संवेदना का बेजा प्रदर्शन
April 19, 2019 • राकेश रमण
भोपाल से भाजपा के टिकट पर कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को चुनाव मैदान में टक्कर दे रही साध्वी प्रज्ञा ने जिस तरह से प्रखर व काफी हद तक क्रांतिकारी हिन्दू की अपनी छवि के अनुरूप बयान देने की शुरूआत की है उसने अभी से भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लिये सिरदर्दी बढ़ाना शुरू कर दिया है। हालांकि दिग्विजय के खिलाफ साध्वी प्रज्ञा को चुनाव मैदान में उतारने का भाजपा ने जो फैसला किया उसके बाद ही यह साफ हो गया कि इस चुनाव को भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ओर मोड़ने के लिये आकुल-व्याकुल है। इसकी शुरूआत तो भाजपा के स्टार प्रचारक व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ही अली और बजरंगबली से जुड़ा बयान देकर कर दी जिसके लिये उन्हें चुनाव आयोग ने 72 घंटे के लिये चुनाव प्रचार करने से प्रतिबंधित कर दिया। लेकिन उससे भी कई कदम आगे बढ़ते हुए भाजपा ने भोपाल की सीट पर साध्वी प्रज्ञा को चुनाव मैदान में उतार कर राष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश प्रसारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि इस चुनाव को वह किस ओर मोड़ना चाहती है। साध्वी के साथ मालेगांव बम धमाके के मामले में एनआईए द्वारा ज्यादती की गई और उन्हें नौ सालों तक जेल में रहना पड़ा इसकी तस्दीक तो हो चुकी है। लेकिन अभी अदालत ने मामले से बरी नहीं किया है। यानि उन पर लगा हिन्दू आतंकवादी होने के आरोप अभी तक धुला नहीं है। ऐसे में अगर आतंकवाद के मामले में जमानत पर चल रही साध्वी प्रज्ञा को भाजपा द्वारा चुनाव मैदान में उतारा जाता है तो निश्चित ही यह एक प्रकार से उनकी इस छवि को राजनीतिक तौर पर भुनाने का प्रयास ही माना जाएगा। भाजपा के इस प्रयास को देश भी समझ रहा है और साध्वी भी समझ रही है। साध्वी को बेहतर पता है कि भोपाल से चुनाव मैदान में उन्हें ही क्यों उतारा गया है। अगर किसी साधु-संत या साध्वी को ही चुनाव मैदान में उतारना होता तो भाजपा के साथ बहुतेरे ऐसे लोग जुड़े हुए हैं जिसमें से किसी को भी आगे किया जा सकता था। लेकिन प्रज्ञा सिंह ठाकुर की छवि किसी सामान्य साध्वी की नहीं है। तभी तो चुनाव मैदान में उतरने के साथ ही प्रज्ञा ने साफ कर दिया है कि वे कोई सामान्य चुनाव नहीं लड़ रही हैं बल्कि बकायदा धर्म युद्ध लड़ रही हैं। साध्वी ने साफ कर दिया कि हिन्दू आतंकवादी होने का जो आरोप उन पर मढ़ा गया और उसे सत्य साबित करने के लिये जिन लोगों ने उन्हें नौ साल तक शारीरिक व मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया उनके खिलाफ ही उनका यह धर्म युद्ध है। यानि साध्वी की कोई मंशा नहीं है कि मोदी सरकार के काम काज या भाजपा के घोषणापत्र को आगे रख कर जनता जनार्दन से चुनाव में अपने लिये समर्थन मांगे। बल्कि उनकी मंशा सिर्फ अपने साथ हुए जोर-जुल्म को आगे रखकर जनता की सहानुभूति जुटाने की है। अपनी इसी मंशा के तहत साध्वी ने बीते नौ सालों में अपने साथ हुए अत्याचारों की कहानी को सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक मंच तक पर साझा करना आरंभ कर दिया है और संवेदना के स्तर पर सर्वोच्च शिखर पर ले जाते हुए उन्होंने यहां तक कह दिया कि मुंबई एटीएस के पूर्व प्रमुख हेमंत करकरे को उनकी ही हाय लगी और उनके श्राप के कारण ही सवा महीने के भीतर करकरे आतंकी की गोली का शिकार हो गए। साध्वी का यह बयान निश्चित ही बेहद निंदनीय और देश की भावना व संवेदना के साथ खिलवाड़ ही नहीं बल्कि सुरक्षा व जांच एजेंसियों को हतोत्साहित कर उनका मनोबल तोड़ने वाला भी है। हेमंत करकरे मुंबई एटीएस के जांबांज मुखिया थे जिन्होंने मुंबई पर हुए आतंकी हमले के दौरान अपनी जान की परवाह किये बगैर आतंकियों से सीधा लोहा लिया और उसी क्रम में उन्होंने देश व समाज के लिये अपना सर्वोच्च बलिदान देते हुए जान न्यौछावर कर दिया। उनकी इस वीरता के लिये भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से भी नवाजा। ऐसे जांबांज अधिकारी के लिये अगर किसी ऐसी साध्वी द्वारा अपशब्दों का प्रयोग किया जाए और यह कहा जाए कि उसके श्राप के कारण ही उस अधिकारी की जान गई तो निश्चित ही यह पूरे देश के लिये बेहद शर्मनाक है। हालांकि बेहतर बात यही है कि साध्वी को दिग्विजय के खिलाफ भोपाल से चुनाव मैदान में उतारने वाली भाजपा ने भी उनके इस बयान से किनारा कर लिया है और साफ शब्दों में कहा है कि करकरे ने देश व समाज की रक्षा के लिये अपने प्राणों का बलिदान दिया। भाजपा द्वारा जारी किये गये बयान में साफ शब्दों में कहा गया है कि पार्टी करकरे को श्हीद ही मानती है और साध्वी ने उनके बारे में जो कुछ भी कहा है उससे पार्टी का कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि पार्टी का यह भी मानना है कि नौ सालों तक शारीरिक व मानसिक प्रताड़णा झेलने के कारण ही साध्वी ने करकरे के बारे में ऐसी बातें कही होंगी। अब सवाल है कि अगर किसी पर ट्रेन में बम धमाका करने का आरोप लगे और उसकी संलिप्तता के बारे में प्रथम दृष्टया कोई सुराग या साक्ष्य मिले तो ऐसे व्यक्ति के साथ कोई भी जांच एजेंसी कैसा सलूक करेगी। निश्चित ही जांच के फेर में कई बार निर्दोष भी फंस जाते हैं और उन्हें भी प्रताड़ित होना पड़ता है। लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है उस व्यक्ति को यह अधिकार मिल गया है कि वह हमारी पूरी व्यवस्था के खिलाफ जहर उगलना आरंभ कर दे और यह प्रचारित करने लगे कि उसके साथ जो अन्याय हुआ उसके पीछे कोई सांप्रदायिक आधार था। निश्चित ही यह एक बेहद ही गलत व निंदनीय परंपरा की शुरूआत हुई है जिसमें कल को कोई किसी अन्य जाति या धर्म का ऐसा व्यक्ति भी चुनाव मैदान में उतर कर अपने खिलाफ सांप्रदायिक आधार पर प्रताड़णा का आरोप लगाकर राजनीति चमकाने की कोशिश कर सकता है। लिहाजा वक्त है सतर्क होने का और साध्वी जैसे लोगों को यह बताने का कि यह देश अतिवाद को कतई स्वीकार या बर्दाश्त नहीं कर सकता है।