सत्ता का सुख बनाम जिम्मेवारियां
July 16, 2019 • राकेश रमण
सत्ता की व्यस्ताओं की आड़ लेकर संसदीय जिम्मेदारियां निभाने के प्रति हीलाहवाली दिखानेवाले मंत्रियों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज जमकर खरी खोटी सुनाई है। भाजपा के संसदीय दल की साप्ताहिक बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने संसदीय कार्यमंत्री को सख्त निर्देश दिया है कि संसदीय जिम्मेवारियां निभाने में कोताही बरतनेवाले, संसद में अनिवार्य तौर पर उपस्थिति के लिये लगाई जानेवाली रोस्टर ड्यूटी स्वीकार करने में हीला हवाली करनेवाले या उसे गंभीरता ने नहीं लेते हुए रोस्टर ड्यूटी के दौरान सदन से अनुपस्थित रहनेवाले मंत्रियों की सूची प्रधानमंत्री कार्यालय को प्रतिदिन उपलब्ध कराई जाये। प्रधानमंत्री ने बेलाग लहजे में अपने कामकाज से कोताही बरतनेवाले मंत्रियों को चेतावनी देते हुए कहा है कि उेसे मंत्रियों को ठीक करना उन्हें अच्छी तरह से आता है। प्रधानमंत्री ने इस बात पर खासी नाराजगी जताई कि विपक्ष के नेता अक्सर प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर यह शिकायत करते हैं कि रोस्टर ड्यूटी के बावजूद मंत्री सदन से अनुपस्थित रहते हैं। हालांकि प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रियों की अनुपस्थिति के मसले पर सख्ती दिखाने के लिये सिर्फ विपक्ष से मिल रही शिकायतों का ही हवाला दिया है लेकिन सूत्रों की मानें तो संसदीय कार्यमंत्री के कार्यालय पर भी रोस्टर ड्यूटी तय किये जाने के दौरान कई मंत्रियों की ओर से अक्सर यह दबाव बनाया जाता है कि उन्हें इस ड्यूटी से अलग रखा जाये अथवा उन्हें कम से कम ड्यूटी ही दी जाए। सूत्रों के मुताबिक संसदीय कार्यमंत्री के कार्यालय पर केन्द्रीय मंत्रियों की ओर से बनाए जानेवाले इस दबाव से प्रधानमंत्री कार्यालय पहले से ही अवगत है और अब जबकि संसदीय कामकाज में मंत्रियों की ओर से रूचि नहीं दिखाए जाने की शिकायतें विपक्ष की ओर से भी मिलने लगीं तब प्रधानमंत्री को इस मामले में सख्ती के साथ हस्तक्षेप करने के लिये मजबूर होना पड़ा है। दरअसल संसद सत्र के दौरान सदन में केबिनेट मंत्री का मौजूद रहना अनिवार्य होता है। इसके लिए संसदीय कार्य मंत्रालय की ओर से राज्यसभा और लोकसभा में मंत्रियों की दो-दो घंटे की ड्यूटी लगायी जाती है और इसके लिए उनका रोस्टर बनता है। इसे ही रोस्टर ड्यूटी कहते हैं। लेकिन अधिकांश मंत्रियों को संसद में अनिवार्य तौर पर उपस्थित रहने की जिम्मेवारी निभाने में बोरियत महसूस होती है। उन्हें लगता है कि लगातार दो घंटे का समय देने के बजाय वे इस समय का किसी अन्य काम में सदुपयोग कर सकते हैं। इसी वजह से आम तौर पर मंत्रियों की ओर से संसदीय कार्य मंत्रालय पर इस बात का कभी औपचारिक तौर पर तो कभी अनौपचारिक तरीके से दबाव बनाया जाता है कि उन्हें इस काम में ना उलझाया जाये। खास तौर से सदन में जब अपने मंत्रालय से संबंधित कोई काम या चर्चा हो रही हो तब तक तो उन्हें अधिक दिक्कत नहीं होती लेकिन किसी अन्य मंत्रालय के कामकाज के दौरान केवल रोस्टर पूरा करने के लिये सदन में मौजूद रहना उन्हें बहुत अधिक खलता है। यही वजह है कि अक्सर यह देखा जाता है कि दूसरे मंत्रालयों के कामकाज में दिलचस्पी