प्रचार जैसे तरीके भी शामिल हैं। चुनाव में पैसा और दारू के अनुचित प्रयोग के साथ गरीब मतदाताओं के वोट खरीदना आम बात हो गयी है।

भारत की 60 फीसदी आबादी रोजाना 210 रुपये से कम की आमदनी में अपना गुजारा करती है। एक अनुमान के मुताबिक 2019 के आम चुनाव में प्रति वोटर 560 रुपये खर्च होने जा रहा है। भारत आर्थिक तौर पर एक विकासशील देश है, लेकिन चुनावी खर्च के मामले में वह अमेरिका और ब्रिटेन जैसे कई विकसित देशों को पीछे छोड़ने जा रहा है। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के मुताबिक 11 अप्रैल से 19 मई तक सात चरणों में संपन्न होने जा रहे 2019 के लोकसभा चुनाव में 50 से 60 हजार करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।
करीब 42 दिन चलने वाले इन चुनावों में 543 लोकसभा सीटों के लिए करीब 90 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। इस महाचुनाव में वोट डालने के लिए 11 लाख इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की आवश्यकता होगी और करीब 10 लाख मतदान केंद्र स्थापित किए जाएँगे। इस विशाल चुनावी कवायद में सरकारी खजाने के करोड़ों रुपए खर्च होना स्वाभाविक है। लेकिन पार्टियों व उम्मीदवारों द्वारा किए जाने वाले बेतहाशा खर्च की प्रमुख वजहों में सोशल मीडिया, विशालसभाएं, जनसम्पर्क, आवागमन, रैलियाँ और प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विज्ञापन का बढ़ा हुआ खर्च है। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के एक अध्ययन के अनुसार 2014 की चुनावी प्रक्रिया में 30 हजार करोड़ रुपये खर्च किये गए जो देश के इतिहास का सबसे महंगा चुनाव साबित हुआ। इसमें केंद्र सरकार और चुनाव आयोग ने सात से आठ हजार करोड़ रुपये खर्च किये थे। इसका अर्थ ये हुआ कि चुनाव में हुआ 75 फीसद खर्च, काले धन से पूरा किया गया। चुनाव आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार 2014 के आम चुनाव के दौरान 300 करोड़ रुपये की अवैध राशि जब्त की गई, जबकि 17 हजार किलोग्राम नशीले पदार्थ पकड़े गए।
एक अध्ययन के अनुसार विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा सोशल मीडिया पर इस बार 5000 करोड़ रुपए तक खर्च किए जा सकते हैं, जबकि पिछले लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया पर मात्र 250 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे। आजकल के चुनावों में बेहिसाब अनैतिक खर्च का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1952 में हुए पहले आम चुनाव का खर्च 10 करोड़ से भी कम आया था, यानी प्रति मतदाता करीब 60 पैसे का खर्च। हालाँकि उस समय यह रकम मामूली नहीं थी, लेकिन गैर-सरकारी आँकड़ों के मुताबिक आज विभिन्न दलों की ओर से 50-55 करोड़ रुपए मात्र एक संसदीय सीट में बहा दिए जाते हैं।
शुरु के कुछ आम चुनावों तक दिग्गज उम्मीदवार भी बैलगाड़ियों, साइकलों, ट्रैक्टरों पर प्रचार करते थे। उम्मीदवार की आर्थिक मदद खुद कार्यकर्ता किया करते थे। लेकिन आज के नेता हेलिकॉप्टरों या निजी विमानों से सीधे रैलियों में उतरते हैं और करोड़ों रुपए खर्च करके लाखों लोगों की भीड़ जुटाते हैं। उस समय पैदल यात्रा का भी अपना आकर्षण था। समाजवादी और साम्यवादी नेता साईकिल और बैलगाड़ियों पर संपर्क करते थे। समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया को अपने उम्मीदवारों का प्रचार बैलगाड़ी पर करते देखा जा सकता था। सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं के पास अवश्य कार देखी जा सकती थी। नेता अपनी गांठ से खाना खाते थे अथवा किसी कार्यकर्ता के यहाँ विश्राम कर वहीँ भोजन करते थे। आज किसी बड़े होटल में रुकते है और निजी विमान से प्रचार करते है।
चुनाव नियम के मुताबिक एक उम्मीदवार लोकसभा चुनाव में 50 लाख से 70 लाख रुपए तक खर्च कर सकता है। विधानसभा चुनाव के लिए यह सीमा 20 लाख से 28 लाख रुपए के बीच है। यह खर्च उस राज्य पर भी निर्भर करता है जहाँ से उम्मीदवार चुनाव लड़ रहा है। फिर भी इनका घोषित खर्च वास्तविक खर्च का 10 प्रतिशत भी नहीं बैठता। हाल ही में संपन्न हुए मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में विधानसभा चुनाव के दौरान कालेधन की व्यापक पैमाने पर हुयी धरपकड़ के आंकड़े बताते हैं कि नोटबंदी के बावजूद चुनाव में धनबल के उपयोग में कमी आने के बजाय इजाफा ही हुआ है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, इन राज्यों में पिछले चुनाव की तुलना में जब्त की गयी अवैध धनराशि में भारी वृद्धि हुई है।