विश्व धरोहर में शामिल जयपुर परकोटे के भी होंगे ठाठ
July 8, 2019 • बाल मुकुन्द ओझा

(बाल मुकुन्द ओझा)

विश्व विरासत के स्थल किसी भी राष्ट्र की सभ्यता और उसकी प्राचीन संस्कृति के महत्त्वपूर्ण परिचायक माने जाते हैं। हमारी आन बान और शान के प्रतीक जयपुर शहर को यूनेस्को की विरासत में शामिल करने के लिए काफी दिनों से प्रयास किये जा रहे थे जो अब जाकर फलीभूत हुए है। आशा की जाती है की ऐतिहासिक शहर जयपुर अब विश्व पटल पर अपनी छाप छोड़ने में सफल होगा।
महाराज सवाई जयसिंह द्वारा 1727 में स्थापित जयपुर शहर को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज घोषित कर दिया गया है। यह ऐलान यूनेस्को ने शनिवार को किया। गुलाबी नगर के नाम से मशहूर राजस्थान की राजधानी जयपुर के परकोटे को शामिल करने के बाद यूनेस्को की सूची में भारत के धरोहरों की संख्या 38 हो गई है । जयपुर के परकोटे और पुराने शहर की दुनिया में अलग और अनूठी पहचान है। अपनी वास्तुकला की शानदार विरासत और जीवंत संस्कृति के लिए मशहूर प्राचीन शहर जयपुर देश का दूसरा शहर बना, जो विश्व धरोहर की सूची में शामिल हुआ है। इससे पहले केवल अहमदाबाद को ही यह गौरव मिला था। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि जयपुर संस्कृति और वीरता से जुड़ा शहर है। जयपुर का भव्य और ऊर्जावान आतिथ्य सभी लोगों को आकर्षित करता है। खुशी है कि इस शहर को यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल की सूची में शामिल किया गया है।
महाराज सवाई जयसिंह ने 1727 में जयपुर की नींव रखी। चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरे आमेर में राज्य विस्तार मुश्किल था। जनसंख्या बढ़ रही थी और पेयजल के स्रोत भी कम थे। उधर दिल्ली में मुगलों का शासन कमजोर पड़ रहा था। ऐसे में जयसिंह ने अपने राज्य को शक्तिशाली बनाने के लिए राजधानी को स्थानांतरित करने पर विचार किया। चूंकि धन के अथाह भंडार उपलब्ध थे इसलिए वास्तु और भारतीय शिल्पशास्त्र के आधार पर एक ऐसा नगर बसाने की योजना बनाई गई जो सुरक्षित, समृद्ध, सभी सुविधाओं से लैस और खूबसूरत हो। शिल्पशास्त्र और वास्तु के ज्ञाता विद्याधर को यह जिम्मेदारी दी गई और जयपुर का निर्माण आरंभ हो गया।
गौरतलब है जयपुर परकोटा की ज्यादातर इमारतों का निर्माण महाराज जयसिंह द्वितीय ने ही कराया। इनमें मुख्य महल सिटी पैलेस, गोविंददेवजी मंदिर और जंतर मंतर प्रमुख है। जंतर मंतर अब विश्व विरासत में शामिल है। .जयपुर का परकोटा करीब 9 वर्ग मील में फैला हुआ है। इसकी ऊंचाई 30 फीट है। इसकी चैड़ाई का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि रियासत के दौर में इसकी पहरेदारी के लिए दो घुड़सवार एक साथ चलते थे।
विश्व धरोहर घोषित होने पर जयपुर की स्थापत्य कला और शिल्पकला के अनूठेपन को विश्व में फिर से पहचान मिलेगी और यहां आने वाले देशी और विदेशी पर्यटकों की संख्या में ईजाफा होगा। देश और विदेश से राजस्थान घूमने आने वाले पर्यटकों के लिए जयपुर पहला डेस्टिनेशन होता है। यहां के ऐतिहासिक भवनों हवामहल, अल्बर्ट हॉल और सिटी पैलेस समेत चारदीवारी का इलाका पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र होता है।
सवाई जयसिंह द्वितीय की ओर से बसाया यह गुलाबी नगर अपने अनूठी स्थापत्य कला और शिल्पकला के लिए विश्व भर में विख्यात रहा है. शहर के एतिहासिक दरवाजे, हेरिटेज लुक वाले बरामदे, छोटी चैपड़-बड़ी चैपड़, चारदीवारी के प्राचीन दरवाजे, चारदीवारी की गुलाबी रंगत, धरोहर, लाख की चूड़ियां, चैकड़ी खाना और स्वर्ण मीनाकारी की दम पर चारदीवारी इलाके की खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। जयपुर अपनी समृद्ध भवन निर्माण-परंपरा, सरस-संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। शहर चारों ओर से दीवारों और परकोटों से घिरा हुआ है, जिसमें प्रवेश के लिए सात दरवाजे हैं। बाद में एक और द्वार भी बना जो न्यू गेट कहलाया। पूरा शहर करीब छह भागों में बँटा है और यह 111 फुट चैड़ी सड़कों से विभाजित है। पाँच भाग मध्य प्रासाद भाग को पूर्वी, दक्षिणी एवं पश्चिमी ओर से घेरे हुए हैं और छठा भाग एकदम पूर्व में स्थित है। प्रासाद भाग में हवा महल परिसर, व्यवस्थित उद्यान एवं एक छोटी झील हैं। पुराने शहर के उत्तर-पश्चिमी ओर पहाड़ी पर नाहरगढ़ दुर्ग शहर के मुकुट के समान दिखता है। इसके अलावा यहां मध्य भाग में ही सवाई जयसिंह द्वारा बनावायी गईं वेधशाला, जंतर मंतर, जयपुर भी हैं जो विश्व विख्यात है।
किसी भी देश की धरोहर उसके गौरवशाली व समृद्ध अतीत की प्रमाण होती हैं। जिसकी नींव पर सुनहरे भविष्य की कल्पना साकार होती है। धरोहरों को भावी पीढ़ी के लिए सहेजना हर नागरिक का कर्तव्य होता है। हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि अपने धरोहरो का आनेवाली पीढ़ी व मानवता के हित में संरक्षण करेंगे।