शरणार्थियों की बोझ से दबती दुनिया
July 15, 2019 • विष्णुगुप्त

(विष्णुगुप्त)

एक बार फिर शरणार्थी समस्या दुनिया भर में चर्चा, चिंता और सबक के तौर पर खडी है। अभी हाल में ही दुनिया में मानव मन को झकझोरने वाली एक शरणार्थी तस्वीर सामने आयी है जिसमें एक बाप-बेटी मैक्सिकों के रास्ते से अमेरिका में प्रवेश करने की कोशिश करते समय नदी की तेज धार में बह गये और उनकी जिंदगी काल में समा गयी। इसके पहले भी सीरिया के एक मृत बच्चे अयलान कुर्दी की तस्वीर मिली थी जो अपने अभिभावकों के साथ बेहतर जिंदगी की खोज में यूरोप में जाने का प्रयासरत था, समुद्र की तेज ज्वार में वह बालक जिंदगी खोयी थी। उस समय दुनिया भर में शरणार्थी समस्या को लेकर चिंता व्यक्त की गयी थी और शरणार्थियों की समस्याओं को मानवीकरण करने पर बल दिया गया था, अमेरिका और यूरोप से यह अपील की गयी थी कि किसी न किसी कारण अपना घर और अपना देश छोडने वाले शरणार्थियो को शरण दिया जाना चाहिए, उन्हें अपने जीवन को संवारने और व्यवस्थित करने के लिए अवसर दिया जाना चाहिए।
अमेरिका और यूरोप शरणार्थियों के प्रति पहले से काफी उदार रहे हैं, शरणार्थियों को मानवीय आधार पर शरण देने, शरणार्थियो को भविष्य सुंदर बनाने के लिए अवसर देने में अमेरिका और यूरोप काफी आगे रहे हैं। कभी अमेरका और यूरोप में शरण लेने वाले शरणार्थी आज बेहतर जिंदगी व्यतित कर रहे हैं और वे गोरी समाज को टक्कर देने की स्थिति में हैं। अमेरिका और यूरोप का मानव इतिहास सर्वश्रेष्ठ है जो शरणार्थियों के लिए लाभकारी रहा है। सीरिया के लाखों शरणार्थियों को जर्मनी ने शरण दे रखे हैं। हालांकि यह भी सही है कि शरणार्थियों के प्रति अमेरिका और यूरोप का विचार अब धीरे-धीरे बदल रहा है, शरणार्थियों के खतरे को भी पहचाना जाना जा रहा है, महसूस किया जा रहा हे। इसमें अमेरिका और यूरोप का ही दोष देखना सही नहीं है, इसमें अमेरिका और यूरोप का एकतरफा दोष देखने का अर्थ सिर्फ और सिर्फ एकांकी सोच होगी और शरणाथियों द्वारा प्रत्यारोपित खतरों और हिंसक मानसिकताओं, मजहबी सोच आदि को नजरअंदाज करना होगा। हर सिक्के का दो पहलू होता है। इसलिए शरणार्थी समस्या का दो पहलू भी है। एक पहलू तो बहुत ही जहरीला, खतरनाक और मजहबीकरण वाला है। शरण देने वाले देशों के लिए शरणार्थी भस्मासुर तक बन गये हैं। शरणार्थी शरण देने वाले देशों के लिए भस्मासुर न बने, इसके लिए कोई गारंटी कौन दे सकता है? शरणार्थी बोझ उठाने का अर्थ अब एक खतरनाक हिंसक प्रवृति को भी आमंत्रित करने के साथ ही साथ अपनी अर्थव्यवस्था को भी संकट में डालना माना जा रहा है।
