सियासी शत्रुता का बढता दायरा
May 22, 2019 • राकेश रमण
राजनीति के बारे में कहा जाता है कि इसमें ना तो कोई किसी का स्थाई मित्र होता है और ना ही स्थाई शत्रु। इसमें हर चुनाव के बाद समीकरण बदलते रहते हैं और चुनावी नतीजों से ही यह तय होता है कि कौन किस खेमे में रहेगा। हालांकि कुछ सिद्धांतवादी नेता व दल ऐसे भी हैं जिनकी सेहत पर चुनावी अंकगणित का कभी कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन वे भी किसी से स्थाई शत्रुता या मित्रता नहीं रखते। लेकिन अब इन सिद्धांतों में बदलाव का दौर देखा जा रहा है। बात चाहे सत्ता पक्ष की करें या विपक्ष की। दोनों ही ओर से इस मर्यादा की लक्षमण रेखा का उल्लंघन करने और इस परंपरा को तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। इस बार के चुनाव में जिस तरह से हर तरफ राजनतिक मतभेद या सैद्धांतिक व वैचारिक विरोध से आगे बढ़ कर एक दूसरे पर निजी व व्यक्तिगत हमले किये गये उसने इस अवधारणा को तार-तार कर दिया। अब यह नहीं कह सकते कि कोई किसी की मित्र या शत्रु नहीं होता। अब तो स्थिति ऐसी है जिसमें राजनीतिक नुकसान की संभावना सामने देखकर भी सियासत पर शत्रुता के भाव को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए एक दूसरे से खुन्नस निकालने और एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने की होड़ शुरू हो गई है। इसमें कोई पीछे नहीं है। ना तो सत्ता पक्ष, ना विपक्ष और ना ही कथित तीसरा पक्ष। बेशक एनसीपी और बीजेडी सरीखे कुछ दल हैं जो राजनीति में मर्यादा की सरहद नहीं लांघते। वर्ना बीते दिनों आए प्रलयंकारी तूफान फणी से लड़ने में ओडिशा सरकार और केन्द्र सरकार कांधे से कांधा मिलाकर जूझते नहीं दिखाई पड़ते। इसी प्रकार जब पूरे जोर शोर से राफेल के मामले को तूल देते हुए कांग्रेस की ओर से चैकीदार को चोर साबित करने के लिये अभियान छेड़ा गया था तब भी एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने ही आगे बढ़कर मोदी का बचाव किया और तमाम राजनीतिक व दलगत मतभेदों को किनारे करते हुए उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि मोदी की नीति में गड़बड़ी होने की बात तो मानी जा सकती है लेकिन उनकी नीयत पर कतई शक नहीं किया जा सकता है। वाकई पवार ने जो बात कही वह कोई छोटी बात नहीं थी बल्कि मोदी सरीखे राजनीतिक विरोधी के लिये इस तरह खुल कर सामने आने के लिये बहुत बड़ा कलेजा चाहिये होता है। इतना बड़ा दिल अब बहुत कम ही राजनेताओं में बचा है। सच पूछा जाए तो इतना बड़ा कलेजा मोदी के पास भी नहीं है वर्ना आय से अधिक संपत्ति के मामले में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव को सीबीआई द्वारा क्लीन चिट देने के लिये चुनाव निपटने का इंतजार नहीं किया जाता। निश्चित ही यह पहले भी दिया जा सकता था लेकिन चुनाव के दौरान इसके सामने आने से परिणामों पर पड़ने वाले फर्क के कारण ही इसे चुनाव प्रक्रिया समाप्त होने तक के लिये दबा दिया गया होगा। खैर, देर आयद दुरूस्त आयद। अब भी बहुत देर नहीं हुई है। वैसे सच पूछा जाए तो राजनीतिक विरोध को व्यक्तिगत शत्रुता के स्तर तक ले जाने में जिस कदर ममता बनर्जी ने महारथ हासिल की हुई है उसकी मिसाल मौजूदा दौर में तो कहीं दिखाई नहीं पड़ती। बेशक कांग्रेस की ओर से भी ऐसा ही उदाहरण पेश किया जा रहा है लेकिन यह माना जा सकता है कि मुख्य विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस का हर तरह से भाजपा के पूरी तरह खिलाफ दिखना आवश्यक भी है और अपेक्षित भी। हालांकि इस पर अलग से बहस हो सकती है कि कांग्रेस ने मोदी विरोध की राह पर आगे बढ़ते हुए कई मामलों में देश विरोधी नीति क्यों अपना ली है। लेकिन इस बात में शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है कि कांग्रेस ने भी अंदरखाने सरकार का महत्वपूर्ण मसलों पर रचनात्मक सहयोग करने की राह अपनाने में हिचक नहीं दिखाई है। लेकिन जहां तक ममता का सवाल है तो उन्होंने तो राजनीतिक मतभेदों को निजी दुश्मनी के तौर पर निपटाने में हर लक्ष्मण रेखा को तोड़ दिया है। वर्ना जिस तुफान से ओडिशा सरकार और केन्द्र सरकार कांधे से कांधा मिला कर लड़ते नजर आए उस मामले में भी आम लोगों के हितों की परवाह ना करते हुए ममता ने केन्द्र के प्रति असहयोगात्मक रवैया नहीं अपनाया होता। ममता ने जिस तरह से सीबीआई को सूबे में घुसने की इजाजत देने से इनकार किया, राष्ट्रीय सुरक्षा में सहयोग करने से इनकार करते हुए केन्द्रीय बलों को अपने सूबे मे मनमुताबिक काम करने से रोकने में कोई कोताही नहीं बरती और आम लोगों व खास तौर से गरीबों को लाभ पहुंचाने के लिये मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई अधिकांश योजनाओं को पश्चिम बंगाल में लागू करने से इनकार कर दिया उसे देखते हुए यह कहना मुनासिब होगा कि उन्हें एक बार फिर से सियासत की सैद्धांतिक समझ विकसित करने और उसके अनुपालन के लिये अपना दिल बड़ा करने की जरूरत है। रहा सवाल केन्द्र की मोदी सरकार का तो इसने भी कई मामलों में राजनीतिक विरोध को व्यक्तिगत स्तर तक खींचने की जो पहल की है उसे कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता है। खास तौर से रक्षा सौदों में दलाली के मामले में बिना किसी ठोस सबूत के राहुल गांधी को सीधे तौर पर लाभार्थी के तौर पर प्रचारित करना इस बात का प्रमाण है कि विरोधियों की ओर से होने वाले हमले ने भाजपा के सब्र को भी तोड़ दिया। इसी प्रकार चुनावी गर्मा-गर्मी में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर द्वारा की गई बदजुबानी के लिये उन्हें राजग से निकाल फेंकना और अब उनकी पार्टी को तोड़ने का प्रयास करना भी यह बताने के लिये काफी है कि राजनति में बर्दाश्त क्षमता की कमी का शिकार भाजपा भी बन गई है। इसी प्रकार मध्य प्रदेश और कर्नाटक में जिस तरह से सत्ता परिवर्तन के लिये अच्छी भली चल रही सरकार के खेमे में फूट डालने का जो प्रयास किया जा रहा है उसे भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिये उचित नहीं कहा जा सकता है।