सही राह पर भाजपा
June 14, 2019 • राकेश रमण

लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई भी बड़ा या कड़ा फैसला लेने में मुश्किलें अवश्य आती हैं। उसमें भी अगर व्यवस्था अंदरूनी तौर पर विकेन्द्रित हो और किसी भी फैसले के लिये बहुमत के बजाय आम सहमति की राह अख्तियार करना अपेक्षित ही नहीं बल्कि आवश्यक भी हो तो ऐसे में स्वाभाविक है कि किसी विचार को निर्णय के मुकाम तक पहुंचाना और उसे अमल में लाना मुश्किल, चुनौतीपूर्ण और दुरूह तो होगा ही। ऐसी ही एक बेहद लंबी, उबाऊ और थकाऊ प्रक्रिया इन दिनों भाजपा में चल रही है जहां संगठन की भविष्य की दशा, दिशा और नेतृत्व को लेकर व्यापक स्तर पर मगजमारी लगातार जारी है। कहने को तो भाजपा के संचालन की बागडोर पूरी तरह पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के ही हाथों में है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ सलाह-मशविरा करके वे पार्टी के लिये कोई भी फैसला ले सकते हैं। लेकिन यह पार्टी की बहुआयामी अंदरूनी तस्वीर का पूरा सच नहीं है। सच तो यह है कि भाजपा के बारे में कोई भी अंतिम फैसला करना ना तो पूरी तरह अमित शाह के हाथों में है और ना ही मोदी सरीखे विराट व्यक्तित्व को ऐसा करने का अख्तियार हासिल है। वर्ना अगर हर फैसला भाजपा के अध्यक्ष को ही लेना होता अमित शाह के मोदी सरकार का हिस्सा बन जाने के बाद वे आसानी से दुनिया को दिखाने के लिये अपने किसी विश्वासपात्र को पार्टी के मुखिया की कुर्सी पर स्थापित कर सकते थे। इसके लिये मौका भी मौजूद था जब तमाम राष्ट्रीय पदाधिकारियों के अलावा प्रदेश संगठन के सभी शीर्ष संचालकों को लोकसभा चुनाव के नतीजों की समीक्षा करने के लिये पार्टी मुख्यालय में एकत्र किया गया था। अगर भाजपा के अध्यक्ष की चलती तो इस बैठक में ही किसी ना किसी को वे अपना उत्तराधिकारी घोषित करके संगठन के संचालन की जिम्मेवारी से मुक्त हो सकते थे ताकि केन्द्र की सरकार के संचालन में अपना सौ-फीसदी योगदान देना आसान हो सके। बताया जाता है कि उन्होंने 'एक व्यक्ति एक पद' की स्थापित परंपरा का अनुसरण करते हुए यह प्रस्ताव भी दिया था कि अब संगठन की कमान किसी अन्य के हाथों में सौंप दी जाए और वह ना सिर्फ कार्यवाहक अध्यक्ष के तौर पर पार्टी के संगठनात्मक चुनावों की जिम्मेवारियां निभाए बल्कि बूथ, मंडल, जिला और प्रदेश के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की उस कमान को भी संभाले जो सदस्यता अभियान आरंभ करने से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव संपन्न कराने तक की तकरीबन पांच-छह महीने लंबी प्रक्रिया होती है। इसी बीच में महाराष्ट्र और झारखंड सरीखे सूबों में विधानसभा के चुनाव भी होने हैं। यानि पार्टी अध्यक्ष का दायित्व संभालने के लिये आवश्यक था कि ऐसे आदमी का चयन किया जाए जो अपना पूरा वक्त सिर्फ संगठन को ही समर्पित कर सके। बताया जाता है कि इन चुनौतियों, आवश्यकताओं और