दुनिया में कोई एक-दो लाख शरणार्थी नहीं है, शरणार्थियों की संख्या बहुत ही अधिक है, शरणार्थियों की संख्या जान कर आप चिंतित हो जायेंगे। चिंतित होना भी स्वाभाविक है। आखिर क्यों? इसलिए कि दुनिया में अभी शरणार्थियों की संख्या सात करोड से अधिक हैं। ये सात करोड मनुष्य किस हाल में होंगे, इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। इनकी स्थिति बहुत दयनीय और नरकीय है। ये कहीं झुग्गियों में रहते हैं, तो ये कहीं टैंटों में रहते हैं। इन पर हमेशा मौसम की मार पडती है, रोजगारहीन-सााधनहीन होते हैं। इन्हें सिर्फ और सिर्फ शरण देने वाले देशों पर निर्भर रहना पडता है, कुछ अंतर्राष्टीय सामाजिक संगठनों की दया इन पर जरूर बरसती है, अतंराष्टीय सामाजिक संगठन से जो मदद मिलती हैं, वह मदद भी शरणार्थियों की समस्याओं को दूर नहीं करती, शरणार्थियों को किसी तरह जिंदा रखने का काम करती हैं। दानदाताओं की कमी से भी अंतर्राष्टीय सामाजिक संगठनों को जूझना पडता है। संयुक्त राष्ट संघ की शरणार्थी नीति जरूर लाभकारी है। पर संयुक्त राष्टसंघ भी शरणार्थियों की बढती संख्या का बोझ उठाने में सफल नहीं हो पा रही है। दुनिया में शरणार्थी समस्या रोकने के अभी तक कोई चाकचैबंद नीति नहीं बन रही है। शरणार्थी होने के लिए लोग क्यों विवश होते हैं इस पर भी सोच और नजरिया कई वादों से ग्रसित है।
शरणार्थी बनने की प्रकिया पर भी विचार करना जरूरी है। शरणार्थी बनते क्यों है लोग? कौन बनाता है शरणार्थी? शरणार्थी बनाने के प्रति कोई दुराग्रह, कोई कूटनीति भी होती है क्या? दुनिया में शरणार्थियों के प्रति सिर्फ मानवीय भाव है, ऐसा नहीं है। दुनिया में शरणार्थियों के प्रति कई भाव है जो शरणार्थियों की समस्याओं को बढाने और शरणार्थियों को तिरस्कार का सामना करने के लिए बाध्य करते हैं। अराजकता के कारण लोग शरणार्थी बनने के लिए बाध्य होते हैं, पर शरणार्थी बनाने का काम भी दुनिया में घड्ल्ले के साथ जारी है। यह कहना गलत नहीं होगा कि दुनिया भर में यह बात बडी गहरी बनी हुई है कि अब शरणार्थी बनाने का काम किया जा रहा है, शरणार्थी बनाने के उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ बेहतर जिंदगी की खोज नहीं होती है बल्कि अन्य रक्तरंजित और मजहबी उद्देश्य भी होते हैं, किसी सभ्यता और संस्कृति को नष्ट करने का उद्देश्य भी होता है, किसी रक्तरंजित संस्कृति के विस्तार का उद्देश्य भी होता है। जनसंख्या जिहाद के माध्यम से अपनी संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ बनाना भी एक उद्देश्य होता है। यह सोच कोई सतही भी नहीं है, यह सोच कोई झूठी भी नहीं है। यह सोच पूरी तरह चाकचैबंद है। हाल के वर्षो में जब आप शरणार्थी समस्या का विश्लेषण करेंगे तो पायेंगे कि शरणार्थियों के खिलाफ ऐसी सोच किसी न किसी रूप में सही है, किसी न किसी रूप में शरणार्थी रक्तरंजित और खतरनाक समस्याओं के प्रति जिम्मेदार भी हैं। पिछले दस सालों के अंदर में अमेरिका और यूरोप में आतंकवाद की घटनाओं को जब आप देखेंगे तो पायेंगे कि कभी न कभी शरणार्थी के तौर पर श्रण लेने वाले लोग उसके लिए जिम्मेदार रहे हैं। कहने का अर्थ यह हुआ कि शरणार्थी भस्मासुर भी बन जाते है। जिस देश ने शरण दिया उसी देश में शरणार्थी, अपराध, आतंकवाद और घृणा की रक्तरंजित और खतरनाक व्यवस्था