लेना किसी मंत्री को गवारा नहीं होता। जबकि रोस्टर की व्यवस्था में सिर्फ केबिनेट के प्रतिनिधि के तौर पर उन्हें मौजूद रहना होता है और उस वक्त जिस मंत्रालय को लेकर चर्चा चल रही होती है उसके राज्यमंत्री भी मौजूद रहते ही हैं। लेकिन अगर रोस्टर के तहत केबिनेट मंत्रियों की मौजूदगी अनिवार्य तौर पर सुनिश्चित ना की जाये तो संबंधित विभाग के मंत्री को हर समय सदन में मौजूद रहना पड़ेगा  जो कि व्यावहारिक तौर पर संभव ही नहीं है। ऐसा ही वाकया बीते सोमवार को लोकसभा में देखा गया जब एक महत्वपूर्ण विधेयक पर चर्चा शुरू हुई तो उस वक्त सम्बंधित मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री सदन में उपस्थित नहीं थे। साथ ही रोस्टर ड्यूटी के तहत जिस मंत्री को उपस्थित रहना था वे भी सदन से नदारद थे। हालांकि इस पर विपक्षी दलों की ओर से सवाल उठाया गया तो लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने विपक्ष को शांत करने की गरज से बताया कि कैबिनेट मंत्री आ रहे हैं, सदन में राज्यमंत्री उपस्थित है और तब तक चर्चा की शुरुआत की जाए। लेकिन विपक्ष का हंगामा बदस्तूर जारी रहा। खैर उस दिन तो बात संभल गई लेकिन आगे से ऐसी नौबत ना आए इसके लिये प्रधानमंत्री को आज अपना रौद्र तेवर दिखाने के लिये मजबूर होना पड़ा है। प्रधानमंत्री ने पहले भी इस बात पर कई बार नाराजगी जतायी थी कि जब संसद का सत्र चल रहा होता है तो कई बार सांसद सदन में उपस्थित नहीं रहते। लंकिन इस बार तो मामला मंत्रियों का है। सच पूछा जाये तो प्रधानमंत्री को पहली बार ऐसा करने के लिये मजबूर नहीं होना पड़ा है बल्कि अपने सांसदों और मंत्रियों को जिम्मेवारी निभाने का सलीका सिखाने के लिये उन्हें तब से मेहनत करनी पड़ रही है जब 16वीं लोकसभा के चुनाव में जीत दर्ज कराने के बाद वे पहली बार सरकार के मुखिया बने थे। शुरूआत में तो प्रधानमंत्री को यह भी बताना पड़ा था कि मंत्रियों की वेषभूषा और उनका पहनावा कैसा होना चाहिए। बाद में यह सिखाने के लिये मजबूर होना पड़ा कि मंत्रियों, सांसदों व जनप्रतिनिधियों को आम लोगों के बीच होने पर किस तरह का व्यवहार करना चाहिये और अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करने से किस तरह बचना चाहिये व आम लोगों की कतार में शामिल होकर ही काम करने का प्रयास करना चाहिये। इसके बाद उन्होंने मंत्रियों को अपनी दिनचर्या बदलने के तौर तरीके सिखाये और इसके लिये उन्होंने खुद ही सुबह के वक्त मंत्री के निवास पर और कार्यालय के समय उनके आॅफिस में लैंड लाइन पर उनको फोन करके उनकी खबर लेनी शुरू की। अब उन्हें अपने मंत्रियों और सांसदों को संसदीय कामकाज की अहमियत समझानी पड़ रही है। निश्चित ही यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं बल्कि शर्मनाक भी है। कहां तो मंत्रियों को अपने कामकाज से लोगों के सामने एक नजीर पेश करनी चाहिये और कहां उन्हें हर बात के लिये डांट फटकार सुननी पड़ रही है। निश्चित ही यह आम लोगों के उस विश्वास को तोड़ने जैसा है जिसने अपने वोट से उन्हें देश व समाज की सेवा करने का मौका दिया है। लिहाजा मंत्रियों और सांसदों को चाहिये कि वे आम लोगों के विश्वास पर खरे उतरें और यह ना भूलें कि पांच साल का वक्त गुजरते देर नहीं लगती है।