जरूरतों को देखते हुए नए कार्यवाहक अध्यक्ष की नियुक्ति के अमित शाह के प्रस्ताव को प्रधानमंत्री मोदी ने भी मान लिया था और अपेक्षित था कि संघ परिवार में भी इस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी। लेकिन अपेक्षाओं के अनुरूप संकेत नहीं दिया जा सका अथवा इसके पीछे कोई और बात रही लेकिन हुआ यूं कि शाह को संगठन से कार्यमुक्त करने और उनके द्वारा चयनित व्यक्ति को कार्यवाहक अध्यक्ष के तौर पर नियुक्त करने के प्रस्ताव पर आम सहमति नहीं बन सकी। अव्वल तो कार्यवाहक अध्यक्ष की नियुक्त का प्रस्ताव की कइयों के गले नहीं उतरा क्योंकि शाह के कार्यकाल की अवधि तो वैसे भी बीते जनवरी माह में समाप्त हो चुकी है और लोकसभा चुनावों तक के लिए संगठनात्मक चुनावों को टाले जाने के कारण ही वे इस जिम्मेवारी को तब तक निभा रहे हैं जब तक पार्टी अपना नया अध्यक्ष नहीं चुन लेती। लिहाजा जब शाह ही कार्यवाहक के तौर पर हैं तो कहा यह गया कि अब बेहतर होगा कि संगठनात्मक चुनावों के बाद नए अध्यक्ष की नियुक्ति तक वे ही इस कार्यभार को संभालें। दूसरी ओर तब तक नए अध्यक्ष के नाम पर विचार के लिये सबको समय मिल जाएगा। इसे दूसरे नजरिये से देखें तो अपने विश्वासपात्र को कार्यवाहक के तौर पर पार्टी में स्थापित करने और बाद में येन-केन-प्रकारेण उसे ही संगठनात्मक चुनाव के बाद पार्टी का मुखिया नियुक्त कराने की तमाम कोशिशें एक झटके में ही धराशायी हो गई हैं और अब यह तय हो गया हो गया है कि जब हर स्तर पर सहमति के बाद ही किसी चेहरे को आगे लाया जाएगा तो वह किसी का खड़ाऊं तो हर्गिज नहीं होगा। वर्ना बताया तो यही भी जाता है कि शाह-और मोदी किसी भी सूरत में भाजपा संगठन पर अपनी पकड़ ढ़ीली नहीं होने देना चाह रहे थे और इसी वजह से उनकी योजना थी कि सबकी सहमति लेकर अपने मनचाहे व्यक्ति को पार्टी का पूर्णकालिक अध्यक्ष बनवा पाना तो बेहद मुश्किल होगा लिहाजा बेहतर है कि अभी उसे कार्यवाहक अध्यक्ष बना दिया जाए ताकि अगर कोई इसके विरोध में सामने भी आए तो उसे 'अल्पकालिक व्यवस्था' का हवाला देकर चुप करा दिया जाए। बाद में पूरे संगठनात्मक चुनावों के दौरान सबसे संपर्क करके उसके नाम पर सहमति ले ली जाएगी और इस तरह पार्टी अध्यक्ष के पद पर अपने खड़ाऊं को रख कर मनचाहे तरीके से पूर्ववत पार्टी को चलाया जाता रहेगा। लेकिन सिद्धांतों और विचारधारा के बजाय व्यक्तिवाद पर केन्द्रित हो चुकी भाजपा में बड़े बदलाव की बात करनेवाले इस पूरे खेल को समझ गए और उन्होंने ऐसी भांजी मारी है कि अब खड़ाऊं रखकर पार्टी को अपनी मुट्ठी में रख पाना किसी के लिये संभव ही नहीं है। लिहाजा उम्मीद की जानी चाहिए कि अब एक बार फिर भाजपा का वैचारिक व सैद्धांतिक तौर पर जीर्णोद्धार होगा और इसमें वहीं प्राण शक्ति दोबारा प्रवाहित की जाएगी जिससे यह किसी चेहरे के सहारे खड़े होने के बजाय इतनी सक्षम व शक्तिशाली बने कि मौजूदा चेहरों से भी बेहतर नेतृत्व का सृजन कर सके।