के जिम्मदार बन गये। जर्मनी ने सीरिया के लाखों शरणार्थियों को शरण देने का काम किया पर जर्मनी जैसे शरण देने वाले देशोें का हाल क्या हुआ, यह जानकर आप चिंतित हो जायेंगे और शरणार्थी को सिर्फ मानवीय आधार की बात नहीं करेंगे बल्कि शरणार्थियों को भस्मासुर के तौर पर भी देखेंगे। जर्मनी में पहुंचते ही सीरिया के शरणार्थियों ने अपराधों की खतरनाक मानसिकताओं से शांति से रहने वालों को डरा कर रख दिया था। खास कर महिलाओ के प्रति बलात्कार और छेडखानी की घटनाएं बढ गयी थी। अमेरिका और यूरोप की महिलाएं उदारवाद की वाहक हैं। बंद समाज में आने वाले शरणार्थी अमेरिका-यूरोप की उदार महिलाओं को देख कर वासना और उत्तेजना के वाहक बन बैठे। ऐसी घटनाओं को नजरअंदाज करना भी गैर जरूरी है।
दुनिया में तीन तरह की सत्ता व्यवस्था से शरणार्थी समस्या घातक बनती है। पहली मुस्लिम सत्ता व्यवस्था, दूसरी कम्युनिस्ट तानाशाही वाली सत्ता व्यवस्था और तीसरी विफल देशों वाली सत्ता व्यवस्था है। अधिकतर मुस्लिम देशों में आतंकवाद और हिंसा जारी है, मुस्लिम देशों में इस्लाम के फिरकों के बीच लडाई जारी है, हमारा इस्लाम अच्छा है, तुम्हारा इस्लाम खराब है कि मानसिकताओं के घेरे में आतंकवाद और गृहयुद्ध जारी है। सीरिया में शिया शासन है पर सुन्नी शिया शासन के खिलाफ हिंसक राह पर है। अफगानिस्तान, लेबनान, इराक, सूडान, पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों की कहानी कौन नहीं जानता है। दुनिया के 90 प्रतिशत शरणार्थी मुस्लिम गिरोह से आते हैं। अभी-अभी कम्युनिस्ट तानाशाही वाले देश वेनेजुएला के लाखों लोगों ने पडोसी देशों में शरणार्थी बनने के लिए बाध्य हुए हैं। वेनजुएला में आज मंदी का दौर है। वहां की अर्थव्यवस्था चरमरा गयी। भूख और बेकारी से पलायन जारी है। इस पलायन का बोझ वेनेजुएला के पडोसी देश उठाने के लिए मजबूर है। इसी तरह दुनिया के कई ऐसे देश हैं जो असफल देश हैं जिनके यहां अराजक राजनीतिक स्थिति के कारण भूखमरी उत्पन्न होती है। इन असफल देशों में मैक्सिकों, वेनेजुएला और अफ्रीकी देश आदि आते हैं। भारत जैसे देश भी रोहिंग्या जैसी समस्या से जुझ रहा है। रोहिंग्या ने पहले म्यांमार और फिर की शांति के लिए खतरा बने हुए हैं। रोहिंग्या आतंकवाद ने म्यांमार को झकझोर कर रख दिया था, प्रतिहिंसा जब हुई तो रोंिहंग्या मुसलमान भारत में अवैध घुसपैठ कर समस्या बन बैठे।
अमेरिका और यूरोप ने शरणार्थियों के प्रति अब कडा रूख अपनाया है। खासकर अमेरिका अब शरणार्थियों की बोझ को उठाने के लिए तैयार नहीं है। उसने शरणार्थी नीति कडी कर दी है। मैक्सिकों सीमा पर दीवार खडी करने की ओर आगे कदम बढाये हैं। हजारों शरणार्थियों को पकड कर जेलो में डाला गया है। यूरापीय देशों पर भी भारी दबाव है। खासकर राष्टवादी समूह अपनी सरकार पर दबाव बनाये हुए हैं ऐसी स्थिति में शरणार्थी समस्या तो बढेगी। शरणार्थी भस्मासुर नहीं होगे, इसकी गारंटी भी तो कोई देने वाला नहीं है?